ओपिनियन

मां ही बनाती है भगवान- गर्भ में रचती है नई सृष्टि

माता ही गर्भ में नई सृष्टि रचती है-माता गर्भे जनयति। गर्भ में वह शिशु के आत्मा को संस्कारित करती है और अपने भुक्तान्न से उसके शरीर का निर्माण करती है। गर्भ से बाहर आने पर वह उसी आत्मा को व्यक्तित्व प्रदान करती है।
4 min read
Aug 22, 2026
gulab kothari article
फोटो-पत्रिका

माता गर्भे जनयति। मां भगवती है और वह अपना यह दिव्य स्वरूप रक्त-संस्कार के माध्यम से शिशु में संचारित कर उसको भगवान बनाती है। इसलिए तैत्तिरीय श्रुति में कहा गया है-मातृदेवो भव। माता के साथ पिता और आचार्य को भी देवत्व श्रेणी में रखा गया है। पिता बीज प्रदाता है। बीज के बिना वृक्ष का होना असंभव है। सुश्रुत संहिता में कहा गया है जिस प्रकार अनुकूल ऋतु, हल जुता हुआ क्षेत्र, जल और बीज के संयोग से अंकुर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार ऋतुकाल, शुद्ध गर्भाशय, आहार रस और शुक्र-शोणित के संयोग से गर्भ की प्राप्ति होती है।

धु्रवं चतुर्णां सान्निध्याद् गर्भ: स्याद् विधिपूर्वक:।
ऋतुक्षेत्रम्बुबीजानां सामथ्र्याद् अंकुरो यथा। (सुश्रुत संहिता २.३३)

वैदिक दृष्टि से सृजन ब्रह्म की मूल कामना है-एकोऽहं बहुस्याम्। माया इसी कामना की पूर्ति के लिए सृजन की शक्ति है। ब्रह्म की सृष्टि में स्थूल भाव में पुरुष और स्त्री ही इस कामना की पूर्ति का माध्यम बनते हैं। यह सर्जनेच्छा आरंभ से ही उनके सूक्ष्म शरीर में विद्यमान रहती है। कारण शरीर ही इच्छा, वासना और संस्कारों का संग्रह है। गर्भ में केवल भौतिक पिण्ड नहीं बनता बल्कि जीवात्मा और ब्रह्मांश का आगमन होता है। जीवात्मा के साथ उसका कारण शरीर जुड़ा होता है जिसमें उसके पूर्वजन्मों के संचित कर्म और संस्कार साथ रहते हैं।
आचार्य सुश्रुत के अनुसार शुक्र और शोणित के संयोग से जब उसके साथ जीवात्मा की प्राप्ति होती है, तब उसको गर्भ कहा जाता है। गर्भ कर्मपुरुष के साथ ही भौतिक लिंग शरीर से भी युक्त होता है  जिसमें सत्व-रज-तम तीनों गुण तथा देवासुर-भाव भी विद्यमान रहता है।

एक श्रेष्ठ संतान हेतु स्थूल शरीर की शुद्धि, मन का संस्कार और सूक्ष्म ऊर्जाओं का जागरण गर्भाधान पूर्व ही करना आवश्यक है। गर्भाधान प्रक्रिया में स्त्री और पुरुष की क्रियाएं मात्र जैविक न होकर आध्यात्मिक भावों से भी युक्त रहती हैं। यह प्रक्रिया तीन स्तरों पर एक साथ घटित होती है-स्थूल (शारीरिक), सूक्ष्म (मानसिक/प्राणिक) तथा कारण (आध्यात्मिक)। स्थूल शरीर की आरंभिक तैयारी को गर्भाधान से पूर्व ही किया जाता है। इस हेतु दोनों ही वमन, विरेचन आदि यौगिक क्रियाओं से अपने शरीर का शोधन करते हैं, ताकि वात, पित्त, कफ रूप त्रिदोषों में संतुलन बन सके। त्रयो वा इमे त्रिवृतो लोका: के अनुसार क्रमश: दिव्याग्नि, पार्थिवाग्नि और अद्भ्य: से उपलक्षित द्युलोक, पृथ्वी और अन्तरिक्ष ही वायु, अग्नि और सोम हैं, जो त्रिधातुयुक्त औषधियों की उत्पत्ति के मूल कारण हैं—

त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रि: पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भ्य:।
ओमानं शंयोर्ममकाय सूनवे त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती॥ (ऋग्वेद १.३४.६)

भुक्त अन्न (औषधियां) ही शुक्र रूप में परिणत होता है। पुरुष के साथ ही स्त्री में भी यह धातु साम्य आवश्यक है ताकि प्रजनन के अनुकूल ऋतुकाल में कष्ट न हो। औषधि रूप अन्न में  तीनों धातुओं का संतुलन आवश्यक है। धातुत्रयी की साम्यावस्था नैरोग्य है तथा विषमावस्था रोगों की उपक्रम स्थली बनती है- 

विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते
सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दु:खमेव च। (चरक सूत्र १)

शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते -गीता सिद्धांत के अनुसार गर्भाधान पूर्व में दम्पती की प्रार्थनाओं का प्रभाव ही उस दिव्यात्मा को आकृष्ट करता है और गर्भ में प्रतिष्ठित होकर नवीन योनि की यात्रा का पथिक बनता है। इस क्रम में गर्भ छह भावों से युक्त होता है—
भावा: स्यु: षड्विधास्तस्य मातृजा: पितृजास्तथा।

रसजा आत्मजा: सत्त्वसंभवा: सात्म्यजास्तथा।। (संगीतरत्नाकर: - स्वराध्याय 2.44)

मांस, शोणित, मेद, मज्जा, हृदय, नाभि, यकृत, प्लीहा, अंत्र तथा गुदादि मृदु भाग माता से प्राप्त होते हैं। केश, श्मश्रु, लोम, अस्थि, नख, दन्त, शिरा, स्नायु, धमनी, रेत आदि स्थिर भाग पिता से प्राप्त होते हैं। शरीर की पुष्टि, बल, वर्ण (कान्ति) स्थिरता तथा विनाश रस से उत्पन्न होते हैं। एकादश इन्द्रियां, ज्ञान, विज्ञान, आयुष्य, सुख-दु:ख आदि आत्मा से उत्पन्न होते हैं। भक्ति, शील, शौच, द्वेष, स्मृति, तन्द्रा, भय, उत्साह, मृदुता, गांभीर्य, चंचलता आदि सत्व से पैदा होते हैं। सात्म्य से उत्पन्न होने वाले वीर्य, आरोग्य, मेधा, बल आदि हैं।

इन छहों भावों में से त्वचा, मांस आदि मातृज हैं, जो मां के रस से बनते हैं। रस से उत्पन्न होने वाले भी गर्भनाल द्वारा माता के आहार रस से ही पोषित होते है। सात्म्यज भावों का भी सीधा जुड़ाव गर्भावस्था में माता के आहार-विहार से है। सात्विक गुणों का आधान भी गर्भावस्था में मां पर ही निर्भर है। मां का आचार-विचार, जप-ध्यान, संगीत, हंसना-रोना आदि ही शिशु के मन को आकार देते हैं।

यही कारण है कि शिशु के पूर्ण विकास में माता की भूमिका सर्वोपरि होती है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश और श्री इन भगों का रोपण वह गर्भ में ही कर देती है। मां गर्भ में सूत्रधार है और बाहर चित्रकार। गर्भ में माता जैसा पोषण कर सकती है, वैसा कोई और नहीं कर सकता। वह आहार, रस, भावना और संस्कार द्वारा गर्भ में भग के बीज रोपती है तथा गर्भ से बाहर स्पर्श, शिक्षा और अनुशासन द्वारा उस बीज को वृक्ष बनाती है। मां की यह दिव्य भूमिका गर्भ में और भूमिष्ठ दोनों ही अवस्थाओं में भावनात्मक दृष्टि से भिन्न होती हैं क्योंकि उसका एकमात्र उद्देश्य रहता है- शिशु रूपी भगवान के छह भगों की पूर्णता।

गर्भ में वह बिना शब्दों के  केवल अपनी चेतना, आहार और स्पन्दनों से शिशु का प्रारूप बनाती है। अपने सात्विक आहार से वह शिशु के श्री (सौंदर्य) और ऐश्वर्य (शारीरिक बल) का आधान करती है। यही आहार शिशु में स्वाभाविक स्थिरता के रूप में धर्म-बीज की स्थापना करता है।

अपनी चेतना से मां उसमें ज्ञान और वैराग्य का बीज बोती है। जागरुक मां ही शिशु को सही दिशा में प्रेरित कर सकती है। सकारात्मक भावों का चिंतन व मनन ही ज्ञान और वैराग्य भावों के साथ उसके यश प्राप्ति के मार्ग में सहायक बनते हैं। मां का हर स्पन्दन शिशु महसूस करता है। अत: मां का कत्र्तव्य है कि वह गर्भकाल में यथानुरूप आहार-विहार करे, जिससे छह भगों के बीजों का रोपण हो सके।

गर्भ में शिशु मात्र ग्राहक है तथा मां दात्री है। जबकि गर्भ से बाहर मां प्रकाशक और संरक्षक बन जाती है, जिसकी छत्रछाया, सही परिवेश, स्नेह और अनुशासन में शिशु का पूर्ण विकास होता है। गर्भ से बाहर आते ही माता के स्पर्श में वह अपने अस्तित्व को सुरक्षित पाता है। यही आधारभूत विश्वास उसमें आंतरिक ऐश्वर्य स्थापित करता है। ओजस व मन का स्थानान्तरण माता के दूध से शिशु में होता है। दुग्धपान के माध्यम से वह उसे श्री (कृपा, कोमलता) और धर्म (संतोष) का पहला रसास्वादन कराती है। शिशु के लिए मां एक दर्पण के समान है। वह मां की प्रत्येक क्रिया को देखता है। उसके व्यवहार से वह यश, वैराग्य और ज्ञान भाव को ग्रहण करता है। मां जानती है कि किस अवस्था में बालक को अनुशासन व सीमाओं में रखना है। गर्भ में सबकुछ अवरोधहीन था, किंतु बाहर मर्यादित। मर्यादा में रहकर ही बालक धर्म व वैराग्य भाव के प्रति जागरूक बनता है।

गर्भस्थ और भूमिष्ठ दोनों ही अवस्थाओं में मां ही निर्मात्री है, जो गर्भ में जल तत्त्व की तरह चारों ओर समाहित रहकर गर्भ में रक्षिका बनती है। बाहर आने पर वह वायु तत्त्व के समान वेष्टन भाव के साथ गति, प्रेरणा और दिशा प्रदान करती है। अपने आचरण, स्नेह, संस्कार और ऊर्जा से संतान को भगवत् स्वरूप में प्रतिष्ठापित करने का महनीय कर्म करती है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com