
क्या हम/आप भारत के नागरिक हैं? यह सवाल लगातार गंभीर ही होता जा रहा है। 29 जुलाई को कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि मतदाता पहचान पत्र (वोटर आईडी कार्ड), आधार संख्या, पैन और बैंक खाता होना नागरिकता का प्रमाण नहीं है। कुछ ही दिन पहले भारत सरकार ने कहा था कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। लेकिन, 30 जुलाई को सरकार ने राज्य सभा में एक सवाल के जवाब में साफ किया कि भारत सरकार केवल भारत के नागरिकों को ही पासपोर्ट जारी करती है। सरकार का यह रुख कई सवालों को जन्म देता है।
जब ये सारे दस्तावेज नागरिकता के प्रमाण नहीं हैं तो इनकी जरूरत क्या है? इन्हें जनता को देने पर उसका समय, श्रम और अगाध पैसा क्यों खर्च किया जा रहा है? अभी भी चुनाव आयोग कई राज्यों में विशेष सघन मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) करवा रहा है। चुनाव आयोग कहता है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को दुरुस्त करने के लिए कराई जाती है। लेकिन, इस प्रक्रिया के तहत जो मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर हो गया या हो जाएगा वह भारत का नागरिक नहीं माना जाएगा? वोट देने का अधिकार नहीं रखने वाला व्यक्ति भारत में बतौर नागरिक रहने का अधिकारी होगा? इसका उल्टा भी सोचिए, अगर कोई विदेशी नागरिक गलत तरीके से 'SIR की परीक्षा' पास कर गया तो उसे मतदान का अधिकार मिल जाएगा, जबकि कानूनन मतदान का अधिकार केवल भारत के नागरिक को ही मिलना चाहिए।
पश्चिम बंगाल में हमने देखा कि 'SIR की परीक्षा' में फेल अनेक लोगों को सरकारी स्कीम के फायदे से वंचित कर दिया गया। जब वोटर आईडी नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो इसके नहीं होने के आधार पर नागरिकों को मिलने वाली सरकारी सुविधा से कैसे वंचित किया जा सकता है?
यहां एक सवाल यह भी उठता है कि जो भारत का नागरिक नहीं है, उसके पास अगर आधार, भारतीय पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज़ हैं, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? उसके ये दस्तावेज़ बन कैसे गए? क्या यह सिस्टम की नाकामी नहीं है? इस नाकामी की जवाबदेही कौन लेगा? 'नागरिकों' ने इसका जो खामियाजा भुगता, उसका हरजाना कौन भरेगा?
सबसे बड़ा सवाल उठता है कि सरकार नागरिकता का प्रमाण किसे मानती है? वह जनता को इस भ्रम से तो निकाले। यहां जन्मजात नागरिकता की व्यवस्था है तो क्या केवल जन्म प्रमाण पत्र को ही नागरिकता का प्रमाण माना जाएगा? अगर ऐसा ही है तो पीछे की बात छोड़िए, आज की तारीख में भी सरकार सौ फीसदी बच्चों को जन्म प्रमाण पत्र देने में नाकाम क्यों हो रही है?
सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (सीआरएस) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2024 में देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में जन्मे हर पांचवे बच्चे का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। उत्तर प्रदेश में 81.8 फीसदी बच्चों का ही रजिस्ट्रेशन हो सक। गुजरात (91.7%), हरियाणा (94.5%), कर्नाटक (97.5%) और महाराष्ट्र (98.2%) जैसे राज्यों में भी शत-प्रतिशत जन्म का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। कुल 18 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में ही सभी बच्चों के जन्म का रजिस्ट्रेशन हो पाया।
सरकार ने जन्म के 21 दिन के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना कानूनन अनिवार्य कर रखा है। बच्चा कब और कहां पैदा हुआ, इसका शुरुआती प्रमाण यही है। यही दस्तावेज़ व्यक्ति को कानूनी पहचान देता है और सरकारी योजनाओं के लिए भी काम आता है। लेकिन आधार सिस्टम लागू होने के बाद बच्चों को भी आधार नंबर दिया जाने लगा और सरकारी योजनाओं या अन्य मकसद के लिए जन्म प्रमाण पत्र से ज्यादा अहमियत आधार को दिया जाता है। जन्म का रजिस्ट्रेशन करवाने या जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के मामले में कमी का यह भी एक कारण है। लोगों में जागरूकता की कमी, सरकारी विभागों में निष्क्रियता और संसाधनों की कमी इसके अन्य कारण हैं।
अगर जन्म प्रमाण पत्र ही नागरिकता का मूल प्रमाण है तो क्यों नहीं सरकार सारा ज़ोर उसे जारी करने पर लगाए और उसी दस्तावेज़ के आधार पर नागरिकों के सारे अधिकार निश्चित हों। चाहे वह वोट देने का अधिकार हो या कोई और अधिकार? कम से कम मौजूदा पीढ़ी के साथ तो समस्या खत्म हो और सरकार का इरादा साफ दिखे। ऐसा नहीं होने से उसकी मंशा ही शक के घेरे में आ जाती है और सवाल उठता है कि नागरिकता के मसले पर वह जनता को भ्रम-मुक्त करना चाहती है या भ्रम की स्थिति बनाए रख कर उसका लाभ उठाना चाहती है?