Crude Oil Impact: मिडल ईस्ट में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारत के बुनियादी ढांचे र होने वाले सरकारी खर्च में कमी आ सकती है।
Crude Oil Impact: आर्थिक संकट यह संकेत कर रहा है कि कच्चे तेल का संकट गहरा सकता है। इससे रसोई और गाड़ियों की रफ्तार महंगी होने का अंदेशा जताया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतें और मध्य पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव आने वाले समय में भारत की रफ्तार धीमी कर सकते हैं। एचएसबीसी म्यूचुअल फंड की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस वैश्विक संकट के कारण भारत सरकार के लिए बुनियादी ढांचे पर अपना खर्च बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
रिपोर्ट में यह साफ किया गया है कि मिडिल ईस्ट के मौजूदा हालात का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। कच्चे तेल के महंगे होने और डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही कमजोरी की वजह से देश पर व्यापक आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस वैश्विक तनाव का जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला, तो वित्त वर्ष 2027 में देश की आर्थिक विकास दर प्रभावित हो सकती है।
वर्तमान समय में सरकार आम जनता को राहत देने के लिए बढ़ी हुई ऊर्जा कीमतों और तेल के बोझ का एक बड़ा हिस्सा खुद संभाल रही है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू यह भी है कि इससे सरकार की वित्तीय क्षमता पर असर पड़ रहा है। इस अतिरिक्त वित्तीय बोझ के कारण निकट भविष्य में सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर आक्रामक रूप से पैसा खर्च करने की सरकार की क्षमता सीमित हो सकती है।
तमाम वैश्विक चुनौतियों और अनिश्चितताओं के बाद भी एचएसबीसी म्यूचुअल फंड भारत के भविष्य को लेकर भरोसा जता रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत का निवेश चक्र मध्यम अवधि में बेहतर रहने की उम्मीद है। इसके पीछे मुख्य वजह सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे पर लगातार ध्यान देना, घरेलू विनिर्माण को मिल रहा नीतिगत समर्थन और निजी निवेश में सुधार आना है। इसके अलावा, भारत के यूरोपीय संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ होने वाले संभावित व्यापार समझौते भी गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं। इनसे निर्यात में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और निजी कंपनियों को पूंजी लगाने के नए अवसर मिलेंगे।
शेयर बाजार के लिहाज से देखें तो निफ्टी का मौजूदा मूल्यांकन पिछले 10 साल के औसत के करीब है, जिससे यह निवेश के लिए अधिक तार्किक और संतुलित नजर आ रहा है। लंबी अवधि के लिए बाजार का दृष्टिकोण सकारात्मक है, भले ही शॉर्ट टर्म में भू-राजनीतिक तनाव के कारण उतार-चढ़ाव बना रहे।
हालांकि, रिपोर्ट में महंगाई को लेकर मौसम के मिजाज पर भी चिंता जताई गई है। यदि इस बार मानसून सामान्य से कम रहता है, तो खाद्य उत्पादन घटने की आशंका है, जिससे आने वाले दिनों में आम आदमी के रसोई का बजट बिगड़ सकता है।
इस रिपोर्ट पर बाजार विश्लेषकों का कहना है कि सरकार के लिए 'इन्फ्रास्ट्रक्चर पुश' और 'राजकोषीय घाटे' को संतुलित रखना एक कठिन परीक्षा होगी। तेल आयात बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा पर दबाव बढ़ेगा, जिससे रिज़र्व बैंक के लिए भी ब्याज दरों में कटौती का फैसला टालना पड़ सकता है।
आने वाले हफ्तों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ओपेक देश कच्चे तेल के उत्पादन में कोई बदलाव करते हैं या नहीं। इसके साथ ही, आगामी तिमाही के सरकारी खर्च के आंकड़े और मानसून के पहले अग्रिम अनुमानों पर निवेशकों की पैनी नजर रहेगी। इस पूरे संकट का एक वैकल्पिक पहलू यह भी है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत को 'हरित ऊर्जा' और इलेक्ट्रिक वाहनों की तरफ तेजी से कदम बढ़ाने के लिए मजबूर कर सकती हैं, जो दीर्घकालिक रूप से आत्मनिर्भरता के लिए सही कदम होगा। (इनपुट: ANI)