‘राजमहल’ के जरिए महलों के भीतर चलने वाले कुचक्र, भोग-विलास की घिनौनी तस्वीर सामने लाने के साथ महिला स्शक्तीकरण का संदेश भी दिया गया है। पढ़िए पुस्तक समीक्षा।
Crime Files: अपराध की दुनिया में साजिश की परतें इतनी गहरी होती हैं कि एक तह को उठाएं, तो नीचे भूलभुलैया मिलती है। इतनी अनगिनत गलियां कि कोई भी वहां भटक जाए। मगर एक जासूसी कथाकार को पता होता है कि अपराध की जड़ कहां पर है। अपराधी किन रास्तों से और कहां भागा है। दो मत नहीं कि कथाकार समाज का चिकित्सक होता है और वह किसी भी अपराध की तह में जाने से पहले उसे बखूबी समझता है। इसलएि अपने लेखन में वह मनोचकित्सिक लगता है, तो कभी समाजशास्त्री। पिछले एक दशक में जासूसी कथाकार के रूप में उभरे लेखक मुकेश भारद्वाज ने पश्चिम के मशहूर जासूसों के बरक्स पंजाबियत मिजाज वाले दुबले-पतले और लंबे कद के नौजवान ‘अभिमन्यु’ को पाठकों के समक्ष ला खड़ा किया है जो अपने काम के प्रति जुनूनी है। वह मुश्किल हालात में घबराता नहीं है, बल्कि मुस्कुराते हुए साजिश की परतें उधेड़ने में जुट जाता है। वह लोगों को हंसाता है, मीठा-सा तंज करता है और छोटी-छोटी बातों में बड़ी बात कह जाता है।
लेखक का मुख्य पात्र अभिमन्यु असाधारण जासूस है। ‘बेगुनाह’, ‘मेरे बाद’ और ‘माया ही मोक्ष है’ के बाद चौथे उपन्यास ‘राजमहल’ में एक बार फिर वह सामने है। वह अपराध से पहले और बाद की कड़ियों को जोड़ते हुए साजिश की अंतिम परत तक पहुंच जाता है। ‘राजमहल’ को पढ़ते हुए अभिमन्यु आसपास ही महसूस होता है। एक दिन दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में सिंह शस्त्र भंडार में पिस्तौल खरीदने आई युवती से बात करते हुए उसे पता नहीं था कि इस छोटी-सी मुलाकात से वह एक हत्याकांड की जड़ तक पहुंच जाएगा। टाटा घोष नाम की इस युवती को क्या अपनी हत्या का डर था? या वह किसी और की हत्या की साजिश रच रही थी? इस बीच अभिमन्यु की मुलाकात टाटा घोष की सहेली तमन्ना से होती है जो राजगढ़ रियासत की राजकुमारी है। उसके पिता अक्षदीप सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं। तमन्ना लंदन में पली-बढ़ी है। वहीं पढ़ाई की है। मगर उस पर राजमहल की झूठी शानो-शौकत हावी है। वह आज भी कथित राजशाही के दिखावे में जी रही है। उसे इस बात का खौफ है कि कोई उसकी जान ले सकता है। अपने ही राजमहल में उसे साजिश दिखाई देती है।
लेखक ने हाल ही में प्रकाशित उपन्यास ‘राजमहल’ के माध्यम से न केवल महलों के भीतर चलने वाले कुचक्रों को सामने रखा है, बल्कि भोग-विलास की घिनौनी तस्वीर भी सामने रख दी है। महलों के भीतर रहने वाले सामंती पुरुष किस तरह स्त्रियों को अपना शिकार बनाते हैं, ऐसी दुखांत कहानियां दबे-छुपे बाहर आती ही हैं। महलों में काम करने वाली स्त्रियां राजपुरुषों की हवस से कहां बच पाती हैं। राजगढ़ रियासत की कहानी रचते हुए कथाकार ने ऐसी तमाम स्त्रियों की पीड़ा सामने रखी है। हैरत की बात है कि राजकुमारी तमन्ना की मां सत्या भी राजमहल के छोटे महाराज से लेकर बड़े महाराज अक्षदीप सिंह की भोग लिप्सा की शिकार हुई। दूसरी ओर, राजकुमार सुदक्ष सिंह मधुमालिनी से बेइंतिहा प्रेम करता है। मंदिर में उससे शादी भी कर लेता है, लेकिन उसकी रहस्यमय मौत के बाद मधु भी कहां बच पाती है? रक्षदीप सिंह उसे भी अपनी हवस का शिकार बना लेता है। यही हाल रानी प्रलाक्षा सिंह का है।
स्त्री कमजोर हो या मजबूत, शिक्षित हो या अशिक्षित, वह पुरुषों के जोर-जुल्म से बच नहीं पाती। सभी उसकी देह से खेलना चाहते हैं। मगर ‘राजमहल’ के ज्यादातर स्त्री पात्र भीतर से कमजोर जरूर हैं, लेकिन उनमें बदले की भावना धधक रही है। वे पुरुषों की बनाई सामंती व्यवस्था का प्रतिशोध लेना चाहती हैं। राजमहल में साजिशों की परतें धीरे-धीरे और बारीकी से खोली गई हैं। मुख्य पात्र अभिमन्यु हमें वहां तक ले जाता है, जहां टाटा घोष की हत्या के तार जुड़े हैं। इस दौरान वह महल के भीतर राजनीतिक षड्यंत्र को रोकने और उसे सामने लाने की कोशिश करता है, लेकिन इस बीच वहां नाटकीय तरीके से गोली चलती है और राजकुमारी तमन्ना का कथित प्रेमी प्रतिकार सिंह घायल हो जाता है। प्रतिकार भी उसी सामंती व्यवस्था का प्रतीक है जो टाटा घोष के साथ प्रेम करता है, लेकिन राजकुमारी तमन्ना को भी अपनी झूठी मोहब्बत में उलझाए रखता है। इस तरह राजगढ़ रियासत स्त्रियों के शोषण का ‘राज’ महल है। मगर एक दिन स्त्रियों के शोषण के एक-एक राज खुलते दिखाई देते हैं।
सत्या सुहानी की शादी बेशक महाराज अक्षदीप सिंह से हुई थी, लेकिन उसका रास्ता भी शोषण से गुजरते ही निकला। बड़े भाई की विधवा को छोटे भाई ने अपनी जागीर समझ ली। इसी कारण सत्या ने महल छोड़ा। वहीं प्रलाक्षा सिंह जो आज आधुनिक विचारों की महिला होने के साथ स्वयं भी एक रियासत की रानी है, एक दौर में वह भी रक्षदीप सिंह के यौन शोषण का शिकार हुई। दुखद कि उसका पति अपने बेटे पर शक के निशान देखता रहा, लेकिन अपनी पत्नी के जिस्म पर यौन शोषण के निशान देखने से कतराता रहा।
इस उपन्यास में स्त्रियों की कमजोरी की ओर ध्यान दिलाया गया है। इसी के साथ यह नसीहत दी गई है कि अगर शोषण की शुरुआत में ही स्त्रियां प्रतिरोध दर्ज करें, तो स्थिति बदल सकती है। मगर आम तौर पर वे खामोश रहती हैं या फिर पलायन कर जाती हैं। जैसा कि सत्या ने किया। वह अपनी मासूम बेटी तमन्ना को राजमहल में छोड़ कर दिल्ली चली गई। जबकि उसे पता था कि उसके साथ जो हुआ, वह उसकी बेटी के साथ भी हो सकता है। आाखिर वही हुआ। लंदन से पढ़ाई कर लौटने के बाद उस भयावह रात को याद कर तमन्ना खुदकुशी करने की कोशिश करती है। वह पुलिस में शिकायत नहीं करती। लेखक ने सवाल उठाया है कि सामंती अपराध का बदला निजी प्रतिशोध से लेंगे, तो समाज कैसे बदल पाएगा?
राजकुमारी तमन्ना को छोड़ कर यहां सभी स्त्री पात्र मर्दवादी सोच के खिलाफ प्रतिशोध लेती दिखाई देती हैं। सभी रणनीतिक रूप से महल में आती हैं और रक्षदीप सिंह की सुनियोजित तरीके से हत्या कर देती हैं। अगर इन महिलाओं ने समय रहते आावाज उठाई होती, तो मामला अदालत में चलता। सभी को मालूम होता कि महलों में बैठे सामंती पुरुष स्त्रियों का किस तरह शोषण करते हैं। तब देश के लोग धिक्कार रहे होते। पुरुषों की सताई कितनी ही औरतें सड़कों पर उतर आतीं। इस उपन्यास का यही संदेश है कि स्त्रियों को अपराध के खिलाफ अपराधी नहीं बनना है। उन्हें अपने प्रतिरोध का स्वर ऊंचा करना होगा। यह दुनिया पुरुषों से नहीं, स्त्रियों से सुंदर बनती है। अकेला पुरुष कुछ नहीं कर सकता। उसे यह बताने की जरूरत है कि स्त्रियां अपने दम पर दुनिया रच सकती हैं। पुरुषों में उन्हें बस एक सच्चा प्रेमी चाहिए।
मुकेश भारद्वाज ने ‘राजमहल’ के माध्यम से न केवल नारी सशक्तीकरण का संदेश दिया है, बल्कि मर्दवादी सोच पर भी करारा प्रहार किया है। यह महज अपराध कथा भर नहीं है। यह समकालीन साहित्य में नया प्रयोग है। उनकी भाषा सरल-सहज और प्रवाहमय है। इसमें पंजाबियत का ‘फ्लेवर’ खास रस घोलता है। सबसे बड़ी बात कि मुख्य पात्र अभिमन्यु रिश्तों में उलझी रहस्य दुनिया को सुलझाता हुआ दिखता है। वह कोई सिरा छोड़ता नहीं है। ‘राजमहल’ को छापा है वाणी प्रकाशन ने। समाज, सरोकार और रोमांच को एक साथ महसूस करना है, तो इसे पढ़ सकते हैं।