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El Nino 2026: क्या है अल नीनो? जानिए भारत पर इसका असर और इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार की पूरी तैयारी

El Nino 2026 Effect: अल नीनो की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने मानसून और खेती से जुड़े हालात पर निगरानी बढ़ा दी है। जानिए अल नीनो क्या है, इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है और सरकार ने क्या तैयारियां की हैं।
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Jul 08, 2026
el nino 2026
एआई तस्वीर

नई दिल्ली। अल नीनो के संभावित प्रभाव से उपजी मानसून की अनिश्चितता के बीच केंद्र सरकार पूरी तैयारी, स्पष्ट रणनीति और मजबूत ग्राउंड एक्शन के साथ हालात को संभालने में जुटी है। चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन उनसे निपटने के लिए सिस्टम पहले से सक्रिय और सतर्क है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह ने बताया कि अल नीनो की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए मॉनिटरिंग सिस्टम पूरी तरह सक्रिय है। अल-नीनो मॉनिटरिंग सेल, क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप, राज्य स्तरीय कंट्रोल रूम और नियुक्त अधिकारी लगातार मानसून, बुवाई, फसल और बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

आपको बता दें कि अल नीनो मौसम से जुड़ी एक प्राकृतिक स्थिति है, जिसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। यह उस वक्त बनता है, जब प्रशांत महासागर के बीच और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। आमतौर पर यह स्थिति हर 2 से 7 साल में देखने को मिलती है। अगर समुद्र का तापमान बहुत अधिक बढ़ जाए और उसका असर कई देशों के मौसम पर गंभीर रूप से दिखाई देने लगे, तो उसे सुपर अल नीनो कहा जाता है। समुद्र में उठने वाली वो गर्म लहरें भारत के मानसून और खेती पर सीधा असर डालती हैं। दरअसल मौसम विशेषज्ञों को डर सता रहा है कि अल नीनो के असर से मानसून कमजोर पड़ सकता है और गर्मी ज्यादा बढ़ सकती है।

भारत पर असर

अल नीनो स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका मतलब 'छोटा बच्चा' होता है। यह नाम पेरू और इक्वाडोर के मछुआरों ने दिया था, क्योंकि यह मौसमीय बदलाव अक्सर क्रिसमस के समय शुरू होता है। अल नीनो का असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अलग तरह से दिखाई देता है। पेरू और इक्वाडोर जैसे दक्षिणी अमरीकी देशों में तेज बारिश, बाढ़ और भू-स्खलन की घटनाएं बढ़ सकती हैं। वहीं भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया के कई देशों में बारिश कम होने की आशंका रहती है, जिससे भीषण गर्मी, सूखा और पानी की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इस दौरान दुनिया का औसत तापमान भी बढ़ जाता है और कई जगह मौसम सामान्य से ज्यादा रूप ले लेता है।

देश में कम बारिश वाले जिलों की संख्या 178

वहीं दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि जून में 33 प्रतिशत कम बारिश के बाद जुलाई में स्थिति में सुधार आया है और अब यह कमी घटकर 24 प्रतिशत रह गई है। हाल के दिनों में देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हुई है, जिससे कम वर्षा वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 रह गई है। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के बाद दिल्ली में मीडिया से बातचीत में कहा कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में विशेष निगरानी रखी जा रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि जुलाई में बारिश और रफ्तार पकड़ेगी, जिससे खरीफ बुवाई में तेजी आएगी।

मानसून की देरी का दिखा असर

शिवराज सिंह ने बताया कि फिलहाल 350.85 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई है, जो पिछले साल के मुकाबले करीब 91.95 लाख हेक्टेयर कम है। मानसून में देरी का असर सोयाबीन और कपास पर पड़ा है, लेकिन किसानों को मक्का, बाजरा और मूंग जैसी कम अवधि और कम पानी वाली फसलों की बुवाई की सलाह दी गई है। सरकार ने इस चुनौती के लिए पहले ही अप्रैल से तैयारी शुरू कर दी थी। आईसीएआर के सहयोग से प्रभावित होने की संभावना वाले जिलों के लिए कंटिंजेंसी प्लान तैयार कर राज्यों के साथ साझा किए गए हैं। जून महीने में चलाए गए 'खेत बचाओ अभियान' के तहत 1.24 लाख से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और 80 लाख से ज्यादा किसानों तक सीधे पहुंच बनाई गई।

उन्होंने कहा कि बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए करीब 1.75 लाख क्विंटल का राष्ट्रीय बीज भंडार तैयार रखा गया है, ताकि किसी भी स्थिति में बुवाई प्रभावित न हो। साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड अभियान को तेज करते हुए 30 जून तक प्राप्त 1.14 लाख आवेदनों में से 94 हजार से अधिक को स्वीकृति दी जा चुकी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास जारी हैं, ताकि किसी भी संभावित नुकसान की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

Updated on:
08 Jul 2026 02:48 pm
Published on:
08 Jul 2026 02:43 pm