Tarun Murder Case Delhi: तरुण हत्याकांड की सुनवाई करते हुए पीठासीन अधिकारी चित्रांशी अरोड़ा ने 9 अप्रैल को अपना फैसला सुनाया। उन्होंने दोनों नाबालिग आरोपियों की जमानत याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में इन किशोरों को रिहा करना सही नहीं होगा।
Uttam Nagar Holi Case: दिल्ली के उत्तम नगर में होली की रात हुई तरुण की हत्या के मामले में किशोर न्याय बोर्ड JJB ने कड़ा रुख अपनाया है। बोर्ड ने मामले के दो नाबालिग आरोपियों की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि उनकी रिहाई से इलाके की शांति भंग हो सकती है और खुद उनकी सुरक्षा को भी खतरा हो सकता है।
यह पूरी घटना पिछले महीने 4 मार्च को होली की रात हुई थी। उत्तम नगर में रहने वाले दो अलग-अलग समुदायों के बीच रंग लगाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। विवाद तब बढ़ा जब तरुण के परिवार की एक बच्ची ने फेंका गया पानी का गुब्बारा गलती से पड़ोसी परिवार की एक महिला को लग गया। इस मामूली बात ने बड़े झगड़े का रूप ले लिया, जिसमें तरुण गंभीर रूप से घायल हो गया और बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई।
युवक की हत्या के मामले में आरोपी बनाए गए दोनों नाबालिगों द्वारा दायर जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, पीठासीन अधिकारी चित्रांशी अरोड़ा ने 9 अप्रैल को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस समय नाबालिगों की रिहाई उचित नहीं है, क्योंकि उनकी रिहाई से इलाके में तनाव बढ़ सकता है, और जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने का खतरा है।
इसके अलावा बोर्ड ने कहा कि दोनों आरोपियों को राहत देने से न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा भी कम हो सकता है। बोर्ड ने यहां तक कहा कि वर्तमान माहौल को देखते हुए उनके लिए भी खतरा है, और उनकी रिहाई से उन्हें शारीरिक और मानसिक खतरे का सामना भी करना पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान JJB ने जांच अधिकारी की दलीलों पर गौर किया, जिसमें कहा गया था कि इस घटना से इलाके में समुदायों के बीच तनाव पैदा हो गया है, और इसका सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर गहरा असर पड़ा है।
बचाव पक्ष ने कोर्ट में दलील दी कि जेल में रहने से इन नाबालिगों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है। हालांकि, बोर्ड ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट कहा कि शिक्षा बेशक जरूरी है, लेकिन समाज की सुरक्षा और इन किशोरों का सुरक्षित सुधार उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। बोर्ड का मानना है कि हिरासत में रहने के दौरान भी वे एक अनुशासित माहौल में रहेंगे, जहां उन्हें काउंसलिंग, पढ़ाई की सुविधा और जरूरत पड़ने पर इलाज मिलता रहेगा। इसलिए, पढ़ाई के आधार पर उन्हें इस समय रिहा करना उचित नहीं है।
बोर्ड ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत 'बच्चे का सर्वोत्तम हित' ही सर्वोपरि है और नाबालिगों को सुरक्षात्मक हिरासत में रखना कोई सजा नहीं है, बल्कि उनकी देखभाल, सुरक्षा, मानसिक स्थिरता और पुनर्वास के लिए जरूरी है। बोर्ड ने अपनी बात के समर्थन में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत दी गई न्याय की अवधारणा को भी स्पष्ट किया।