बंगाल से आरएसएस ने अपना कनेक्ट अरसे से बनाए रखा है, लेकिन यह पब्लिक से कनेक्ट नहीं हो पा रहा था। एनडीए सरकार और भाजपा ने इस बार यह काम बखूबी किया है।
2026 के पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में भाजपा की जीत का एक कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से भी जुड़ा है। आरएसएस बंगाल से जुड़ी पहचान का सम्मान लंबे समय से करते आया है। बांग्ला अस्मिता से जुड़ी कई चीजें आरएसएस के एजेंडे से लंबे समय से जुड़ी हैं, लेकिन यह जुड़ाव बंगाल की जनता समझ नहीं पा रही थी। इस बार भाजपा ने इस पुराने संबंध को जनता से जोड़ने में कामयाबी पाई।
इस चुनाव से पहले बीजेपी ने ऐसे कई कदम उठाए जिससे संघ के बंगाली संस्कृति से जुड़ाव के आधार पर 'पब्लिक कनेक्ट' बनाने में मदद मिले और भाजपा भी इसका चुनावी फायदा ले सके। इसका परिणाम उसे पहली बार बंगाल की सत्ता के रूप में मिल रहा है।
आरएसएस काफी पहले से बंगाल की संस्कृति से जुड़ा रहा है, लेकिन बंगाल के लोग इस सच से अब तक नहीं जुड़ पा रहे थे। 1875 में राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम' के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल के थे। इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया था और गाने वाले रवीन्द्रनाथ टैगोर भी बंगाली अस्मिता से जुड़ी शख़्सीयात थे।
आरएसएस और इससे जुड़े तमाम संगठनों के लिए राष्ट्र गीत और बंकिम चंद्र काफी महत्वपूर्ण रहे हैं। लेकिन, यह संदेश बंगाल की जनता तक आम तौर पर नहीं पहुंच पाया। केंद्र की भाजपा सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए, जिसकी वजह से राष्ट्र गीत के प्रति सम्मान राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बना।
नवम्बर, 2025 में राष्ट्र गीत के 175 साल पूरे होने पर संसद का विशेष सत्र बुलाया गया। इसके बाद सरकार ने यह नियम भी बनाया कि 'जन गण मन…' से पहले 'वंदे मातरम' गाया जाएगा और सभी छह पैराग्राफ गाना होगा। इससे पहले केवल दो पैराग्राफ गाया जाता था। बाकी हिस्सा इसलिए छोड़ा गया था कि यह मुस्लिमों के लिए असहजता पैदा कर सकता है। इस वजह से बीजेपी सरकार के ऐसे कदमों से यह मुद्दा सीधा जनता, खास कर बीजेपी समर्थकों की भावनाओं से जुड़ा।
मछली बंगाल की पहचान से जुड़ी है। यह न केवल खान-पान का अहम हिस्सा है, बल्कि पूजा-पाठ और शादी-ब्याह की रस्मों तक में इस्तेमाल होती है। मतलब मछली बंगाली संस्कृति का अहम हिस्सा है और इस बार चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाया गया। ममता बनर्जी ने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि अगर बीजेपी आई तो बंगाल को बंगाली खाना (खास कर मछली-मांस-अंडा) नहीं खाने दिया जाएगा। बीजेपी ने इस नरेटिव का करारा जवाब दिया। इस कड़ी में पार्टी के बड़े नेताओं ने कैमरे के सामने मछली खाई और यह वीडियो वायरल किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यह कह कर लोगों को आश्वस्त किया कि 15 साल सत्ता में रहने के बावजूद ममता सरकार लोगों को पर्याप्त मछली तक मुहैया नहीं करा पा रही। मछली दूसरे राज्यों से मंगवानी पड़ रही है।
प्रधानमंत्री ने खुद झालमूढ़ी खाकर आम बंगाली समाज तक यह संदेश देने की कोशिश की कि भाजपा से बंगाली खान-पान को कोई खतरा नहीं है।
इस चुनाव में बंगाली अस्मिता भी एक मुद्दा थी। टीएमसी का नारा था- जातो करो हमला, ईबार जितबे बांगला' (आप चाहे जितना भी हमला कर लें, इस बार जीत 'बांग्ला' की ही होगी)। ममता ने नरेटिव बनाया कि खतरा बंगाल की पहचान पर है।
बीजेपी ने इस नरेटिव का जवाब इस रूप में दिया कि तृणमूल घुसपैठियों को बढ़ावा देकर बंगाल की 'बांग्ला पहचान' मिटाने पर आमादा है।
मातृ शक्ति पर आरएसएस का शुरू से बल रहा है। पिछले कुछ सालों से चुनावी रूप से भी 'मातृ शक्ति' महत्वपूर्ण हो गई है। भाजपा ने इस बार इस शक्ति का आशीर्वाद पाने के लिए खूब जतन किए। केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून में संशोदन का दांव चला और भाजपा ने इसे मुद्दा बनाया। वहीं, महिलाओं के लिए सीधे नकद फायदा देने के कई वादे भी किए गए। रेप पीड़िता की मां को टिकट देकर भी एक संदेश देने की कोशिश की गई। इस तरह महिलाओं के सम्मान की संस्कृति को चुनाव से जोड़ा गया।