इस देश का जो भी संगठित, सुचारू रूप आज देखने में आ रहा है, वह उसकी परिवार पद्धति है और परिवार की धुरी स्त्री है। अगर इस विचार को आत्मसात किया जाए तो आज महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध शून्य हो जाएंगे।
देश में हर मिनट एक महिला जुल्म की शिकार होती है। यह पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़ा है। जो अपराध दर्ज नहीं हो पाते, उनका कोई हिसाब नहीं है। ये भयावह तस्वीर क्यों है? क्योंकि हमने अपने समाज की ही एक बड़ी सीख को भुला दिया है।
| वर्ष | रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या (स्रोत: एनसीआरबी) |
| 2021 | 4,28,278 |
| 2022 | 4,45,256 |
| 2023 | 4,48,211 |
वह सीख क्या है? वह है परिवार का स्वरूप और स्त्री का महत्व। कई देशों की यात्रा कर चुके, राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश भारत की इस खूबी को दुनिया के अनेक देशों की तुलना में श्रेष्ठतम बताते थे।
उन्होंने लिखा, ‘इस देश (भारत) की महती शक्ति स्त्री है। इस देश का जो भी संगठित, सुचारू रूप आज देखने में आ रहा है, वह उसकी परिवार पद्धति है और परिवार की धुरी स्त्री है। परिवार का जो स्वरूप आज इस देश में है, संसार के किसी देश में नहीं है।’
इस विचार को समाज अगर आत्मसात कर ले तो आज महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध शून्य हो जाएंगे। ऐसा हो गया तो पूरे समाज का कायाकल्प हो जाएगा। देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में।
कुलिश जी चाहते थे कि भारतीय परिवार पद्धति और स्त्री को उसकी धुरी मानने की पारंपरिक सोच का फैलाव भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया में हो । इसके अलावा, भारत की एक और चीज थी, जिसकी कमी उन्हें बाहर के देशों में खलती थी।
भारतीय खान-पान की विशेषता उन्हें किसी देश में नजर नहीं आई। विदेश यात्राओं के अनुभव के बाद उन्हें इस बात की सख्त जरूरत महसूस हुई कि भारतीय खान-पान को विदेशों में पहुंचाया जाए।
कुलिश जी विदेश यात्राएं खूब किया करते थे। हालांकि, उम्र के सातवें दशक में पहुंचने पर उन्होंने विदेश जाना थोड़ा कम कर दिया था। फिर भी जरूरी यात्राएं कर ही लिया करते थे। इस उम्र में विदेश यात्रा कम करने की मुख्य वजह खान-पान की असुविधा थी। ऐसे में अगर उन्हें विदेश जाना ही पड़ता था तो इस बात का इंतजाम कर लेते थे कि खान-पान की ठीक-ठाक व्यवस्था हो जाए। उन्होंने इसका जिक्र अपने लेखों में भी किया था।
इस दौर में विदेश यात्राओं के दौरान उन्हें ऐसा लगा कि भारतीय खान-पान को दुनिया भर में पहुंचाने की जरूरत है। हालांकि, अब यह पहुंच भी रहा है।
उनका मानना था कि खान-पान शरीर की सबसे बड़ी जरूरत है और शरीर ही समस्त सांसरिक कर्मों के सम्पादन का एक मात्र साधन है। वह मानते थे कि पश्चिमी देशों का खान-पान एकदम बिगड़ा हुआ था, क्योंकि उनके आहार में आहार के तत्व ही नहीं रहे। सब कुछ नकली हो चुका था।
एक बार कुलिश जी दस दिन के लिए आस्ट्रिया, स्लोवाकिया और हंगरी के दौरे पर गए थे। इससे पहले वह पांच दिन सियोल (कोरिया) भी रह कर आए थे। इन यात्राओं से लौट कर उन्होंने भारतीय खान-पान के विश्वव्यापी होने की सख्त जरूरत महसूस की थी और इसकी वकालत करते हुए लेख लिखा था।
उन्होंने वहां के खान-पान को नीरस बताते हुए लिखा कि इसका प्रमाण यही है कि लोगों का पेट भर जाए तो भी मन नहीं भरता। वे दिन भर चाय, कॉफी, कोकाकोला, टॉफी, चॉकलेट, आइसक्रीम, सलाद और तरह-तरह की चीजें चाटते-चबाते रहते हैं।
उन्होंने यूरोप और अमेरिका में खाने-पीने के डिब्बाबंद सामान के चलन को गलत बताया था और आगाह किया था कि यह चलन भारत में भी शुरू होने लगा है। जाहिर है, आज इस चलन के मजबूत होने का नुकसान भारत झेल रहा है।
कुलिश जी का मानना था कि अन्न से मन का गहरा नाता है और विदेशों में भारतीयता का प्रचार-प्रसार करना है तो अन्न या आहार को माध्यम बनाना होगा।
जाहिर है, जब अन्न से मन का गहरा नाता है तो वह हमारे कर्मों पर भी निश्चित असर डालेगा।
कुलिश जी के बारे में जानने के लिय ये छोटा सा विडियो देख सकते हैं:
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