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सकारात्मक पहल

युवाओं को विश्वास में लेकर बातचीत किसी नतीजे तक पहुंचाई जा सकती है। कश्मीर में फैले आतंकवाद ने हर सरकार को परेशान किया है।
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Updated: 24 Oct 2017, 3:29 PM IST
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जम्मू-कश्मीर में शान्ति बहाली के लिए बातचीत का दौर फिर शुरू होने जा रहा है। केन्द्र सरकार के इस कदम को देर से उठाया गया एक सही कदम माना जा सकता है। केन्द्र ने बातचीत के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर सकारात्मक पहल की है। शर्मा को बातचीत के लिए पूरी आजादी दी गई है। वे ही तय करेंगे कि अलगाववादियों से बातचीत करनी है या नहीं। बातचीत के लिए समय सीमा भी तय नहीं की गई है। केन्द्र की यह पहल कुछ सवाल भी खड़े करती है। ऐसे सवाल जिनका जवाब जनता सालों से तलाश कर रही है।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने बातचीत शीघ्र शुरू होने तथा कश्मीरी युवाओं पर विशेष ध्यान देने की बात की है। कश्मीर पिछले तीन दशक से सुलग रहा है। हजारों लोग मारे जा चुके हैं तो लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा। देश के मुकुट के रूप में पहचाना जाने वाला जम्मू-कश्मीर साल दर साल अन्य राज्यों से पिछड़ता जा रहा है। पर्यटकों से आबाद रहने वाली कश्मीर घाटी सूनी पड़ी है। डल झील उदास है तो खामोश खड़े शिकारे बदहाली की कहानी बयां कर रहे हैं। कश्मीर के युवा को अपना भविष्य नजर नहीं आ रहा। ऐसे में बातचीत शुरू होने की खबर उम्मीद तो जगाती ही है।

दिनेश्वर शर्मा कश्मीर के हालात से भी परिचित हैं और पहले हुई बातचीत में आए अवरोधों से भी। कोशिश ये होनी चाहिए कि बातचीत में राजनीतिक दलों और अलगाववादियों की बजाए आम लोगों को महत्व दिया जाए। राजनीतिक दल और अलगाववादी कभी अपने स्वार्थों से ऊपर उठते ही नहीं। कश्मीर में आतंकवाद ने सबसे अधिक नुकसान आम आदमी को ही पहुंचाया है। युवाओं को विश्वास में लेकर बातचीत किसी नतीजे तक पहुंचाई जा सकती है। कश्मीर में फैले आतंकवाद ने हर सरकार को परेशान किया है।

राजनीतिक दलों को भी बातचीत के दौरान राजनीति करने से बचना होगा। चंद वोटों के फायदे के लिए वैमनस्यता को बढ़ाने वाली पुरानी सोच को भी छोडऩा होगा। कश्मीर एक बार देश की मुख्यधारा से फिर जुड़ जाए तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वत: निकल आएगा। ऐसा तभी संभव है जब सभी पक्ष संकुचित दायरे से बाहर आने का साहस दिखाएं।

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