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शिमला में पुलिस vs पुलिस: BNSS के नए नियमों की उड़ी धज्जियां, क्या दिल्ली पुलिस ने पार की लक्ष्मण रेखा?

BNSS Interstate Arrest Rules: दिल्ली और शिमला पुलिस के बीच कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर विवाद संघीय ढांचे पर सवाल उठाता है, लेकिन BNSS के तहत अंतरराज्यीय गिरफ्तारी के स्पष्ट कानूनी प्रावधान हैं जिनका पालन किया जाना अनिवार्य है।

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BNSS Interstate Arrest Rules:दिल्ली और शिमला पुलिस के बीच का विवाद भारत के संघीय ढांचे में नई BNSS गाइडलाइन्स और अंतरराज्यीय गिरफ्तारी के नियमों के महत्व को दर्शाता है। प्रशासनिक तालमेल बनाए रखने के लिए स्थानीय पुलिस के साथ समन्वय और ट्रांजिट रिमांड जैसे कानूनी प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य है।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर दिल्ली पुलिस और शिमला पुलिस के बीच खींचतान ने संघीय ढांचे और अंतरराज्यीय पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर नियमों के उल्लंघन और सहयोग न करने का आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि कानून किसके साथ है और पुलिस आखिर किसी आरोपी की गिरफ्तारी के लिए कहां तक जा सकती है?

अंतरराज्यीय गिरफ्तारी पर क्या कहता है कानून?

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक पहले अंतरराज्यीय गिरफ्तारी की जो प्रक्रिया CrPC में दी गई थी, उसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता BNSS में शामिल कर लिया गया है, जिसके तहत पुलिस को इस संबंध में कुछ विशेष और स्पष्ट शक्तियां दी गई हैं।

ये हैं विशेष शक्तियां

धारा 43 – देशभर में पीछा कर गिरफ्तारी का अधिकार
इस प्रावधान के तहत किसी भी राज्य की पुलिस आरोपी का पीछा करते हुए भारत के किसी भी हिस्से में उसे गिरफ्तार कर सकती है। यानी अधिकार क्षेत्र राज्य की सीमा तक सीमित नहीं है।

धारा 77 – दूसरे राज्य में वारंट की तामील
यदि गिरफ्तारी वारंट के आधार पर है, तो दूसरे राज्य में उसकी तामील स्थानीय मजिस्ट्रेट या पुलिस की सहायता से की जानी चाहिए।

धारा 78 – ट्रांजिट रिमांड का प्रावधान
गिरफ्तारी के बाद आरोपी को निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश कर ट्रांजिट रिमांड लेना आवश्यक है, ताकि उसे संबंधित राज्य में ले जाया जा सके।

धारा 185 – जांच व तलाशी के लिए लिखित अनुरोध
दूसरे राज्य में तलाशी या साक्ष्य जुटाने के लिए संबंधित थाने या अधिकारी को लिखित अनुरोध भेजना होता है।

क्या स्थानीय पुलिस की मौजूदगी जरूरी है?

व्यावहारिक और न्यायिक मानकों के अनुसार, दूसरे राज्य में ऑपरेशन के दौरान स्थानीय पुलिस को सूचना देना और उन्हें साथ रखना एक आदर्श प्रक्रिया मानी जाती है। क्योंकि कानून पुलिस को पूरे देश में कार्रवाई की शक्ति देता है, फिर भी संघीय ढांचे की गरिमा और बेहतर प्रशासनिक तालमेल के लिए स्थानीय पुलिस का सहयोग लेना अनिवार्य समझा जाता है।

संघीय ढांचा और पुलिस की शक्ति

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक वरिष्ठ अधिवक्ता आरके सिंह के अनुसार, संविधान की सातवीं अनुसूची में पुलिस को राज्य सूची Entry 2 में रखा गया है। यानी पुलिस राज्य सरकार के अधीन होती है। दिल्ली पुलिस सीधे केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। वहीं शिमला पुलिस हिमाचल प्रदेश सरकार के नियंत्रण में है। प्रशासनिक नियंत्रण अलग-अलग होने के बावजूद, आपराधिक प्रक्रिया कानून पूरे देश में एक समान लागू होता है। यही वजह है कि जांच और गिरफ्तारी की शक्ति पैन-इंडिया स्तर पर मान्य है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका जैसे संघीय ढांचे में भी इस तरह की अखिल भारतीय गिरफ्तारी व्यवस्था नहीं है जैसी भारत में है।

टकराव की स्थिति में क्या रास्ता?

अगर दो राज्यों की पुलिस के बीच कोई टकराव होता है, तो उसे सुलझाने का सबसे सही तरीका डीजीपी जैसे उच्च स्तर के अधिकारियों के बीच बातचीत है। चूंकि BNSS में ऐसे विवादों के निपटारे के लिए कोई अलग से धारा नहीं दी गई है, इसलिए यह पूरी तरह संघीय सौहार्द यानी राज्यों के आपसी तालमेल पर टिका होता है। यदि विवाद गहराता है, तो मामला हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है, जहां शीर्ष अदालत ने हमेशा राज्यों के बीच सहयोग और संवैधानिक संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है।

आखिर कौन सही?

कानूनी तौर पर किसी भी राज्य की पुलिस के पास देश के किसी भी कोने से आरोपी को पकड़ने की शक्ति है। हालांकि, इस प्रक्रिया में स्थानीय पुलिस को सूचित करना, वारंट की सही तामील और ट्रांजिट रिमांड के नियमों का पालन करना जरूरी है। अगर इन नियमों की अनदेखी की जाती है, तो पूरी कार्रवाई की न्यायिक जांच हो सकती है। असल में, यह मामला अब सिर्फ एक गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे संघीय ढांचे और प्रशासनिक तालमेल के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।