ओपिनियन

संवेदनशील और दृढ़ संकल्पी थे शास्त्रीजी

सचमुच शास्त्री जी मन से अहिंसक थे, नेहरू जी को उन पर पूरा भरोसा था
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Oct 03, 2017
lal bahadur shastri
lal bahadur shashtri

- प्रवीण चन्द्र छाबड़ा, वरिष्ठ पत्रकार

तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने १९६५ के भारत-पाक युद्ध में पूरे साहस और विश्वास के साथ देश के स्वाभिमान की रक्षा की। देशभर में यात्राएं कर उन्होंने जन-जागरण अभियान चलाया। इसी दौरान जोधपुर और जयपुर आये और विशाल जनसभाओं को संबोधित किया। इस युद्ध में जोधपुर में सबसे ज्यादा बम गिरे थे। यह शहर हर रात खाइयों व खन्दकों के अंधेरे में रहने का अभ्यस्त हो गया था। जयपुर में राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की ओर से रामनिवास बाग में अल्बर्ट हॉल म्यूजियम पर सभा की गई।

शास्त्रीजी ने म्यूजियम की उस अटारी से ढाई लाख से अधिक लोगों को संबोधित किया जहां से सरदार पटेल तथा जवाहर लाल नेहरू सभा को संबोधित करते रहे थे। राष्ट्रीय सुरक्षा समिति का मानद मंत्री होने के नाते म्यूजियम से उस दृश्य को देखने-जानने का दुर्लभ अवसर मिला। सभा के दौरान शास्त्रीजी ने जब जय-जवान-जय किसान का उद्घोष किया तो दूर-दूर तक लोग मुखर हो उठे। उन्होंने सोमवार की शाम को एक समय के उपवास के व्रत के संकल्प का आह्वान किया तो लाखों हाथ उठ गए, संकल्प लेने के लिए।

जय-जवान, जय-किसान का नारा सशक्त होकर जनता की जुबान पर हो गया। हर जवान यह मानने लगा कि वह सरहद पर अकेला नहीं है। वह समय रोमांचकार हो गया जब शास्त्री जी के पीछे खड़े रहने और विशाल जनमेदिनी का दृष्टा होने के साथ साक्षी हो सका। शास्त्री जी के साथ सभा में तत्कालीन राज्यपाल डॉ. सम्पूर्णानंद, मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा तथा सुरक्षा समिति के अध्यक्ष रामकिशोर व्यास थे। शास्त्री जी की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री बनने से पूर्व दुश्मन की गाली का जवाब गोली से करने वाले शास्त्री जी उस समय विह्वल हो गए, जब अणुबम परीक्षण को लेकर पं. नेहरू से चर्चा चली। वे इस पक्ष में नहीं थे कि समुद्र में यह परीक्षण हो।

उनका मानना था इससे समुद्र में अनगिनत जीव मारे जाएंगे। शास्त्री जी उदास मन से बैठक के बाद घर लौटे। तभी पं. नेहरु का बुलावा आ गया। शास्त्री जी पहुंचे तो नेहरू जी ने कहा- मुझे लगा कि तुम नाराज होकर चले गए। मैंने भी सोचा इस विषय पर जल्दी निर्णय नहीं लेना है। पंडित जी ने अपने साथ खाना खाने के लिए कहा। लगता है आत्मिक बल और चिंतन की गहराई, उसकी सच्चाई बिना कहे किसी तरह एक-दूसरे के पास पहुंच जाती है और वह कहने से अधिक गहरी होती है। सचमुच शास्त्री जी मन से अहिंसक थे, नेहरू जी को उन पर पूरा भरोसा था। अत्यंत ईमानदार, दृढ़ संकल्पी, शुद्ध आचरण बुद्धि और महान परिश्रमी, ऊंचे आदर्शों से पूर्ण आस्थावान निरंतर सजग ऐसे व्यक्तित्व का नाम है लालबहादुर शास्त्री।

Published on:
03 Oct 2017 12:48 pm