नोएडा

SIR in UP: एसआईआर ड्राफ्ट लिस्ट में मरे लोगों के नाम, 83 लाख वोटर्स के पिता के नाम नहीं हुए मैच

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण के बावजूद मतदाता सूची में खामियां मिल रही हैं। एक तरफ चुनाव आयोग का सॉफ्टवेयर रिकॉर्ड में त्रुटियां पकड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बीएलओ स्तर पर फील्ड सर्वे की लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं।

2 min read
Jan 10, 2026
SIR (प्रतीकात्मक तस्वीर)

ड्राफ्ट सूची में नोएडा के सर्फाबाद गांव में चार ऐसे लोगों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट में दर्ज मिले जिनकी मृत्यु वर्षों पहले हो चुकी है। परिवारों ने स्वयं अधिकारियों को अवगत कराया, जिसके बाद मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जांच के आदेश दिए। परिजनों का आरोप है कि बीएलओ न तो उनसे जानकारी लेने आया और न ही डेथ कैटेगरी में नाम हटाए।

ये भी पढ़ें

घूंघट में महिलाओं ने की तोड़फोड़, पेटियां सड़क पर फेंकीं, बोतलें तोड़ीं, पीड़िता के बगावत से मचा हड़कंप

2003 की मतदाता सूची से मिल नहीं पाए रिकॉर्ड

उधर चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने डेटा रिकॉर्ड मिलान के दौरान लाजिकल एरर कैटेगरी में 1.93 करोड़ मतदाताओं को चिन्हित किया है। यह संख्या उन 1.04 करोड़ मतदाताओं से अलग है जिनके रिकॉर्ड वर्ष 2003 की मतदाता सूची से मिल ही नहीं पाए। तार्किक त्रुटि वाले मामलों में करीब 83 लाख मतदाता ऐसे हैं जिनके पिता का नाम मेल नहीं खा रहा है। इसके अलावा कई रिकॉर्ड में नाम की स्पेलिंग गलत है या नाम अधूरा है। सॉफ्टवेयर ने कुल पांच प्रकार की तार्किक त्रुटियां चिह्नित की हैं। इनमें मतदाताओं की वर्ष 2003 की सूची से मैपिंग तो हो गई है, लेकिन जानकारी शंकास्पद है। राहत की बात यह है कि पिता का नाम न मिलने वाली श्रेणी में आयोग की ओर से नोटिस जारी नहीं होगा। इस मामले में बीएलओ संबंधित घरों पर जाकर दस्तावेज़ देखकर रिकॉर्ड को ऐप पर सही कर देंगे।

दूसरी श्रेणी में वे मतदाता शामिल हैं जिनके छह या उससे अधिक बेटों ने मैपिंग करवाई है। इस स्थिति में आयोग यह जांच करेगा कि क्या वास्तव में ऐसे परिवार मौजूद हैं जिनमें इतने अधिक पुत्र हैं। तीसरी श्रेणी में वे नाम आए हैं जिनमें मतदाता और उनके माता-पिता के बीच उम्र का अंतर 15 वर्ष से कम दर्ज है। सॉफ्टवेयर की चौथी श्रेणी में ऐसे मामले शामिल हैं जिनमें दादा-दादी और पौत्र-पौत्री के बीच उम्र का अंतर 50 वर्ष से कम है। ऐसे सभी मामले रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर संदेह खड़ा करते हैं।

पांचवीं श्रेणी में उन मतदाताओं को रखा गया है जो इस समय 45 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के हैं और पिछले एसआइआर यानी 2003 की मतदाता सूची में उनके माता-पिता के तो नाम हैं किंतु उनका नाम दर्ज नहीं है। ऐसे मतदाताओं को नोटिस मिलेगा या केवल जांच कराई जाएगी, यह अभी चुनाव आयोग ने स्पष्ट नहीं किया है। हालांकि पश्चिम बंगाल व दूसरे राज्यों में जिस तरह से तार्किक त्रुटि वाले मतदाताओं को नोटिस जारी हुए हैं, उससे यहां भी भविष्य में नोटिस दिए जाने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

नोटिस जारी होने के सात दिन बाद होगी सुनवाई

लखनऊ में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) अभियान के तहत एक-दो दिनों में नोटिस बंटने शुरू हो जाएंगे। नोटिस जारी होने के बाद न्यूनतम सात दिन बाद सुनवाई की तिथि होगी।

इस बीच राजनीतिक बहस भी तेज हो चुकी है। विपक्ष का आरोप है कि असली मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं, जबकि मृतक वोटर सूची में बने हुए हैं। वहीं राजनीतिक दल मतदाता जोड़ने की दौड़ में सक्रिय दिख रहे हैं। ड्राफ्ट जारी होने के तीन दिनों के भीतर 33,624 नए एप्लीकेशन आए हैं, जिनमें से 1,214 केवल भाजपा की ओर से जमा किए गए हैं।

Updated on:
10 Jan 2026 03:01 pm
Published on:
10 Jan 2026 02:50 pm
Also Read
View All

अगली खबर