प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास रथ का पहिया आज गुजरात के चुनावी कुरुक्षेत्र में फंसा हुआ दिख रहा है
- नचिकेता देसाई, राजनीति विश्लेषक
पिछड़ों के नेता अल्पेश ठाकोर और दलितों के नेता जिग्नेश मेवानी के भाजपा के खिलाफ मोर्चाबंदी करने के कारण बिना किसी सक्रिय प्रयास के कांग्रेस को अस्सी के दशक में जिस खाम फार्मूला का चुनावी लाभ मिला करता था, वह एक बार फिर उसे सहज ही मिल गया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकास रथ का पहिया आज गुजरात के चुनावी कुरुक्षेत्र में फंसा हुआ दिख रहा है। ‘जो हिन्दू हित की बात करेगा वो ही देश पर राज करेगा’ के शंख नाद ने गुजरात के जनमानस को ऐसा मंत्रमुग्ध कर दिया था कि कांग्रेस द्वारा प्रस्थापित क्षत्रिय-हरिजन -आदिवासी-मुसलमान (खाम) मंत्र से मुक्त होकर बहुजन हिन्दू समाज हिंदुत्व के व्यापक छाते के नीचे आकर खड़ा हो गया। गुजरात 2002 के जनसंहारक घमासान के बाद से नरेन्द्र मोदी हिन्दू हृदय सम्राट के रूप में प्रस्थापित हो गए। आक्रामक हिंदुत्व से कांग्रेस भी मूर्छित सी हो गयी और उसने भी खाम का दामन छोडक़र मुलायम हिंदुत्व की नीति अपना ली। आक्रामक हिंदुत्व के सामने मुलायम हिंदुत्व पराजित हो गया और गुजरात में भाजपा का एकछत्र राज कायम हो गया।
गोधरा 2002 के दंगों के बाद हुए विधानसभा के सभी चुनावों में भाजपा ने आक्रामक हिंदुत्व को अपने प्रचार के केंद्र में रखा। अक्षरधाम मंदिर पर आतंकी हमला, माफिया सरगना सोहराबुद्दीन और मुंबई की कॉलेज छात्रा इशरतजहां एवं उसके पाकिस्तानी आतंकवादी साथियों की पुलिस मुठभेड़ में मौत से लेकर मियां मुशर्रफ को भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार का मुख्य आधार बनाया। इस प्रकार नरेन्द्र मोदी की हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि को और आगे बढ़ाया गया। वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव में पहली बार नरेन्द्र मोदी को विकास पुरुष और विकास के उनके गुजरात मॉडल को प्रचारित किया गया। वह भी तब, जब मुकेश अम्बानी, रतन टाटा , शशि और रवि रुईया सहित देश के एक दर्जन से ज्यादा उद्योगपतियों ने एक मंच से मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए सर्वोचित व्यक्ति घोषित किया।
पिछले लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से भाजपा की जीत और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके गृह राज्य गुजरात में स्वयं उनकी और भाजपा की लोकप्रियता में भारी गिरावट आती चली गई। पंचायत और नगर निकायों के चुनाव नतीजों से यह स्पष्ट भी है। वर्ष 2015 में हुए चुनाव में राज्य की कुल 30 जिला पंचायत में से 24 और 201 तालुका पंचायत में से 134 पर जीत हा्िसल करने वाली भाजपा अपना वर्चस्व राज्य की 6 महानगर पालिकाओं पर ही कायम रख सकी। गुजरात में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती पाटीदार समाज ने खड़ी कर दी जो अब तक उसका सबसे मजबूत मतदान बैंक रहा है। पहली बार, 2015 में पाटीदार युवकों ने पिछड़ा वर्ग के लिए नौकरी तथा उच्च शिक्षा संस्थानों में उपलब्ध आरक्षण में अपने हिस्से की मांग को लेकर राज्य व्यापी आन्दोलन छेड़ा था।
इस आन्दोलन का नेतृत्व 22 वर्षीय युवक हार्दिक पटेल के हाथ में है। 25 अगस्त 2015 के दिन हार्दिक ने अहमदाबाद में एक रैली का आयोजन किया जिसमें पांच लाख से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। इस रैली पर पुलिस ने लाठियां चलाईं। हार्दिक और उसके साथियों को गिरफ्तार कर लिया। आन्दोलन के नेताओं पर देशद्रोह का मुकदमा दायर किया गया। जहां एक ओर पाटीदार युवा सरकार के खिलाफ मैदान में उतरे वहीं दूसरी ओर पिछड़ी जाति, दलित और आदिवासी युवकों का एक राज्य स्तरीय संगठन नशाबंदी क़ानून को सख्ती से लागू कराने और सरकारी नौकरियों में उन्हें संविधान में दिए गए अधिकार को लागू कराने के मुद्दों पर आन्दोलन के रास्ते पर उतरा। इसका नेतृत्व भी युवा अल्पेश ठाकोर कर रहे हैं। इसी बीच, सौराष्ट्र के ऊना में पांच दलितों को मरी गाय की खाल उतारने के कारण स्वघोषित गोरक्षकों ने बीच बाजार में ***** कर और उनके हाथ पैर बांधकर कोड़ों से मारा।
इस घटना ने समस्त दलित समाज को उद्वेलित कर दिया। दलितों ने मरे पशुओं के शव उठाने से इनकार कर दिया। इस आन्दोलन का नेतृत्व भी एक युवा जिग्नेश मेवानी ने किया। इस बार होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को पराजित करने का संकल्प लेकर पाटीदार युवाओं के नेता हार्दिक पटेल, पिछड़ों के नेता अल्पेश ठाकोर और दलितों के नेता जिग्नेश मेवानी मैदान में उतर गए हैं। इनमें से अल्पेश ठाकोर ने 23 अक्टूबर को गांधीनगर में आयोजित रैली में राहुल गाँधी की उपस्थिति में कांग्रेस की सदस्यता ले ली और उन्हें कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में लड़ाने का फैसला भी कर लिया। पाटीदार युवा नेता हार्दिक ने कांग्रेस की सदस्यता नहीं ली है पर उन्होंने राहुल गांधी से मिलकर भाजपा के खिलाफ प्रचार करने का अपना संकल्प दोहराया।
इसी प्रकार दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी इस चुनाव में भाजपा के खिलाफ प्रचार करेंगे। अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी के भाजपा के खिलाफ मोर्चाबंदी करने के कारण, बिना किसी सक्रिय प्रयास के कांग्रेस को अस्सी के दशक में जिस खाम फार्मूला का चुनावी लाभ मिला करता था, वह एक बार फिर उसे सहज ही मिल गया। गुजरात में पिछडे, दलित, आदिवासी और मुसलमान कुल जनसंख्या के 78 प्रतिशत हैं। भाजपा के रामजन्म भूमि आन्दोलन के चलते व्यापक हिंदुत्व की छतरी के नीचे मुसलमानों के सिवा बाकी तीनों जन समुदाय कांग्रेस के खाम फार्मूला के प्रभाव से बाहर निकल गए थे। अब आने वाले विधानसभा चुनाव के नतीजे ही बताएंगे कि कांग्रेस का खाम फार्मूला कितना कारगर रहता है।