
Delhi Bus Gangrape: दिल्ली के रानी बाग इलाके में एक चलती स्लीपर बस में महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म की जघन्य वारदात सामने आई है। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चालक और परिचालक को गिरफ्तार कर बस को कब्जे में ले लिया है। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, पीड़िता ने अपने बीमार पति और तीन मासूम बच्चों की जिम्मेदारी के कारण अस्पताल में भर्ती होने से मना कर दिया।
यह खौफनाक घटना दिल्ली-बिहार रूट पर चलने वाली रॉयल ट्रैवल्स एंड कारगो की एक नारंगी और काले रंग की स्लीपर बस में हुई। पीड़िता सोमवार रात जब फैक्ट्री से काम खत्म कर घर लौट रही थी, तब सरस्वती विहार के पास बस स्टैंड पर खड़े आरोपियों ने उसे जबरन खींचकर बस के अंदर बंधक बना लिया।
पुलिस के अनुसार, रानी बाग थाने में भारतीय न्याय संहिता BNS की विभिन्न धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। गिरफ्तार आरोपियों में बस का ड्राइवर और कंडक्टर शामिल हैं। शुरुआती पड़ताल में यह बात सामने आई है कि बस के शीशे बंद थे और भारी पर्दे लगे होने के कारण पीड़िता की चीखें और अंदर की हरकतें बाहर किसी को सुनाई या दिखाई नहीं दे सकीं।
आरोपियों ने पीड़िता को अगवा करने के बाद करीब दो घंटे तक बस को दिल्ली की सड़कों पर इधर-उधर घुमाया। इस दौरान लगभग 7 किलोमीटर के सफर में दोनों आरोपियों ने महिला के साथ बारी-बारी से कुकृत्य किया। रात करीब 2 बजे, जब पीड़िता की हालत ज्यादा नाजुक हो गई और वह खून से लथपथ हो गई, तो दरिंदों ने उसे नांगलोई मेट्रो स्टेशन के पास सड़क पर फेंक दिया और मौके से फरार हो गए। पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने बस से साक्ष्य जुटाए हैं, वहीं महिला को चिकित्सा सहायता के लिए अस्पताल ले जाया गया। मेडिकल जांच में सामूहिक बलात्कार की पुष्टि हुई है।
दरिंदों के चंगुल से निकलने के बाद पीड़िता ने पुलिस को अपने साथ हुई घटना की सूचना दी। पहली कॉल नांगलोई पुलिस स्टेशन को गई, लेकिन चूंकि अपराध स्थल रानी बाग पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता था, इसलिए मामला ट्रांसफर कर दिया गया। एक महिला सब-इंस्पेक्टर पीड़िता को अस्पताल ले गईं।
डॉक्टरों ने पीड़िता की गंभीर हालत को देखते हुए उसे अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी, लेकिन उसने इनकार कर दिया। उसने बताया कि उसके पति को टीबी है और वे घर पर ही रहते हैं। दंपति की तीन बेटियां हैं, जिनकी उम्र 8, 6 और 4 साल है। अस्पताल में भर्ती होने पर बच्चों का पेट कौन भरेगा, इस चिंता में उसने गंभीर चोटों के बावजूद घर पर ही इलाज कराने का विकल्प चुना। बच्चों की देखभाल और उनके भोजन की चिंता के कारण, पीड़िता ने अस्पताल में रहने के बजाय घर पर ही रहकर उपचार कराने का कठिन फैसला लिया।