
CJP Collective Hunger Strike: दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर आंदोलन अब निर्णायक दौर में पहुंचता नजर आ रहा है। लगातार 17 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने के बाद आंदोलन से जुड़े संगठन सीजेपी (CJP) ने बड़ा फैसला लिया है। संगठन ने घोषणा की है कि 16 जुलाई से बड़ी संख्या में उसके सदस्य सामूहिक भूख हड़ताल पर बैठेंगे, ताकि आंदोलन को और मजबूती मिल सके।
आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और लगातार सामने आ रहे पेपर लीक मामलों के विरोध में हुई थी। समय के साथ यह प्रदर्शन अब केवल परीक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि शिक्षा सुधार और जवाबदेही की मांग का बड़ा मंच बन गया है। जंतर-मंतर पर हर दिन छात्रों, युवाओं और विभिन्न संगठनों के लोग पहुंचकर अपना समर्थन जता रहे हैं।
सोनम वांगचुक के साथ कई छात्र भी 28 जून से भूख हड़ताल पर डटे हुए हैं। इनमें एआइएसए (AISA) से जुड़े छात्र-छात्राएं भी शामिल हैं। लगातार अनशन के कारण कई प्रदर्शनकारियों की तबीयत खराब हो चुकी है और कुछ को इलाज के लिए अस्पताल भी ले जाना पड़ा। डॉक्टरों की निगरानी के बावजूद आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अडिग हैं।
सीजेपी का कहना है कि अब आंदोलन को और व्यापक बनाया जाएगा। संगठन के मुताबिक, सोनम वांगचुक की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए अकेले उनके भरोसे आंदोलन नहीं छोड़ा जा सकता। इसी वजह से 16 जुलाई से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता सामूहिक रूप से भूख हड़ताल में शामिल होंगे, ताकि आंदोलन की गति बनी रहे और सरकार तक उनकी आवाज और मजबूती से पहुंचे।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की है। उनका आरोप है कि लगातार हो रहे पेपर लीक मामलों ने लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है। इसके अलावा भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग भी आंदोलन का हिस्सा है।
इस बीच आंदोलन को राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से आंदोलन के प्रति समर्थन जताया है। पार्टी के कई सांसद भी जंतर-मंतर पहुंचकर प्रदर्शनकारियों से मुलाकात कर चुके हैं और उनकी मांगों को जायज बताया है।
जंतर-मंतर पर बढ़ती भीड़ और अलग-अलग संगठनों के जुड़ने से यह आंदोलन अब राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनता जा रहा है। ऐसे में सभी की निगाहें 16 जुलाई पर टिकी हैं, जब सामूहिक भूख हड़ताल शुरू होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि आंदोलन का यह नया चरण सरकार और प्रशासन पर कितना असर डालता है और प्रदर्शनकारियों की मांगों पर क्या फैसला सामने आता है।