Landlord and Tenant Dispute: दिल्ली हाईकोर्ट में मकान मालिक ने तर्क दिया कि संपत्ति का बाजार मूल्य अत्यधिक बढ़ चुका है। इसलिए वह 10 लाख रुपये प्रति माह की बाजार दर से किराया वसूलने का हकदार है।
Landlord and Tenant Dispute: दिल्ली हाईकोर्ट ने किराए से जुड़े कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यदि मकान मालिक बाजार दर से किराया वसूलने के लिए सिविल कोर्ट में केस करता है तो वह मुकदमा सुनवाई योग्य है। बशर्ते उसमें बेदखली की बात न हो। यानी अगर कोई मकान मालिक अपनी संपत्ति का बाजार दर के हिसाब से किराया बढ़ाता है और किराएदार उसे अदा करने में आनाकानी करता है तो यह मामला सिविल कोर्ट में सुना जा सकता है और उचित निर्णय लिया जा सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट 1958 (DRC Act) की धारा 50 के तहत सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर कोई रोक नहीं लगती। यह फैसला जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने सुनाया। इसके साथ ही दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के एकल न्यायाधीश के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के तहत मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह मामला रेंट कंट्रोलर के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है।
दरअसल, सिविल कोर्ट में झटका मिलने के बाद मकान मालिक ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ मामले को बारीकी से समझा। इसके बाद खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 4, 6 और 9 मानक किराया (स्टैंडर्ड रेंट) तय करने से संबंधित थीं। इन धाराओं को पहले ही असंवैधानिक घोषित किया जा चुका है। इसके बाद मानक किराया तय करने के लिए कानून में कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं बची है। इसलिए यह मामला ‘वैधानिक शून्यता’ (Statutory Vacuum) के अंतर्गत आता है। खंडपीठ ने आगे कहा कि जब किसी विशेष कानून में विवाद का उपचार उपलब्ध नहीं है तो सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र स्वतः एक्टिव रहता है। इसलिए बाजार दर पर किराये की वसूली से जुड़े दावों की सुनवाई सिविल कोर्ट में की जा सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट में किराए के विवाद का यह मामला आत्माराम बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम एम्बेसी रेस्टोरेंट एवं अन्य से जुड़ा है। इस मामले में अपीलकर्ता मकान मालिक ने अपनी याचिका में बताया कि उसने साल 2006 में दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित डी-ब्लॉक की एक व्यावसायिक संपत्ति को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। मकान मालिक के अनुसार, यह व्यावसायिक संपत्ति साल 1947 से प्रतिवादी एम्बेसी रेस्टोरेंट के पास किराये पर थी। मकान मालिक के अनुसार, इस संपत्ति का अंतिम सहमत किराया मात्र 312.69 रुपये प्रति माह था। सिविल कोर्ट में दायर किए वाद में मकान मालिक ने तर्क दिया था कि समय के साथ इस संपत्ति का बाजार मूल्य अत्यधिक बढ़ चुका है। इसलिए वह इस संपत्ति का 10 लाख रुपये प्रति माह की बाजार दर से किराया लेने का हकदार है।
लॉ ट्रेंड के अनुसार, मकान मालिक के तर्क सुनकर 16 मार्च 2012 को सिविल कोर्ट में एकल न्यायाधीश ने यह मुकदमा खारिज कर दिया। इस दौरान एकल न्यायाधीश ने कहा कि किराये में बढ़ोतरी डीआरसी एक्ट की धारा 6A के तहत नियंत्रित होती है और यह मामला रेंट कंट्रोलर के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए सिविल कोर्ट इस मामले को खारिज करती है। सिविल कोर्ट के इस आदेश को मकान मालिक ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए मामला उसी के अधिकार क्षेत्र का बताया।
दिल्ली हाईकोर्ट में लगाई गई याचिका में मकान मालिक ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश 7 नियम 11 के तहत कोई भी मुकदमा तभी खारिज किया जा सकता है, जब वाद पत्र से ही स्पष्ट हो जाए कि वह कानून द्वारा वर्जित है। मकान मालिक ने तर्क दिया कि मानक किराये से संबंधित सभी प्रावधान रद हो चुके हैं, इसलिए बाजार दर पर किराया तय करने पर फिलहाल कोई वैधानिक रोक नहीं है। दूसरी ओर, प्रतिवादी यानी किराएदार ने तर्क दिया कि भले ही कुछ धाराएं रद हुई हों, लेकिन धारा 6A अभी भी प्रभावी है, जो किराये में बढ़ोतरी को नियंत्रित करती है। दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद कहा कि धारा 6A केवल सहमत किराये में हर तीन साल में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी की बात करती है, लेकिन बाजार दर पर नया किराया तय करने की कोई व्यवस्था इसमें नहीं बताई गई है। इसके अलावा मकान मालिक ने किराएदार की बेदखली के संबंध में कोई मांग नहीं की है। इसलिए यह मामला रेंट कंट्रोलर के अधिकार क्षेत्र में भी नहीं आता। दिल्ली हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के धुलाभाई बनाम मध्य प्रदेश के फैसले का हवाला देकर कहा कि सिविल कोर्ट का अधिकार तभी खत्म होता है, जब किसी विवाद का विशेष न्यायाधिकरण के पास पूर्ण और प्रभावी उपचार उपलब्ध हो।
दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने वादी यानी मकान मालिक की अपील स्वीकार करते हुए सिविल कोर्ट के एकल न्यायाधीश का आदेश पलट दिया। इसके साथ ही मुकदमे को उसके मूल नंबर पर बहाल करते हुए अदालत ने पक्षकारों को निर्देश दिया कि वे 15 जनवरी 2026 को संबंधित एकल न्यायाधीश के समक्ष फिर से उपस्थित हों, जहां उनके मामले की निष्पक्ष तरीके से सुनवाई की जाएगी। यह फैसला उन हजारों मकान मालिकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो पुराने किरायों और बदली हुई कानूनी स्थिति के कारण बाजार दर पर उचित किराया पाने में असमर्थ थे।