अथक परिश्रम और सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता के सहारे उन्होंने पत्रकारिता को ऊंचाई प्रदान की। वे समाचारों की विश्वसनीयता के प्रबल पक्षधर रहे। आज भी यही विश्वसनीयता पत्रिका की पहचान बनी हुई है।
पत्रकारिता के इतिहास में श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश जी को सदैव सम्मान के साथ याद किया जाएगा। अथक परिश्रम और सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता के सहारे उन्होंने पत्रकारिता को ऊंचाई प्रदान की। वे समाचारों की विश्वसनीयता के प्रबल पक्षधर रहे। आज भी यही विश्वसनीयता पत्रिका की पहचान बनी हुई है।
पत्रकारिता में मेरी शुरुआत पत्रिका में प्रशिक्षु के तौर पर हुई और तीन दशक तक मैंने वहां बिताए। कुलिश जी से परिचय तो लंबे समय से था, लेकिन मुख्य संवाददाता का महत्वपूर्ण कार्यभार मिलने के बाद उनसे मेरा संवाद और संपर्क दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। वे ऑफिस में राजनीतिक व प्रशासनिक घटनाक्रम पर नियमित बात करते थे। रोज सवेरे उनको फोन करना मेरी दिनचर्या में शामिल था। इसमें कोई चूक हो जाए तो उनका फोन आ जाता था। वे उस दिन के प्रकाशित समाचारों की समीक्षा करते थे।
मेरी स्मृति में आज भी एक घटनाक्रम ताजा है, जब मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के जयपुर से बाहर प्रवास पर जाने का संक्षिप्त समाचार प्रकाशित हुआ था। सुबह मेरे फोन करने से पहले कुलिश जी का फोन आ गया कि दौरे का समाचार सही नहीं हैं। छोटी खबर पर भी उनकी नजर और पकड़ देख मैं चौंक गया। उनके नाराजगी भांपते हुए मैंने कारण बताया तो उन्होंने भविष्य में सतर्कता बरतने की हिदायत दी।
पिताजी से मित्रवत संबंधों के चलते कुलिश जी का मुझ पर अपार स्नेह और आशीर्वाद रहा। वे मुझे अज्जू या चुन्नू (मेरे घर का नाम) से ही पुकारते थे। उनका स्वास्थ्य नरम रहने लगा था, इसके बावजूद वे नियमित रूप से कार्यालय आते और बाहर पोर्च में गाड़ी में बैठे रहते। वहीं चुनिंदा लोगों से मिलते और उनके लिए कोई न कोई उपहार लेकर आते। एक दिन मैं अवकाश पर था। कुलिश जी को पता लगा तो वे घर चले आए। मेरे हाथ में थैली थमाते हुए कहा कि तेरे लिए फल लाया हूं। उनकी स्नेहमयी बातें आज भी मेरे स्मृति पटल पर हैं।
एक बार उन्होंने मुझे अपने निवास पर फोन कर तत्काल आने को कहा। मैं हतप्रभ था कि आखिर हुआ क्या। मैं स्कूटर उठाकर फटाफट उनके घर पहुंचा। वहां पहुंचने पर उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, अज्जू आज इमरती और कचौरी बनी है। तुझे खाने को बुलाया है। मैं रास्ते भर पता नहीं क्या-क्या सोचता उनके घर पहुंचा। वहां उनका प्रेम देख चकित रह गया। एकाध बार मुझे स्कूटर पर रिपोर्टिंग के लिए जाते हुए देख दफ्तर की तरफ से कार देने के आदेश किए। संभवत: मैं पहला रिपोर्टर था, जिसे संस्थान से गाड़ी मिली।
आपातकाल के दौरान पिताजी कानमल ढड्ढा के सम्पादकीय काफी चर्चित रहे। कुलिश जी पिताजी का बहुत सम्मान करते थे। जब पिताजी ने लेखनी को विराम देने का तय किया तो कुलिश जी उन्हें मनाने घर आए। उन्होंने कहा कि पत्रिका के आगाज में आपका अहम योगदान रहा है। पत्रिका की शुरुआत ही आपकी प्रिंटिंग प्रेस ‘मधु प्रिन्टर्स’ से हुई थी।
आपकी लेखनी पाठकों में रुचिकर बनी हुई है। उसे कैसे बंद कर सकते हैं। वे किसी तरह पिताजी को समझाने में सफल रहे और पिताजी पत्रिका के लिए लेख लिखते रहे। अपने साथियों को कैसे सहयोग और प्रोत्साहन देना है। यह कुलिश जी बहुत अच्छे से जानते थे। मैं भाग्यशाली हूं, जिसे कुलिश जी का स्नेह और आशीर्वाद लंबे समय तक मिला।
(लेखक पत्रिका से लंबे समय से संबद्ध हैं )