
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी
-गुलाब कोठारी
एक कहावत है कि 'हाथी के दांत खाने के अलग और दिखाने के अलग'। राजस्थान सरकार भी अशोक गहलोत की तर्ज पर जादूगरी दिखा रही है। राज्य में जो कुछ हो रहा है, वह कुछ और है तथा जो दिखाया जा रहा है, वह पर्दा है-ढंकने के लिए। पदस्थापन की प्रतीक्षा में रखे गए भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी शिखर अग्रवाल पर पद के दुरुपयोग और आय से अधिक संपत्ति के आरोपों की जांच अब एसीबी करेगी। अफसरों के ऐसे कारनामे राजस्थान में कोई नए नहीं हैं। एसीबी बड़े अफसरों पर शिकंजा कसती भी है तो कई मामलों में बरसों तक कानूनी कार्रवाई ही नहीं हो पाती। कुछ मामलों में अफसरों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति सरकार की तरफ से जारी ही नहीं होती।
किसी भी विभाग को देख लें। पकड़ा जाए वो चोर! कितने शिखर अग्रवाल बैठे हैं? छोटे-मोटे मच्छरों को मारकर ध्यान भटकाने और वाहवाही लूटने का प्रयास किया जाता है। इनमें भी नाम छिपाए जाते हैं, क्योंकि मच्छर दिखाई पड़ जाएंगे।
राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ ही नहीं, देश के किसी भी कोने में चले जाइए, भ्रष्टाचार की पूंछ लंबी होती ही दिखाई देगी। गिनाने को तो काफी कुछ है, लेकिन कुछ बड़े मामलों से ही पता लग जाएगा कि भ्रष्टाचारियों के हाथ कितने लंबे होते हैं।
राजस्थान में चाहे मुख्यमंत्री के रूप में वसुंधरा राजे का कार्यकाल रहा हो या फिर अशोक गहलोत का, भ्रष्टाचार के दर्जनों मामले सामने आने के बावजूद सिस्टम में सुधार के कहीं प्रयास ही नहीं हुए। राजस्व मंडल के सदस्य रहते हुए आईएएस रविशंकर श्रीवास्तव पर आय से अधिक संपत्ति जुटाने का मामला लंबे समय से कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा हुआ है। वर्ष 2014 में खनन महाघूसकांड में वरिष्ठ आईएएस अशोक सिंघवी सहित कई अन्य अधिकारियों पर करीब ढाई करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के आरोप लगे। जल जीवन मिशन घोटाले में तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल लंबे समय से जेल में हैं। तत्कालीन जलदाय मंत्री तक को जेल जाना पड़ गया। एनएचएम घोटाले में आईएएस नीरज के. पवन भी जेल हो आए, पर दोषियों को सजा नहीं हुई।
मध्यप्रदेश में आईएएस अफसरों के भ्रष्टाचार के अलग-अलग मामलों में रमेश थेते, आशीष सिंह, अंशुल गुप्ता और अजय कटेसरिया जैसे अधिकारियों के नाम भी सामने आए थे। आईएएस अरविंद जोशी, टीनू जोशी और शशि कर्णावत की तो सेवाएं खत्म करनी पड़ीं। वहीं, छत्तीसगढ़ में पूर्व और मौजूदा आईएएस अधिकारियों में अनिल टुटेजा, निरंजन दास, रानू साहू, टामन सिंह सोनवानी और आलोक शुक्ला के नाम भी भ्रष्टाचार के विभिन्न प्रकरणों में सामने आए।
भ्रष्टाचार पनपने का सबसे बड़ा कारण नौकरशाही में जवाबदेही की कमी है। अभियोजन स्वीकृति में देरी और जांच एजेंसियों पर दबाव के कारण कई मामले वर्षों तक अटके रहते हैं। कमजोर निगरानी और शिकायत करने वालों की सुरक्षा व्यवस्था भी कमजोर ही रहती है।
राजस्थान में पिछले वर्षों में भी कितने ही विभागों के समाचार छपे हैं कि कहां क्या हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए। जो निर्णय सरकारों को करने चाहिए, वे नहीं हो रहे। कोर्ट के जो आदेश जारी हुए, उनकी भी क्रियान्विति नहीं हो रही। जयपुर के रामगढ़ बांध को लेकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा मौन हैं। उस रामगढ़ के लिए, जिसे भरवाने की घोषणा स्वयं मुख्यमंत्री ने की और राजस्थान उच्च न्यायालय का फैसला भी आ गया। इसके बावजूद वहां बहुमंजिला भवन खड़े हैं। इसी तरह सरिस्का अभयारण्य और सिलिसेढ़ क्षेत्र में होटल और रिसॉर्ट सरकार का मुंह चिढ़ा रहे हैं।
एक ओर सरकार जयपुर के विरासती ढांचे को संयुक्त राष्ट्र की सूची में बनाए रखने का दंभ भर रही है, वहीं शहर में कितने ही बहुमंजिला भवन खड़े हो चुके हैं। तत्कालीन सरकार ने पुरातत्व के सारे नियमों को धता बताकर मेट्रो को गले लगाया था और संबंधित अधिकारी हृदेश कुमार को बचाया था। तब कोर्ट अकेला क्या करेगा?
सरकारें जब सख्ती करती हैं तो लगता है कि भ्रष्टाचारियों की अब खैर नहीं। लेकिन एक-दो मामलों में सख्ती दिखाने से कुछ नहीं होने वाला। भ्रष्टाचार को खत्म करने का संकल्प पूरा करना है तो सिस्टम को सुधारना होगा। अन्यथा ऐसा लगता है कि हर विभाग में एक शिखर अग्रवाल बैठा है। सिस्टम में सुधार करने के लिए सरकारों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी। यह तय करना होगा कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई सिर्फ दिखावटी न हो। अन्यथा यह माना जाएगा कि सरकार में बैठे मंत्री और मुख्यमंत्री तक को राजी रखने का काम हो रहा है।
राजस्थान की बात करें तो सरकार के संकल्पों में यही हाल नशामुक्ति अभियान का भी बना हुआ है। सरकार ने नशामुक्ति के लिए पूरा दम लगा रखा है। रोज बड़ी मात्रा में माल पकड़ा जाता है, गिरफ्तारियां भी होती हैं। लेकिन सवाल है कि गांवों में हर जगह माल दबा है और ग्रामीणों को इसकी जानकारी ही नहीं? सरकार ने उतना ही दम अंग्रेजी शराब बेचने में लगा रखा है। मानो वह अमृत कलश हो। आज तो छोटे-छोटे गांवों में भी नशामुक्ति अभियान की तर्ज पर यह अमृत बेचा जा रहा है। मद्य निषेध वाले राज्यों में धड़ल्ले से बिक रही शराब की बात अलग है। सरकारें कमाई के नशे में हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो और संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में वर्ष 2020 में 4,250, 2021 में 6,158, 2022 में 7,412, 2023 में 8,012 और 2024 में 8,597 बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज हुए। पांच साल में यह संख्या 34,429 रही। लापता बच्चों में 842 बालिकाएं हैं। घर-घर में मातम है और अभिभावकों की आंखें पथरा गई हैं, जबकि पुलिस की आंखें बंद हैं। वे तो नशामुक्ति के आंकड़े जताने में व्यस्त हैं।
सोचिए, देश भर का चित्र कैसा हृदयविदारक होगा। कौन नहीं जानता कि लड़कियां बेची जाती हैं। कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश लगा तो चोरी होने लगी। उन्हें विदेशों में ले जाया जाता है। इनके अंग बेचे जाते हैं। हां, पुलिस इस 'कन्या पूजन' में भागीदार अवश्य है। आज तो बाकी चोरियां इनके आगे क्या अर्थ रखती हैं? यह साफ है कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात हो या फिर मादक पदार्थों की बिक्री और मानव तस्करी के खिलाफ अभियान, दिखावे की बजाय सख्ती की ज्यादा जरूरत है। आंखें खोलनी ही होंगी।
-gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
1 Nov 2026, 8:04 AM IST
Published on:
1 Nov 2026, 8:04 AM IST
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.