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आस्था का महापर्व छठ

सादगी और पवित्रता का प्रतीक है यह पर्व
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Sunil Sharma

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Updated: 24 Oct 2017, 3:53 PM IST

chhath puja 2017

chhath puja in hindi

- स्वाति

आधुनिकता और पाश्चात्य सभ्यता के अंधाधुंध आपा -धापी में आज भी कई भारतीय पर्व और रीती-रिवाज़ हैं जो हमें अपने मूल और संस्कृति से जोड़ें हुए हैं। ऐसे हीं पर्वों में महापर्व छठ अग्रणी और शिरोधार्य है। यह पर्व सूर्य देव की उपासना का है और सर्व-मंगल कामना पूर्ति हेतु है। इस पर्व को स्त्री-पुरुष दोनों अपनी श्रद्धानुसार रखते हैं।

वैसे तो यह पर्व उत्तर भारतीय हिंदुओं द्वारा हीं विशेष कर मनाया जाता है मगर दूसरे धर्मों में भी इसकी गूढ़ आस्था देखी गयी है। चैत्र और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है। लोक कथा अनुसार छठ मैया और सूर्य देव के बीच भाई-बहन का सम्बन्ध है और सर्व कामना सिद्धि हेतु छठ माँ सूर्य देव की अराधना करती है। खरना के संध्या में भगवती षष्ठी अपने मायका आती हैं।

इस पर्व का ज्योतिष महत्व भी है। इस दिन चंद्रमा और पृथ्वी की विचित्र खगौलीय स्थिति उत्पन्न होती है। चंद्रमा और पृथ्वी के सतही अक्ष की स्तिथि में परिवर्तन होता है जिससे पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर सामान्य से अधिक मात्रा में पहुँच जाती हैं। यह घटना कार्तिक और चैत्र माह की षष्टी को होता है। सूर्य देव की उपासना कर हम उनकी हानिकारक किरणों के प्रभाव से मुक्ति की कामना करते हैं।

भारत में सूर्य की आराधना ऋग्वेद से होती चली आई है। अथर्ववेद में भी इसके महात्म्य का वर्णन है। आस्था के इस पर्व से संबंधीय अनेक कथाएँ कही सुनी जाती हैं।

रामायण से
एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद राम के अयोध्या वापसी की ख़ुशी में लोगों ने दिये जलाकर दिवाली मनाई और उसके छठे दिन रामराज्य की स्थापना हुई। इस दिन भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशिर्वाद प्राप्त किया था।

महाभारत से
एक अन्य कथानुसार सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी। वह नित्य घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य के महिमा से कर्ण को अपार बल की प्राप्ति हुई थी। छठ में अर्घ्य देने की यह परंपरा तभी से चली आ रही है। कुछ कथाओं में द्रौपदी द्वारा भी सूर्य-पूजन का वर्णन है। द्यूत क्रीड़ा में पाण्डवों की हार के बाद द्रौपदी ने सूर्य उपासना की थी। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा भी करती थीं।

पुराणों से
एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में सम्राट प्रियवद थे। समस्त वैभव - सुख के होते हुए भी निःसंतान होने का दुःख प्रियवद को चिंतित रखता था। तब पुत्र प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया और उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति की खीर खिलाई गई। तदनोपरांत उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त तो हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र वियोग में व्याकुल होकर प्राण त्यागने को अधीर हो गए।

उसी वक्त भगवान इंद्र की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा -’’सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। मनोकामना पूर्ण करने हेतु तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो‘’। राजा ने यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को किया और पुत्र की प्राप्ति की।

विधि
यह पर्व चार दिवसीय है। किसी स्वच्छ जल स्रोत जैसे नदी या तालाब के पास छठ-घाट बनाया जाता है। पूरे स्थल पर साफ़ सफाई की जाती है। मिटटी और कच्ची ईंट से ‘’श्री सोप्ता‘’ को आकार दिया जाता है। यह चौकोर पिरामिड जैसा होता है। घाट पर इसी के इर्द-गिर्द बैठकर पूजा की जाती है। सिंदूर, अक्षत, दूध, जल, धूप-अगतबत्ती, फल इत्यादि से इसका पूजन करते हैं।

पहले दिन नहाय-खाय से व्रत का प्रारंभ होता है। इस दिन व्रती सेंधा नमक में कद्दू और अरवा चावल का सेवन करते हैं। दूसरे दिन, दिन भर का उपवास रख कर रात में खरना का प्रावधान है। साठी के चावल को गन्ने के रस में गुड़ डालकर पकाते है। फिर दूध अदरक डाल कर महाप्रसाद बनाते है। व्रती इस रसियाव के साथ घी में चिपुडी रोटी का सेवन करते है। तीसरे दिन, दिन भर उपवास रख कर अस्ताचल गामी सूर्य को दूध और मौसमी फलों से अर्घ्य देते है। घाट पर नदी या पोखरे में कमर तक पानी में डूबकर अर्घ्य देते हैं। रात्री में मन्नत अनुसार कोसी भरते है।

5 या 7 गन्ने को लाल कपडे से लपेट कर खड़ा करते हैं। इसके अंदर अल्पना बनाते है है और उसके ऊपर फल, पूरी, खजूर टोकरे में भर कर पूजन करते हैं। ‘’कोसी हमर जनी भींजे’’, ‘’केरवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मे़ड़राय‘’ और ‘’काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए’’ जैसे गीत एक अकथ भक्ति की लौ जलाते हैं। चौथे दिन उदय होते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजन की समाप्ति होती है। व्रति थोड़ा अदरक और गुड़ खाकर व्रत को पूर्ण करती है।

भक्ति और आध्यात्म में सराबोर यह पर्व सादगी और पवित्रता का प्रतिक है। आडम्बर और दिखावा रहित यह त्यौहार सामजिक समानता को भी लक्षित करता है।