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संपादकीय: सादगी का सवाल और अमीरी की जवाबदेही

आपदा प्रबंधन, पुनर्निर्माण, इलाज और बीमा जैसे सेक्टर में निवेश कर फिर से मुनाफा कमा लेंगे। 'दर्द देकर मरहम बेचने' का यह मॉडल बाजार की कुशलता भले हो, वास्तव में इंसान के रूप में हमारी नैतिक विफलता है।
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भारत

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Mukesh Kumar Bhushan

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Updated: 31 Oct 2026, 7:13 PM IST

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सादा जीवन, उच्च विचार' भारत में केवल कहावत नहीं, एक जीवन-दर्शन रहा है। महात्मा गांधी ने इसे जिया व संत-परंपराओं ने इसे नैतिक आदर्श बनाया। लेकिन 1991 के बाद जिस उदार अर्थव्यवस्था को हमने अपनाया, उसकी बुनियाद इसके उलट पश्चिमी तर्क पर टिकी है। उपभोग बढ़ेगा तो मांग बढ़ेगी, मांग से उत्पादन, उत्पादन से रोजगार और रोजगार से समृद्धि। इस दर्शन में खर्च करना गुण है और बचत करके सादगी से रहना कथित विकास की राह में बाधा। अंतरराष्ट्रीय संस्था ऑक्सफैम की ताजा रिपोर्ट 'डिजास्टर डिवाइडl इसी अंतर्विरोध को आईना दिखाती है। दुनिया की सबसे धनी 0.1 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 80 लाख लोग, तापमान बढ़ाने में औसत आम लोगों से 400 गुना अधिक योगदान दे रहे हैं। यह छोटा-सा समूह 3.5 अरब लोगों से ज्यादा कार्बन प्रदूषण फैलाता है। निजी जेट के सिर्फ दो सेकंड का कार्बन उत्सर्जन एक आम इंसान के पूरे साल के उत्सर्जन से अधिक बैठता है। विडंबना यह कि वर्तमान अर्थव्यवस्था में पैदा हुई समझदारी इसका महिमामंडन करती है।

असल समझदारी यह समझने में है कि इस विकास की दीर्घकालिक कीमत कौन चुका रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे धनी एक प्रतिशत के उत्सर्जन के प्रभाव से होने वाले जलवायु परिवर्तन से भविष्य में करीब 19 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इनमें 78 फीसदी मौतें उन देशों में होंगी, जिनका संकट बढ़ाने में योगदान मात्र आठ प्रतिशत है। दुनिया में 2050 तक सौ करोड़ लोगों के विस्थापन की भी आशंका है। हकीकत यही है कि अमीर अत्याधुनिक साधनों और महंगे इलाज से खुद को बचाने में सफल भी हो जाएंगे। जीना तो सिर्फ गरीबों का दुश्वार होगा। भारत के लिए, जहां करोड़ों लोग खेती और मेहनत पर निर्भर हैं, यह चेतावनी खतरनाक है। ऊपर से तुर्रा यह कि अति-धनी लोग आपदा में भी अपने लिए अवसर खोज लेंगे। आपदा प्रबंधन, पुनर्निर्माण, इलाज और बीमा जैसे सेक्टर में निवेश कर फिर से मुनाफा कमा लेंगे। 'दर्द देकर मरहम बेचने' का यह मॉडल बाजार की कुशलता भले हो, वास्तव में इंसान के रूप में हमारी नैतिक विफलता है।
इसका यह मतलब नहीं कि आम आदमी उपभोग छोड़कर सादा जीवन जीने लगे। आंकड़े बता रहे हैं कि सबसे निम्न आय वाले 50 फीसदी लोग ग्लोबल वार्मिंग में सिर्फ नौ फीसदी के हिस्सेदार हैं, जबकि सबसे धनी 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी 59 प्रतिशत है। इसलिए 'सादा जीवन' की अपेक्षा गरीबों से नहीं, संपन्न तबके से है। जब धरती के कुछ टुकड़े समृद्धि के द्वीप बनने लगें और उसकी कीमत बड़े हिस्से को उजाड़कर चुकानी पड़े तो पुराने आदर्श की ओर लौटना पिछड़ापन नहीं, विवेक है। सादगी को अब निजी गुण से आगे बढ़कर सार्वजनिक नीति बनना होगा, ताकि 'उच्च विचार' का अर्थ केवल भाषण नहीं, सुरक्षित धरती माना जाए।