
सतना। मझगवां तहसील के खुटहा गांव में लगभग 80 वर्ष पुराने एक देशी आम के पेड़ पर ऐसा प्रयोग किया जा रहा है, जो सफल रहा तो यह विंध्य में अपनी तरह का अनूठा उदाहरण बन जाएगा। वर्षों से बूढ़ा हो चुका और 2021 में आकाशीय बिजली गिरने से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त यह पेड़ अब फिर से जीवन की ओर लौट रहा है। खास बात यह है कि आने वाले समय में इसी एक तने पर देशी किस्मों के साथ आम की दुनिया की सबसे प्रीमियम और लोकप्रिय किस्में अल्फांसो (हाफूस) और मियाजाकी के भी फल फलेंगे।
यह प्रयोग ऑर्चर्डरेजुवेनेशन तकनीक और मल्टी-वैरायटी ग्राफ्टिंग के माध्यम से किया जा रहा है। इसकी निगरानी पादप अनुवांशिकी के विशेषज्ञ आईएएस अधिकारी मझगवां एसडीएम महिपाल सिंह कर रहे हैं। यह पेड़खुटहा निवासी कृष्ण केशव त्रिपाठी के दादा स्वर्गीय शोभनाथ शास्त्री ने लगाया था। वर्ष 2021 में बिजली गिरने से इसका मुख्य तना दो हिस्सों में बंट गया। परिवार ने रस्सियों से तने को बांधकर किसी तरह इसे बचाए रखा, लेकिन बढ़ती उम्र के कारण पेड़ लगातार कमजोर होता जा रहा था।
फरवरी से शुरू हुआ कायाकल्प
पेड़ को नया जीवन देने के लिए फरवरी में, जब आम का पेड़सुप्तावस्था में होता है, इसकी अधिकांश पुरानी शाखाएं हटाकर केवल मुख्य तना सुरक्षित रखा गया। पेड़ की छत्र छाया (कैनोपी) के क्षेत्र में खाई खोदकर जैविक पोषक तत्व डाले गए, नियमित सिंचाई की गई तथा तने पर फफूंदनाशी और कीटनाशी लेप लगाया गया। इसके बाद मई में नई कोपलें निकलना शुरू हुईं।
11 किस्मों की सफल ग्राफ्टिंग
7 जुलाई को वरिष्ठ उद्यान अधिकारी मोहन सिंह मरावी ने एसडीएम के मार्गदर्शन में नई कोपलों पर ग्राफ्टिंग कर सुंदरजा, आम्रपाली, मल्लिका, बॉम्बे ग्रीन, लंगड़ा, दशहरी, मालदा, केसर, सीपिया, खुमानी और बारहमासी सहित 11 किस्मों की बड स्टिक लगाई। सभी ग्राफ्ट सुरक्षित हैं और अच्छी वृद्धि कर रहे हैं।
अब 50 किस्मों का लक्ष्य
एसडीएम महिपाल सिंह के अनुसार, 25 जुलाई को दूसरे चरण में देश-विदेश की प्रीमियम किस्मों की ग्राफ्टिंग की जाएगी। इनमें अल्फांसो (हापुस) और जापान की चर्चित मियाजाकी किस्म भी शामिल होगी। लक्ष्य एक ही पेड़ पर करीब 50 किस्मों का संग्रह तैयार करना है।
बदल जाएगी खुटहा की पहचान
कृष्ण केशव त्रिपाठी का कहना है कि यदि यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा तो खुटहा के अन्य पुराने देशी आम के पेड़ों का भी इसी तकनीक से कायाकल्प किया जाएगा। इससे न केवल दशकों पुराने पेड़ संरक्षित होंगे, बल्कि गांव बहुविविधआमों की प्राकृतिक प्रयोगशाला के रूप में भी पहचान बना सकेगा।