
World Tiger Day : क्या आप जानते हैं कि दुनिया के 75 फीसदी से भी अधिक बाघों के आशियाने भारत में जंगल के इन राज्यों में 'अमीरी' और 'गरीबी' की अनोखी कश्मकश चल रही है। कहीं बाघों की ज़िंदगी शाही ठाट बाट जैसी दिखती है, तो कहीं कुछ बाघ अपने अस्तित्व की लड़ाई में दिन प्रतिदिन कमजोर पड़ते जा रहे हैं। यह विरोधाभास इतना गहरा है कि लगता है मानो जंगल के भीतर भी दो अलग अलग समाज बसते हों।
एक जहां समृद्धि की चमक है। बाघ 'अमीरी' की बुलंदियों को छू रहे हैं तो कुछ बाघों के समक्ष 'गरीबी' के चलते भूखे मरने की नौबत आ रही है। हालांकि सरकार की ओर से 'अमीरी' और 'गरीबी' की इस खाई को पाटने की कोशिश की जा रही है लेकिन यह प्रयास तब तक सफल होते दिखाई नहीं देते जब तक इंसान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ जाता।
वर्ष 2022 की राष्ट्रव्यापी गणना के अनुसार देश में बाघों की अनुमानित संख्या 3,682 है। यह संख्या वर्ष 2006 के 1,411 बाघों की तुलना में ढाई गुना से भी ज़्यादा है। यह आंकड़ा जितना गर्व करने लायक है, उतना ही चिंताजनक भी। क्योंकि 3,682 बाघ कहना ऐसे है जैसे किसी देश की "औसत आय" बताकर यह मान लेना कि हर नागरिक उतना ही कमाता है। हकीकत में बाघों की दुनिया भी इंसानों की दुनिया जैसी ही असमान है। कुछ बाघ "अमीर" इलाकों में राज करते हैं, तो कुछ "गरीबी" में जूझते हुए विलुप्ति के कगार पर खड़े हैं।
"अमीरी" और "गरीबी" शब्द रूपक के रूप में इस्तेमाल किए गए हैं। स्टेटस ऑफ टाइगर्स, को-प्रीडेटर्स एंड प्रे इन इंडिया, 2022 की रिपोर्ट पर गौर करें तो "अमीर" बाघ वह है जिसके पास भरपूर संसाधन हैं। लंबा चौड़ा घना जंगल है। प्रचुर मात्रा में शिकार है। पीने के लिए पानी है। मानवीय हस्तक्षेप से सुरक्षित कॉरिडोर है। "गरीब" बाघ वह है जिसका आवास दबाव में है। उसे शिकार के लिए भटकना पड़ता है। उसके इलाके में मानवीय दखल बहुत ज्यादा है। उसे अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है।
उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बाघ दुनिया के सबसे 'अमीर' बाघों में शुमार हैं। यहां देश के किसी भी रिजर्व से सबसे ज्यादा 319 बाघ पाए गए। इनमें 49 शावक शामिल हैं। यहां बाघ घनत्व भी संसार में सबसे ज्यादा 14.65 प्रति 100 वर्ग किमी है। कॉर्बेट के पास भरपूर शिकार (चीतल, सांभर), घना जंगल, पानी की उपलब्धता, और सबसे ज़रूरी इंसानी दखल से अपेक्षाकृत सुरक्षित कोर एरिया है। शिवालिक - गंगा के इस मैदानी क्षेत्र से बाघ आसपास के जंगलों में फैलते हैं और नई आबादी बसाते हैं।
बाघों के लिए कॉर्बेट अकेला सरसब्ज (समृद्ध) रिजर्व नहीं है। बांधवगढ़ और दुधवा जैसे रिज़र्वों में भी 150 से ज़्यादा बाघ हैं। कान्हा, पेंच, ताडोबा, काज़ीरंगा, सत्यमंगलम और सुंदरबन में 100 से 150 के बीच बाघ मौजूद हैं। रिपोर्ट के अनुसार मध्य भारत का अचानकमार-कान्हा-पेंच-नागज़ीरा नवेगांव-ताडोबा गलियारा "दुनिया के सबसे बड़े सोर्स पॉपुलेशन ब्लॉक्स" में गिना गया है, और यही वह इलाका है जहां देश की सबसे ज़्यादा आनुवंशिक विविधता वाली बाघ आबादी पाई जाती है।
राज्यों में मध्य प्रदेश सबसे बड़ा "धनी" राज्य बनकर उभरा है यहां बाघों की आबादी वर्ष 2018 के 526 से बढ़कर 2022 में 785 गई यानी चार साल में करीब पचास फीसदी की छलांग। पश्चिमी घाट में नीलगिरी क्लस्टर, नागरहोल, बांदीपुर, सत्यमंगलम, मुदुमलाई, वायनाड, बीआरटी का समूह बड़ी बाघ आबादी (828) समेटे हुए है। रिपोर्ट कहती है कि यहां मानवीय दखलंदाजी से दूर क्षेत्र, प्रचुर शिकार आधार और उत्कृष्ट कनेक्टिविटी मिलकर एक बाघों के लिए आदर्श वातावरण बनाते हैं।
शिकारियों के बढ़ते हस्तक्षेप ने उड़ीसा के सिमिलिपाल टाइगर रिजर्व के बाघों को सबसे 'गरीब' बाघों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट कहती है कि 1,484 वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र में फैले इस रिजर्व में केवल 18 बाघ पाए गए। सबसे चिंताजनक पहलू है कि सिमिलिपाल उड़ीसा राज्य का एकमात्र टाइगर रिजर्व है। इसका मतलब है कि इसके पास मदद करने वाला कोई सोर्स नहीं है। सिमिलिपाल को पड़ोसी सतकोसिया टाइगर रिज़र्व से जोड़ने वाला कॉरिडोर बड़े पैमाने पर खनन और सड़क-रेल परियोजनाओं की भेंट चढ़ चुका है। यानी 'गरीबी' से निकलने" का रास्ता भी बंद होता जा रहा है। सतकोसिया में तो बाघ पहले ही स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुके हैं, और वहां पुनर्वास की कोशिशें भी कामयाब नहीं हो पाई।
सिमिलिपाल बाघों की 'गरीबी' की मार झेलने वाला अकेला रिजर्व नहीं है। झारखंड, मिज़ोरम और नागालैंड के हालात भी काफी नाजुक हैं। वर्ष 2022 की गणना में झारखंड में केवल एक बाघ दर्ज हुआ। मिज़ोरम के डम्पा टाइगर रिज़र्व में बाघ लगभग नदारद हैं। पश्चिम बंगाल के बक्सा में भी बाघ दिखाई नहीं दिया। पलामू, उदंती-सीतानदी, सतकोसिया, कवल, इंद्रावती, अचानकमार, नामेरी, पाक्के, राजस्थान के रामगढ़-विषधारी और मुकुंदरा में बाघों की संख्या पांच से भी कम है। कहीं-कहीं सिर्फ नर बाघ बचे हैं यानी प्रजनन की कोई संभावना ही नहीं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के करीब 35 प्रतिशत टाइगर रिज़र्व को तत्काल सुरक्षा, शिकार-आधार की बहाली और मानवीय दबाव घटाने की सख्त ज़रूरत है।
संसार चंद और उस जैसे अन्य बाघ तस्करों ने बाघों के अवैध शिकार से देश और दुनिया के सबसे सुरक्षित बाघ आवासों में गिने जाने वाले राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व को वर्ष 2004 तक खाली कर दिया था। सीबीआइ की पूछताछ में संसार चंद ने नेपाल और तिब्बत के चार लोगों को ही करीब 400 बाघों और दो हजार से अधिक तेंदुओं की खाल बेचना स्वीकर किया था। वर्ष 2008 में सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों के पुनर्वास के प्रयास शुरू हुए। देश में पहली बार रणथंभौर से एक नर बाघ को सरिस्का में क्लोज एनक्लोजर में शिफ़ट किया। एक महीने के भीतर ही एक मादा बाघ को सरिस्का भेजा गया। कड़ी निगरानी रखी गई, जिसके सुखद परिणाम भी मिले। वर्ष 2022 की गणना में यहां 19 वयस्क बाघ पाए गए हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि सरिस्का अब भी भारी मानवीय दबाव झेल रहा है। इसे रणथंभौर व रामगढ़ जैसे रिज़र्वों के साथ "मेटापॉपुलेशन" की तरह प्रबंधित करने की ज़रूरत है।
ऐसा नहीं है कि बाघों में असमानता की खाई सिर्फ राज्यों के बीच है बलिक कर्नाटक एक ऐसा राज्य है जहां बाघों के घनत्व में बहुत बड़ा अंतर है। रिपोर्ट के अनुसार नागरहोल टाइगर रिज़र्व में बाघ घनत्व11 प्रति 100 वर्ग किमी है तो कोप्पा में महज़ 0.19 प्रति 100 वर्ग किमी है। यानी लगभग 58 गुना का फासला, वह भी एक ही राज्य की सीमाओं के भीतर। यह आंकड़ा इस मिथक को तोड़ता है कि अच्छे राज्य में हर बाघ सुरक्षित है। असल फर्क़ राज्य की सीमाओं से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जंगल के प्रबंधन, सुरक्षा और शिकार-आधार से तय होता है।
यह महत्वपूर्ण नहीं हे कि भारत में दुनिया के तीन चौथाई बाघ पाए जाते हैं। अहमियत इस बात की है कि वे किन हालात में रह रहे हैं। कॉर्बेट और सिमिलिपाल की दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं, यह संसाधनों, सुरक्षा और अवसर की दूरी है। जब तक "गरीब" इलाकों में शिकार-आधार, गश्त और कॉरिडोर बहाल नहीं होते, तब तक भारत के बाघों की यह असमानता और गहरी होती जाएगी और आने वाली किसी गणना में "अमीर" और "गरीब" के बीच की खाई सिर्फ और गहरी होती नज़र आएगी।