Delhi High Court News: दिल्ली हाई कोर्ट ने 300 रुपए रिश्वत लेने के दोषी हेड कांस्टेबल सुमेर सिंह की एक साल की सजा बरकरार रखी। 1999 के इस मामले में कोर्ट ने भ्रष्टाचार पर सख्त टिप्पणी की।
Delhi High Court:दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 1999 के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए हेड कांस्टेबल सुमेर सिंह की सजा के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने आरोपी को चोरी की मोटरसाइकिल की आरसी (RC) लौटाने के बदले 300 रुपये की रिश्वत लेने का दोषी पाया है।
यह मामला अप्रैल 1999 का है, जब शिकायतकर्ता की मोटरसाइकिल चोरी हो गई थी और पटेल नगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने बाद में बाइक को मथुरा से बरामद कर लिया। इस मामले की जांच हेड कांस्टेबल सुमेर सिंह कर रहे थे। अदालती आदेश के बाद शिकायतकर्ता को अपनी मोटरसाइकिल तो मिल गई, लेकिन हेड कांस्टेबल ने उसकी ओरिजिनल आरसी यह कहकर अपने पास रख ली कि इसे केस फाइल में शामिल करना होगा। आरोप है कि बार-बार अनुरोध के बावजूद सुमेर सिंह ने आरसी लौटाने के लिए पहले 3,000 रुपए की मांग की, जिसे बाद में घटाकर 300 रुपए कर दिया गया।
3 अप्रैल 2000 को शिकायतकर्ता ने इसकी जानकारी भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (ACB) को दी, जिसके बाद जाल बिछाया गया। छापे के दौरान सुमेर सिंह को रंगे हाथों पकड़ा गया और उसकी जेब से रिश्वत के पैसे बरामद किए गए। अक्टूबर 2006 में ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए एक साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कांस्टेबल की बेगुनाही की दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि केवल पैसे की बरामदगी रिश्वत के आरोप को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लेकिन अवैध लाभ की मांग को मामले की परिस्थितियों से समझा जा सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि मोटरसाइकिल की बरामदगी से लेकर रिश्वत के नोटों की जब्ती तक के सभी घटनाक्रम आपस में जुड़कर दोष की एक अटूट कड़ी बनाते हैं, जो आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त है। इसके साथ ही, कोर्ट ने पुलिस के उस तर्क को भी स्वीकार किया कि चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद केस डायरी या संबंधित फाइलें पुलिस स्टेशन में मौजूद रह सकती हैं, जिससे यह पुख्ता होता है कि आरसी लौटाने के नाम पर रिश्वत मांगी गई थी।