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Western Ghats Draft Notification: पश्चिमी घाट पर फिर अटका फैसला, छह राज्यों में 56 हजार वर्ग किमी ईको-सेंसिटिव जोन का नोटिफिकेशन खत्म

Western Ghats Biodiversity: पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की प्रक्रिया एक बार फिर अधर में लटक गई है। राज्यों के बीच सहमति न बनने से केंद्र को नया मसौदा जारी करना पड़ सकता है, जबकि जैव विविधता संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की चुनौती लगातार गहराती जा रही है।
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Jul 28, 2026
Western Ghats Draft Notification
Western Ghats Draft Notification : फिर म्याद खत्म: पश्चिमी घाट को इको-सेंसिटिव जोन घोषित करने की 6ठी कोशिश भी बेनतीजा (फोटो- X- @incredibleindia)

UNESCO Western Ghats: करीब डेढ़ दशक से जारी पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area-ESA) घोषित करने की कवायद एक बार फिर आगे नहीं बढ़ सकी। 31 जुलाई 2024 को जारी छठे मसौदा अधिसूचना की वैधता 27 जुलाई को समाप्त हो गई, लेकिन छह राज्यों के बीच अंतिम सीमा निर्धारण और विकास संबंधी प्रतिबंधों पर सहमति नहीं बन पाई। ऐसे में अब केंद्र सरकार सातवां ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी करने की तैयारी कर रही है।

पर्यावरण मंत्रालय और राज्यों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत अभी भी जारी है। मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति राज्यों की आपत्तियों और सुझावों पर विचार कर रही है। अधिकारियों के अनुसार बातचीत सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और समिति जल्द अपनी अंतिम सिफारिशें सरकार को सौंप सकती है। समिति का कार्यकाल भी बढ़ाकर जुलाई 2027 तक कर दिया गया है।

2010 से चल रही है प्रक्रिया

पश्चिमी घाट की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में प्रक्रिया शुरू की थी। इसके बाद प्रसिद्ध पर्यावरणविद् माधव गाडगिल समिति ने 2011 में पूरे पश्चिमी घाट को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने की सिफारिश की थी।

हालांकि, बाद में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के पूर्व प्रमुख डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति ने रिपोर्ट की समीक्षा करते हुए अपेक्षाकृत सीमित क्षेत्र को संरक्षण देने का सुझाव दिया। इसी आधार पर 10 मार्च 2014 को पहला ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी हुआ। तब से अब तक छह मसौदे जारी हो चुके हैं, लेकिन कोई भी अंतिम रूप नहीं ले सका।

56,825 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रस्तावित

हालिया मसौदे में कुल 56,825.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ईको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने का प्रस्ताव था। इसमें राज्यवार प्रस्तावित क्षेत्र इस प्रकार है

गुजरात – 449 वर्ग किमी
महाराष्ट्र – 17,340 वर्ग किमी
गोवा – 1,461 वर्ग किमी
कर्नाटक – 20,668 वर्ग किमी
तमिलनाडु – 6,914 वर्ग किमी
केरल – 9,993.7 वर्ग किमी

इन राज्यों का कहना है कि प्रस्तावित सीमाओं और विकास गतिविधियों पर लगने वाले प्रतिबंधों का स्थानीय अर्थव्यवस्था, कृषि, बागान, पर्यटन और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से अंतिम सहमति अब तक नहीं बन सकी है।

क्या होंगे प्रतिबंध?

यदि पश्चिमी घाट का यह क्षेत्र आधिकारिक तौर पर ईको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित होता है तो वहां कई गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लागू होंगे। इनमें रेड कैटेगरी के प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग, नई खनन परियोजनाएं, पत्थर खदानें, थर्मल पावर प्लांट और बड़े पैमाने की विकास परियोजनाएं शामिल हैं।

हालांकि, खेती, बागवानी और स्थानीय समुदायों की पारंपरिक आजीविका को लेकर राज्यों ने कई व्यावहारिक सुझाव दिए हैं, जिन पर विशेषज्ञ समिति विचार कर रही है।

दुनिया के सबसे अहम जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल

करीब 1,600 किलोमीटर लंबी पश्चिमी घाट पर्वतमाला गुजरात से लेकर तमिलनाडु और केरल तक फैली हुई है। इसे दुनिया के आठ सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता हॉटस्पॉट में गिना जाता है। यहां कम से कम 325 वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियां पाई जाती हैं।

इसके पारिस्थितिक महत्व को देखते हुए यूनेस्को ने 2012 में पश्चिमी घाट के 39 स्थलों को विश्व धरोहर (World Heritage Site) का दर्जा दिया था। यह क्षेत्र देश की कई प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल भी है और करोड़ों लोगों के लिए जल सुरक्षा का आधार माना जाता है।

संसद में भी सरकार ने दी जानकारी

हाल ही में संसद में सरकार ने बताया था कि पश्चिमी घाट को ईको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित करने की प्रक्रिया जारी है। राज्यों से प्राप्त सुझाव, आपत्तियां और संशोधन विशेषज्ञ समिति को भेज दिए गए हैं। समिति संरक्षण, स्थानीय लोगों के अधिकार, विकास की जरूरतों और पर्यावरणीय संतुलन जैसे सभी पहलुओं का अध्ययन कर रही है। अंतिम रिपोर्ट मिलने के बाद ही केंद्र सरकार नया मसौदा या अंतिम अधिसूचना जारी करने पर फैसला लेगी।

क्यों अहम है यह फैसला?

जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित खनन, जंगलों की कटाई और तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण के कारण पश्चिमी घाट का पारिस्थितिक संतुलन लगातार दबाव में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संवेदनशील क्षेत्रों को समय रहते कानूनी संरक्षण नहीं मिला तो जैव विविधता, जल स्रोतों और वन्यजीवों पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। वहीं राज्य सरकारें चाहती हैं कि संरक्षण के साथ स्थानीय विकास और लोगों की आजीविका भी प्रभावित न हो। यही संतुलन साधना अब केंद्र सरकार और विशेषज्ञ समिति के सामने सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।

Updated on:
28 Jul 2026 10:35 am
Published on:
28 Jul 2026 10:27 am