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संपादकीय: साइबर ठगी रोकने के लिए समन्वित प्रयासों की दरकार

साइबर ठगी अब केवल वित्तीय अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती भी बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश बैंकिंग व्यवस्था, जांच एजेंसियों और नागरिकों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत को रेखांकित करते हैं। डिजिटल सुरक्षा तभी मजबूत होगी, जब तकनीक के साथ जागरूकता और त्वरित कार्रवाई भी सुनिश्चित हो।
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Aug 06, 2026
cyber crime
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डिजिटल भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह है कि आज बैंकिंग, भुगतान, निवेश और सरकारी सेवाएं लोगों की अंगुलियों पर उपलब्ध हैं। लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि तकनीक की यही सुविधा अब अपराधियों का सबसे बड़ा हथियार भी बनती जा रही है। साइबर ठगी, फर्जी निवेश, ओटीपी धोखाधड़ी और 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे अपराधों ने लोगों के भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) सहित विभिन्न संस्थाओं को दिए गए निर्देश न केवल समायोचित हैं, बल्कि साइबर अपराध से निपटने के लिए समन्वित और सख्त प्रयासों की जरूरत भी बताने वाले हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआइ को साइबर ठगी में इस्तेमाल होने वाले खातों के संबंध में चार सप्ताह के भीतर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने का निर्देश दिया है। साथ ही, राज्य सरकारों, जांच एजेंसियों, कानूनी सेवा प्राधिकरणों और अदालतों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह स्वीकार करना होगा कि साइबर अपराध अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। आज ठग केवल तकनीक का ही नहीं, बल्कि इंसानी मनोविज्ञान का भी शातिर तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। कभी बैंक अधिकारी बनकर, कभी पुलिस या सीबीआइ के नाम पर और कभी अदालत या सरकारी एजेंसी का भय दिखाकर लोगों को घंटों तक 'डिजिटल अरेस्ट' में रखा जाता है। इसके बाद उनकी जीवनभर की कमाई कुछ ही मिनटों में ठग ली जाती है। सबसे बड़ी चुनौती साइबर अपराधों का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप है। कई गिरोह विदेशों से संचालित होते हैं। धन के लेन-देन को छिपाने के लिए देश के भीतर हजारों म्यूल अकाउंट का इस्तेमाल किया जाता है। संदिग्ध खातों की समय रहते पहचान हो, उन्हें तुरंत फ्रीज किया जाए और बैंकिंग प्रणाली की निगरानी मजबूत की जाए, तो ठगी की बड़ी रकम बचाई जा सकती है। आरबीआइ की एसओपी एक प्रभावी कार्ययोजना होनी चाहिए, जिसका सभी बैंक समान रूप से पालन करें। पुलिस, बैंक, दूरसंचार कंपनियों और साइबर सेल के बीच रियल-टाइम समन्वय भी आवश्यक है। साइबर अपराध की शिकायत दर्ज होने और कार्रवाई शुरू होने के बीच जितनी देरी होगी, अपराधी उतनी ही आसानी से धन को कई खातों में स्थानांतरित कर देंगे। इसलिए त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को और अधिक प्रभावी बनाना होगा।

तेजी से बदलती तकनीक के दौर में लोगों को भी डिजिटल सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाना होगा। स्कूलों, कॉलेजों, कार्यालयों और गांवों तक साइबर सुरक्षा संबंधी अभियान नियमित रूप से चलाए जाने चाहिए। साइबर ठगी के विरुद्ध लड़ाई केवल सरकार, अदालतों या बैंकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह विभिन्न संस्थाओं और नागरिकों की भी साझा जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश महत्वपूर्ण शुरुआत है, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे किस तरह लागू किया जाता है।

Updated on:
06 Aug 2026 03:50 pm
Published on:
06 Aug 2026 03:50 pm