
राजस्थान के भरतपुर में स्थित 293 वर्ष प्राचीन ऐतिहासिक सुजान गंगा नहर में आज भी सैकड़ों मौतों का राज दफन है। बीते 20 वर्ष में यहां 100 से भी ज्यादा मौत हो चुकी है। क्योंकि यह भरतपुर शहर में सबसे बड़ा सुसाइड का प्वाइंट बन चुकी है। यह नहर किसी अजूबे से कम नहीं है। यह देश की ऐसी पहली नहर है, जहां 20 वर्ष पहले नहर के जीर्णोद्धार के समय मिट्टी की तुलाई कर उसे निकाला गया।
यह नहर कभी शहर की जीवनदायिनी मानी जाती थी। यह नहर न केवल पीने के पानी का स्रोत थी बल्कि लोहागढ़ दुर्ग की सुरक्षा का भी अभिन्न हिस्सा थी। रणनीतिक दृष्टि से यह नहर इतनी महत्वपूर्ण थी कि इसकी वजह से शत्रु किले की ओर आंख उठाकर देखने की भी हिम्मत नहीं कर पाते थे।
सुजान गंगा नहर भरतपुर की संस्कृति, इतिहास और जीवनशैली से गहराई से जुड़ी हुई थी। पर आज यह नहर अपनी पहचान और गरिमा को खोती जा रही है। वर्तमान समय में यह नहर गंदगी और उपेक्षा की भेंट चढ़ चुकी है, जहां पहले इसमें स्वच्छ जल बहता था, आज वहां प्लास्टिक की बोतलें, पॉलिथीन, पुराने जूते-चप्पल, कपड़े और अन्य कचरा तैरता नजर आता है. लोग इसे अब एक कचरा पॉइंट की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके कारण नहर का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि अब इसे देखकर कोई भी इसे पीने योग्य नहीं मान सकता। यह नहर अब एक गंदा नाला और कचरा पॉइंट बन चुकी है। इसकी हालत किसी नाले से भी बदतर हो गई है।
सुजानगंगा नहर मथुरा गेट व कोतवाली थाने की सीमा में आती है। हर माह इसमें डूबने से दो से तीन मौत होती है। ज्यादातर सुसाइड केस होते हैं। पुलिस का मानना है कि हर वर्ष करीब 20-25 सुसाइड केस आते हैं। सुजान गंगा नहर एक और गंभीर सामाजिक समस्या का केंद्र बनती जा रही है। यह अब भरतपुर का मुख्य सुसाइड पॉइंट बन गई है। बाउंड्री या सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम न होने के कारण यहां से लोग कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं।
साहित्कार डॉ. सुधा सिंह ने बताया कि 1743 से 1751 के बीच राजा सूरजमल ने भरतपुर में किले का निर्माण करवाया। कुछ का मानना है कि गहराई का कोई पता नहीं, वही कुछ लोग कहते है कि 10 से अधिक हाथियों की लंबाई के बराबर है। नहर में पानी के भरने और गंदे पानी के निकास के लिए जमीन के अंदर से व्यवस्थाएं थी। शहर से 10 किलोमीटर दूर स्थित अजान बांध के पानी से नहर को भरा जाता था। आज दोनों ही व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है। इसके साथ ही शहर भर की गंदगी अब नहर के हवाले की जाने लग गई है। इस गंदगी को रोकने के लिए तीन करोड़ की लागत से एक नाला भी चारों ओर बनाया जा चुका है जो पूरी तरह से बेकार पड़ा हुआ है। किले की सुरक्षा के लिए 1733 ईस्वी में सुजान गंगा नहर का निर्माण शुरू हुआ था। यह आठ साल में बनकर तैयार हुई। इसमें 650 कारीगरों ने रात-दिन काम किया। नहर 2.4 वर्ग किलोमीटर में फैले किले के चारों ओर करीब 2.9 किलोमीटर लंबी है। यह करीब 200-250 फुट चौड़ी और करीब 30 फुट गहरी है। किले की दीवार को फोर्ट वॉल और दूसरी दीवार को मोट वॉल कहा जाता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीनाथ शर्मा ने पत्रिका से बताया कि वह वर्ष 1985 से सुजानगंगा नहर के संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। 1996 में हाइकोर्ट में रिट दायर की गई थी। उस समय शहर की जनता ने काफी आंदोलन किया था। खुद उस समय के विधायक स्वर्गीय आरपी शर्मा ने भी विधानसभा में तीन बार मुद्दा उठाया था। हालांकि राज्य सरकार की ओर से इस प्रकरण में हर बार लापरवाही की जाती रही है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2003 से लेकर अब तक करीब चार से आठ बार हाइकोर्ट की ओर से सुजानगंगा नहर को प्रदूषित होने से बचाने के आदेश दिए जा चुके हैं। हाइकोर्ट के आदेश के बाद सुजानगंगा नहर के चारों ओर एक नाला बनाया गया था, इस पर करीब चार करोड़ रुपए व्यय हुए थे। इंजीनियरों ने नाले को भी सुजानगंगा नहर के लेवल से डेढ़ मीटर ऊपर बना दिया। हाइकोर्ट ने सात इंजीनियर को दोषी मानते हुए रिकवरी के आदेश दिए। तनख्वाह में से राशि जमा होना शुरू हो गई। फिर तय हुआ कि कौन कितना दोषी है।
सरकार ने जांच कराई तो 16 सीसीए की जांच को 17 सीसीए में कर दिया। हाइकोर्ट ने दुबारा जांच की। आज तक कोई जांच नहीं हुई है। तीन करोड़ रुपए बर्बाद हुआ। तोड़ने में अलग व्यय हुआ। नगर निगम ने यह राशि आरएसआरडीसी को दी थी। इसके बाद सुजानगंगा नहर का पानी निकालने पर लाखों रुपए खर्च किए गए। कांटे से तुलाई कर मिट्टी निकाली गई। वो भी काम बंद हो गया। मिट्टी व गंदा पानी जमा पड़ा है। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से कहा कि बजट दिया जाए। एक-एक, दो-दो करोड़ रुपए आए। काम अधूरा ही रहा। कुछ स्थानों से मोटवॉल और गिर गई। किले की दीवार भी गिर गई। सरकार ने हाइकोर्ट में प्रोजेक्ट पेश कर रखा है। इसे तीन चरणों में किया जाना है। सफाई करना व पानी भरना। फ्लोटिंग वगैराह चलाना। एक वर्ष में पूरा करने का आश्वासन दिया था।
नहर की मोटवॉल कई जगह से टूटी है। इसमें चौबुर्जा, धोबीघाट, गोपालगढ़, सफेद कोठी के सामने, केतन गेट, पाई बाग और खिरनी घाट प्रमुख हैं। जबकि 35 से ज्यादा स्थानों पर मोटवॉल की तत्काल मरम्मत कराए जाने की जरुरत है। एएसआई के अधीन आने वाले पुरातात्विक महत्व के स्मारकों के एक सौ मीटर की परिधि में कोई निर्माण या सुधार कार्य नहीं कराए जा सकते। नियमों में यह भी प्रावधान है कि दो सौ मीटर की दूरी पर भी काम कराने के लिए एएसआई से अनुमति लेनी होगी। कुछ वर्ष पहले एएसआई ने सुधार के लिए सैद्धांतिक सहमति दे दी, लेकिन काम अब तक नहीं हो सका है।
20 वर्ष पहले जब सुजान गंगा नहर के जीर्णोद्धार और सफाई का काम शुरू हुआ, तब नहर के पानी को खाली कर नीचे जमी सिल्ट (मिट्टी और गंदगी) को बाहर निकाला गया था। इस सफाई कार्य के दौरान ठेकेदारों की ओर से निकाली गई मिट्टी और कचरे का रिकॉर्ड रखने और भुगतान करने के लिए मिट्टी की तुलाई करवाकर उसे शहर से बाहर भेजा गया था।
भारतीय जनता पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष गिरधारी तिवारी बताते हैं कि दशकों पहले पूरा शहर नहर के घाटों पर नहाने आता था। खिरनी घाट पर तो माने मेले के जैसा माहौल रहता था। नहर के सीमा क्षेत्र में सैकड़ों कुएं थे जिनके मीठे पानी से शहर भर की प्यास बुझती थी। आज अस्तित्व के रूप में सुजान गंगा तो है मगर उसके घाटों पर अब कोई नहाने नहीं जाता, कुएं भी अपना अस्तित्व खो चुके हैं। शहर में पीने योग्य मीठे पानी का अकाल है। भरतपुर के लिए पीने का पानी 50 किलोमीटर दूर के बांध वारैठा बांध से आता था और अब चंबल प्रोजेक्ट से आता है।
मयंक जैन कोतवाली ने बताया कि रात के समय सुजानगंगा नहर के आसपास से निकलने में भी डर लगता है। बचपन से देखते आ रहे हैं, आए दिन कोई ना कोई यहां छलांग लगाकर सुसाइड कर लेता है। नहर का इतिहास भी बहुत पुराना और रोचक है।