क्षमावाणी पर्व पर विशेष: क्षमा की अग्नि और उसकी तपन अहिंसा को सक्रिय बनाने में सहायक होती है। अहिंसा का पाठ क्षमा में निहित है। अहिंसा की पहली और अंतिम शर्त क्षमा ही है।
- प्रवीण चंद्र छाबड़ा
क्षमा बहते हुए झरने की तरह है जो अपने सौंदर्य व पवित्रता को लिए नित्य नवीन हुआ रहता है। क्षमापन, किसी को अपने आप के सिवा न कुछ देता है और न ही किसी से लेता है। न किसी का स्वामी बनता है और न ही बनाता है। क्योंकि क्षमा स्वयं ही संपूर्ण है। क्षमा का हृदय में बने रह पाना ही जीवन का सत्य है। क्षमा, आत्मा का सौंदर्य है, जहां प्रेम है, सौहार्द है और मित्र बनाने का सात्त्विक आधार है। क्षमा में विवाद नहीं बल्कि संवाद है।
देखा जाए तो क्षमा जीवन में यथार्थता प्रदान करती है। क्षमा भाव परस्पर व्यक्तियों के लिए होने से अधिक समाज व राष्ट्रों के लिए हैं। राष्ट्रों के विवाद अंदर ही अंदर गहराते हैं और संवाद के अभाव में क्रिया-प्रतिक्रिया का वातावरण बनाते हैं। जो हुआ या हो रहा है उसे भूल जाने की तैयारी नहीं होती। अपने में अपने लिए होना आसान नहीं होता।
क्षमापन सापेक्षता की चेतना है। विवादों का अंत संवाद में है और वह क्षमा के लिए होने में है। संवाद के लिए नकारना अपने प्रति अविश्वास है। क्षमा की शक्ति सत्य में है और यही अहिंसा की शक्ति है। वही प्रभामण्डल का निर्माण करती है जिसका आदि या अंत नहीं होता। गलतियों और गुनाहों के ऐसे माहौल में व्यक्तियों के साथ-साथ राष्ट्रों में भी आपसी विश्वास का भाव जगाना होगा। खास तौर से पड़ोसीे देशों के साथ। प्रतिक्रया में अहिंसा और क्षमा को सामने रखना ही होगा।
क्षमापन किसी बात को लेकर बैठे रहने की जगह भुला देने का व्यवहार है। अपने आप में वापस लौटने और किए कर्म को समझने का सात्त्विक प्रतिक्रमण है। एक तरह से लोकआचरण है। अध्यात्म से भरा यह उत्सव उल्लासमय भी होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि क्षमा में सत्य का बल है। प्रेम, आस्था, ममता और समता का रस है।
एक बात यह भी है कि क्षमा, मांगने में नहीं बल्कि आचरण में होने की आंतरिक क्रिया है। क्षमा भावातिरेक में नही मांगी जाती, बल्कि क्षमा मांगने और करने का भाव अपने आप आता है। यह हमारी परस्परता को और घनिष्ठ और व्यापक बनाती है। क्षमा का लेखा बाहरी इन्द्रियां सहसा नहीं ले पाती। उसे प्रज्ञा आंखों से ही देखना पड़ता है।
क्षमा की अग्नि और उसकी तपन अहिंसा को सक्रिय बनाने में सहायक होती है। अहिंसा का पाठ क्षमा में निहित है। अहिंसा की पहली और अंतिम शर्त क्षमा ही है। क्षमा, अपने को जीत लेने का उपाय है। क्षमापन पर्व, बेशक एक पंथ की खोज है लेकिन यह पर्व किसी पंथ का नहीं।