
संविधान में महिलाओं के लिए शहरी सरकार में आरक्षण तो यह सोचकर किया गया था कि 'आधी आबादी' को उसका हक मिलेगा, सरकार में भागीदारी मिलेगी। लेकिन तीन दशक बाद हकीकत यह है कि दरवाजे तो खुले, पर भीतर दाखिल कोई और हो गया। नेमप्लेट पर नाम महिला का, पर फैसले ले रहे उनके पति या श्वसुर। यह आरक्षण का सम्मान नहीं, उसका मखौल है।
जयपुर के नवनिर्वाचित महापौर सुनील कोठारी ने पार्षदों की जोनवार बैठकों का सिलसिला शुरू किया है, यह अच्छी बात है। लेकिन विद्याधर नगर जोन की बैठक में कुछ महिला पार्षदों के पति या श्वसुर बाकायदा उसी तरह शामिल हुए, जैसे दूसरे निर्वाचित पार्षद। अलवर नगर निगम में तो हद ही हो गई। यहां नवनिर्वाचित मेयर सुमनलता पार्षदों की समस्याओं की सुनवाई करने के बजाय खुद मोबाइल देखती रहीं और सभापति रहे उनके पति अजय अग्रवाल मेयर की तरह बर्ताव करते नजर आए। अलवर में ही महिला पार्षदों की जगह उनके पतियों के सरकारी बैठकों में शामिल होने की खबरें भी आई हैं। अन्य नगर निगमों व निकायों में भी कमोबेश ऐसे ही हालात दिखने लगे हैं।
वोट महिला को, पद महिला का और हुक्म उसके किसी पुरुष रिश्तेदार का। यह सहयोग नहीं, बल्कि निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों के अधिकारों को छीनना ही है। हैरत की बात यह है कि महिलाएं खुद इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देती नजर आती हैं। सवाल यह भी है कि यदि कोई महिला स्वतंत्र रूप से कामकाज करने में संकोच रखती है तो फिर राजनीतिक दल क्यों टिकट देकर मैदान में उतार देते हैं? वजह साफ है, जो पहले किसी न किसी रूप में सत्ता में रह चुके हैं, वे कुर्सी को घर में ही रखने पर आमादा हैं और राजनीतिक दलों की अपनी मजबूरियां इन्हें ऐसा करने की छूट भी देती हैं।
यह समझना होगा कि परिजन परिवार का हिस्सा हैं, निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं। वे सलाह और हौसला दे सकते हैं, लेकिन सरकारी कार्यालय में निर्वाचित महिला की जगह अपनी कुर्सी लगाकर बैठना, अधिकारियों को निर्देश देना, फाइलों में दखल देना और उसके अधिकारों का इस्तेमाल करना तो कतई कानूनसम्मत नहीं है।
जयपुर में पिछले बोर्डों में महापौर की कुर्सी पर बैठी दो महिला नेत्रियों के बारे में खुलकर सामने आया कि सरकारी कामकाज में उनके पतियों का सीधा दखल रहता था। शिकायतें भी हुईं, तथ्य भी सामने आए, कानूनी कार्रवाई की नौबत भी आई, लेकिन बचाव के रास्ते तलाश ही लिए गए।
एक और सवाल जो बैठकें बुलाने वाले अधिकारियों और दलों से पूछा जाना चाहिए—अनधिकृत लोगों को सरकारी बैठकों में घुसने से रोका क्यों नहीं जाता? महिला प्रतिनिधियों को भी समझ लेना चाहिए कि उनके नाम की आड़ में भ्रष्टाचार हुआ तो मुकदमा उन्हीं पर चलेगा, न कि उनके पति पर।
अब राजस्थान पंचायत चुनाव की चौखट पर खड़ा है। तीनों स्तर पर आधी सीटें महिलाओं के लिए हैं। जाति की जकड़न है, परिवार की राजनीति है और पितृसत्ता की पुरानी दीवारें हैं। यदि हर बार की तरह पंचायतों में भी 'सरपंच पति' नजर आए तो 50 प्रतिशत आरक्षण का अर्थ सिर्फ इतना रह जाएगा कि नेमप्लेट पर महिला का नाम होगा और फैसले पुरुष ही करेंगे।
दरअसल, जिम्मेदारी सबकी है। सरकार अनधिकृत व्यक्तियों के निकाय व पंचायती राज संस्थाओं की बैठकों में आने से रोकने के कागजी फरमान निकालने के बजाय साफ निर्देश दे कि ऐसा हुआ तो संबंधित महिला जनप्रतिनिधि की कुर्सी भी खतरे में आ सकती है।
कोर्ट को तो देखना ही है कि ऐसे मामले सामने आएं तो खुद प्रसंज्ञान लेकर अनधिकृत व्यक्तियों की मौजूदगी में होने वाले फैसलों को खारिज करे। और सबसे बड़ी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है। महिला को टिकट दिया है तो उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता और कौशल की भी रक्षा करनी होगी। खुद पर मेयरपति, पार्षद पति व सरपंच पति का तमगा लगाने वालों का तो सामाजिक रूप से भी बहिष्कार किया जाना चाहिए।
रही बात महिलाओं की। वे राजनीति में आ रही हैं तो अपने हक की लड़ाई भी उन्हें खुद ही लड़नी होगी। पार्षद गलत करे तो महापौर सवाल करे। सरपंच गलत करे तो ग्रामसभा जवाब मांगे। आने वाले पंचायती राज चुनाव में तो मतदाताओं को भी यह ठान ही लेना चाहिए कि पंच-सरपंच से लेकर जिला प्रमुख तक रिश्तेदारों की समानांतर सरकार किसी कीमत पर कहीं भी नहीं बन पाए।
-भुवनेश जैन, डिप्टी एडिटर, पत्रिका समूह