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कांग्रेस को संजीवनी

गुरदासपुर के नतीजे भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के लिए ही नहीं बल्कि कांग्रेस के लिए भी आत्ममंथन का अवसर बनने चाहिए।

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Oct 16, 2017
gurdaspur seat congress

गुरदासपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की शानदार जीत और भाजपा की करारी शिकस्त के कई मायने हैं। यूं लोकसभा की एक सीट गंवा देने से भाजपा सरकार पर कोई सीधा असर नहीं पडऩे वाला। लेकिन गुरदासपुर की जीत कांग्रेस को संजीवनी जरूर समझी जा सकती है। पिछले तीन सालों में अधिकांश बड़े चुनाव में हार का सामना कर रही कांग्रेस इस जीत से गद्गद् है।

गुरदासपुर सीट पिछले दो दशक से भाजपा के मजबूत गढ़ के रूप में उभर कर सामने आई थी। पिछले पांच चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार अभिनेता विनोद खन्ना ने यहां चार बार जीत दर्ज की थी। पिछले चुनाव में सवा लाख मतों से जीतने वाली भाजपा इस बार वहां लगभग दो लाख मतों के अंतर से पराजित हुई। क्या एक सीट की हार-जीत को स्थानीय कारणों से जोडक़र छोड़ दिया जाए या इसके व्यापक मायने तलाशे जाएं। बढ़ती महंगाई, जीएसटी से व्यापारियों को होने वाली परेशानियां और रोजगार के क्षेत्र में पर्याप्त काम नहीं होने की बातें सत्तारूढ़ एनडीए के घटक दल भी कहते मिल जाते हैं। अगले दो महीनों में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आएंगे। मतदाताओं के मूड को भांपने का वह मौका उपयुक्त माना जाएगा।

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गुरदासपुर के नतीजे भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के लिए ही नहीं बल्कि कांग्रेस के लिए भी आत्ममंथन का अवसर बनने चाहिए। भाजपा को मंथन करना होगा कि तीन सालों में गुरदासपुर के मतदाता उससे इतने विमुख क्यों हो गए? एक लोकसभा सीट भाजपा से छीन लेने पर कांग्रेस का खुश होना स्वाभाविक है। लेकिन उसे भी समझना होगा कि पंजाब की एक सीट पर मिली जीत से देश के मतदाताओं का मूड नहीं आंका जा सकता।

पंजाब में कांग्रेस को मिली जीत में राज्य के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का खास योगदान है। अमरिंदर की लोकप्रियता ने ही पंजाब में कांग्रेस की पताका फहराई थी। देश में राजनीति की तस्वीर हर पल बदलती रहती है। ऐसे में जो राजनीतिक दल मतदाताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य करेगा, जीत उसी को मिलेगी। गुरदासपुर में कांग्रेस की जीत व भाजपा की हार की समीक्षा हर दल अपने तरीके से करेगा। लेकिन ध्यान रखना होगा कि मंथन सिर्फ दिखावटी न हो।

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Published on:
16 Oct 2017 12:55 pm
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