SIR in West Bengal Assembly Election 2026: एसआईआर इस बार के पश्चिम बंगाल चुनाव में बड़ा मुद्दा है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 थोड़ा अलग है। राज्य के करीब दस फीसदी मतदाता इस बार चुनाव से बाहर रहेंगे। 7 अप्रैल की देर रात चुनाव आयोग ने बताया कि 27,16,393 मतदाताओं के नाम अंतिम मतदाता सूची (Final Voter List) में नहीं रहेंगे। करीब 60 लाख मतदाता (जो चुनाव आयोग के अनुसार गैर हाजिर, मृत या दूसरी जगह जा चुके हैं) पहले ही सूची से बाहर किए जा चुके हैं। ऐसा मतदाता सूची को 'शुद्ध' करने के लिए की गई प्रक्रिया विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) के परिणामस्वरूप हुआ है। SIR इस बार राज्य विधानसभा में बड़ा चुनावी मुद्दा भी है और इस प्रक्रिया से कई सवाल भी खड़े हुए हैं।
27 लाख से ज्यादा वोटर्स को बाहर किए जाने के फैसले से ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। ये वे लोग नहीं हैं, जिन्हें मर जाने, कहीं और चले जाने या उपलब्ध नहीं होने के चलते लिस्ट से बाहर किया गया है। इन्हें अपना नाम शामिल करने के लिए अपील करने का हक था, पर जल्दबाज़ी में उनका यह हक धरा का धरा रह गया।
7 अप्रैल तक सब या तो अपील कर नहीं सके या उनकी अपील पर फैसला नहीं हो सका। अब इस बात की पूरी आशंका है कि ये लोग कम से कम इस चुनाव में वोट नहीं कर सकेंगे।
एक धुंधली सी उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट चाहे तो इनकी अपील पर फैसले के लिए मतदान की तारीख आगे बढ़ाने का आदेश दे सकता है या यह भी कहा जा सकता है कि वैध कागज दिखाने वाले को इस चुनाव में वोट डालने दिया जाए और चुनाव के बाद उनकी अपील पर सुनवाई की जाए। लेकिन, अब तक ऐसा नहीं हुआ है तो आगे भी होने की उम्मीद न के बराबर है।
ऐसे में ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव ज्यादा चुनौती भरा होने वाला है। ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए मैदान में हैं। माना जा रहा है की एसआईआर के चलते वोटर लिस्ट से बाहर होने वाले ज़्यादातर मतदाता उन्हीं की तृणमूल कांग्रेस के हैं। ममता लगातार एसआईआर के खिलाफ मुखर रही हैं और जनता व अदालत के सामने इस मुद्दे को उठाती रही हैं।
एसआईआर पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि जिन लोगों को वोट देने लायक नहीं पाया गया उनमें पूर्व जज, संविधान से जुड़े नंदलाल बोस के परिजन, कारगिल में लड़ाई लड़ने वाले फौजी, सरकारी कर्मचारी, भारतीय पासपोर्ट रखने वाले लोग शामिल हैं। ऐसे लोगों को वोट देने लायक नहीं पाए जाने से सिस्टम खुद सवालों के घेरे में आ गया है। क्या इन्हें महज कुछ कागजी प्रक्रिया के अभाव में वोट देने लायक नहीं पाया गया या फिर ये वाकई अवैध वोटर हैं?
जो लोग मतदाता सूची से बाहर हुए हैं, उनमें बड़ी संख्या में ऐसे हैं जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में वोट किया था। तो क्या अगर इतनी बड़ी संख्या में ‘गलत’ वोटर्स वोट डाल गए तो उस चुनाव को वैध माना जा सकता है? अवैध वोटर वोट नहीं डाल सकें, यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी किसकी है? यह ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए या नहीं? यह ज़िम्मेदारी नहीं निभाने वालों को कठघरे में खड़ा करना चाहिए या नहीं? एक सवाल यह भी है।
27 लाख वोटर्स कुल मतदाताओं के करीब पांच प्रतिशत हैं। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस करीब 36 सीटें पांच फीसदी से कम मार्जिन से जीती थी। वोटर लिस्ट से बाहर हुए 90.82 लाख मतदाताओं में से से करीब 57 फीसदी उन 10 जिलों से हैं जो बांग्लादेश की सीमा से लगते हैं। इनमें से करीब 70 फीसदी मुसलमान हैं।
कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जीलिंग, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों के सबसे ज्यादा मतदाता बाहर हुए हैं। 2021 के विधानसभा और 2024 के लोक सभा चुनावों में इन जिलों में तृणमूल कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा था। 2021 में यहां की 151 में से 110 सीटें तृणमूल ने और 41 बीजेपी ने जीती थीं। लोकसभा चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस 91 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी, जबकि भाजपा ने 48 में बढ़त ली थी।
ममता बनर्जी की सीट भवानीपुर से भी बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता बाहर हुए हैं। यह ममता का गढ़ है। 1962 और 1969 को छोड़ कर यहां से कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस का ही विधायक रहा है।
SIR के बाद 28 फरवरी को जारी लिस्ट में भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के 14113 मतदाताओं को उस सूची में (under adjudication) रखा गया था, जिनके मताधिकार पर अपील के बाद फैसला होना था। इस लिस्ट में से 3875 नाम हटाए गए। इनमें से 1554 मुस्लिम और 2321 गैर मुस्लिम हैं। साबर इंस्टीट्यूट के रिसर्चर असिन चक्रवर्ती ने 'द टेलीग्राफ' अखबार से कहा, 'इसका मतलब हुआ कि सूची से बाहर हुए मतदाताओं में 40.1 प्रतिशत मुस्लिम हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक भवानीपुर में मुस्लिम आबादी करीब 20 प्रतिशत थी।'
| वर्ष | निर्वाचित विधायक (MLA) | राजनीतिक दल | चुनाव |
| 2021 | ममता बनर्जी | अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) | उपचुनाव |
| 2021 | सोवनदेव चट्टोपाध्याय | अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) | आम चुनाव |
| 2016 | ममता बनर्जी | अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) | आम चुनाव |
| 2011 | ममता बनर्जी | अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) | उपचुनाव |
| 2011 | सुब्रत बख्शी | अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) | आम चुनाव |
| 1972 | रथिन तालुकदार | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | आम चुनाव |
| 1971 | रथिन तालुकदार | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | आम चुनाव |
| 1969 | साधन गुप्ता | भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) | आम चुनाव |
| 1967 | बीवा मित्रा | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | आम चुनाव |
नंदीग्राम में भी जिन मतदाताओं के नाम हटे हैं, उनमें से 95 फीसदी मुसलमान हैं।