Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और 12 राज्यों को नोटिस जारी किया है।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने देश में लागू धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक अहम जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और 12 राज्य सरकारों को नोटिस जारी किया है। यह याचिका नेशनल काउंसिल ऑफ चर्चेज इन इंडिया (NCCI) की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि अलग-अलग राज्यों में लागू धर्मांतरण रोधी कानून संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
सोमवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र और संबंधित राज्यों से चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस नई जनहित याचिका को धर्मांतरण रोधी कानूनों से जुड़ी पहले से लंबित अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ा जाएगा, ताकि पूरे मामले की एकसाथ सुनवाई हो सके। इसके लिए तीन जजों की एक विशेष पीठ गठित की जाएगी।
याचिका में एनसीसीआई ने धर्मांतरण रोधी कानूनों के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि इन कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है और इसका असर धार्मिक स्वतंत्रता, निजी जीवन और अंतरात्मा की आज़ादी जैसे मौलिक अधिकारों पर पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राज्यों, जैसे ओडिशा और राजस्थान, ने अपने अलग कानून बनाए हैं या मौजूदा कानूनों में संशोधन किए हैं, जिन्हें पहले दायर याचिकाओं में चुनौती नहीं दी गई थी।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि धर्मांतरण रोधी कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाएं पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार इस मामले में अपना जवाब तैयार कर चुकी है और जल्द ही उसे दाखिल किया जाएगा। गौरतलब है कि देश के कई राज्यों में जबरन, लालच या धोखे से धर्मांतरण रोकने के नाम पर सख्त कानून लागू हैं। इन कानूनों को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। एक तरफ सरकारें इन्हें सामाजिक संतुलन और कानून-व्यवस्था से जोड़कर देखती हैं, वहीं दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों और धार्मिक संस्थाओं का कहना है कि इनका इस्तेमाल उत्पीड़न के लिए किया जा रहा है।
अब सुप्रीम कोर्ट के इस कदम के बाद धर्मांतरण रोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता पर देश की सर्वोच्च अदालत में एक बार फिर व्यापक बहस होने की उम्मीद है। आने वाली सुनवाई में यह साफ होगा कि इन कानूनों पर रोक लगेगी या नहीं और केंद्र व राज्य सरकारें इनका बचाव कैसे करती हैं।