Bengal Elections:बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य के नये मुख्य सचिव बन सकते हैं। चुनाव आयोग ने ममता सरकार की लिस्ट खारिज कर इस तेज-तर्रार IAS अधिकारी को CEO की जिम्मेदारी सौंपी थी, ताकि बिना दबाव के चुनाव हो सकें।
IAS Officer: पश्चिम बंगाल की राजनीति और नौकरशाही में इन दिनों एक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में है। सन 1990 बैच के आईएएस अधिकारी और वर्तमान में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल के बारे में अटकलें तेज हैं कि 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद वे बंगाल के नए मुख्य सचिव बन सकते हैं। हाल ही में उनकी वर्तमान मुख्य सचिव दुष्यंत नारियाला से हुई मुलाकात ने इन अटकलों को और हवा दे दी है। माना जा रहा है कि 2026 में संभावित नई सरकार उनके 36 साल के बेदाग और शानदार प्रशासनिक करियर को देखते हुए उन्हें यह अहम जिम्मेदारी सौंप सकती है। ध्यान रहे कि चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी सरकार की ओर से प्रस्तावित नामों की सूची को नामंजूर करते हुए मनोज अग्रवाल को मुख्य निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किया था।
आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र रहे मनोज अग्रवाल की छवि एक बेहद ईमानदार और सख्त प्रशासक की है। उनका करियर कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। साल 2018 में जब वे खाद्य और आपूर्ति सचिव थे, तब उन्होंने जन वितरण प्रणाली में हो रही गड़बड़ियों को लेकर अधिकारियों को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। इस सख्त कदम के बाद उन्हें उस पद से हटाकर 'शंट' (किनारे) कर दिया गया था। हालांकि, उनकी बात तब सच साबित हुई जब अक्टूबर 2023 में सीबीआई ने राशन घोटाले में तत्कालीन मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक को गिरफ्तार किया।
पिछले साल दिसंबर में जब पूर्व सीईओ आरिज आफताब रिटायर हुए, तो चुनाव आयोग ने राज्य सरकार की ओर से भेजे गए तीन नामों की पहली सूची खारिज कर दी थी। आयोग का मानना था कि वे अधिकारी जूनियर थे और सत्ताधारी दल के करीब माने जाते थे। चुनाव आयोग एक ऐसा अधिकारी चाहता था जो 2026 के चुनावों के ठीक बाद रिटायर हो, ताकि उस पर चुनाव के दौरान सत्ताधारी पार्टी का कोई भविष्य का दबाव न रहे। ऐसे में जुलाई 2026 में रिटायर होने वाले मनोज अग्रवाल इस पद के लिए सबसे उपयुक्त पाए गए।
बंगाल में 2026 का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है। जहां सत्ताधारी टीएमसी और विपक्षी बीजेपी के बीच 'फर्जी वोटरों' और मतदाता सूची को लेकर लगातार घमासान मचा हुआ है, ऐसे में चुनाव आयोग को मतदाता सूची के संशोधन और शांतिपूर्ण चुनाव के लिए एक ऐसे ही निडर और पारदर्शी अधिकारी की तलाश थी। अब अग्रवाल के कंधों पर बंगाल के इस 'चुनावी चक्रव्यूह' को बिना किसी दबाव के पार लगाने की जिम्मेदारी है।
इस संभावित नियुक्ति पर प्रशासनिक और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह ईमानदार अधिकारियों के लिए एक बड़ा संदेश है। जो अधिकारी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकते, उन्हें आखिर उनकी निष्ठा का इनाम मिलता है। चुनाव आयोग का यह फैसला बंगाल में निष्पक्ष चुनाव की दिशा में एक 'मास्टरस्ट्रोक' माना जा रहा है।