
-गुलाब कोठारी, प्रधान संपादक पत्रिका समूह
शास्त्रों में नौ का अंक पूर्णता, अखंडता और ब्रह्म का प्रतीक है। यह पूर्णता बाहरी नहीं, भीतरी है। नव का अभिप्राय नवीन भी होता है। नवो-नवो भवति जायमानो अर्थात् प्रतिदिन नवीनता की ओर बढ़ना ही हमारा उत्थान है। नव शब्द शरीर के नवद्वारों को भी बताता है-नवद्वारपुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्। (गीता 5.13)
यह नवग्रहों, नवरसों, नवरत्नों व नवधा भक्ति को भी पूर्णता की ओर ले जाने वाला अद्भुत अंक है। रात्रि के साथ जुड़कर यह सृष्टि के अपूर्व काल का नियामक बन जाता है, जिसे नवरात्र कहा जाता है-नवानां रात्रीणां समाहार: इति नवरात्रम्। नौ रात्रियों का समूह ही नवरात्र कहा जाता है। संवत्सर में नक्षत्र योग की दृष्टि से 360 रात्रियों में 40 नवरात्र बनते हैं। इन चालीस में से चार नवरात्र दैव, पितर और मनुष्य से जुड़ते हैं। सूर्य के दक्षिणायन में जाने का काल पितृ नवरात्र का सूचक है। जब सूर्य उत्तरायण की ओर गमन करता है तब वह काल दैव नवरात्र कहा जाता है। मानव का संबंध संवत्सर व्रत के मध्यस्थ विषुवद्वृत्त से माना जाता है। अत: सम्बद्ध शरदसम्पात् और वसन्तसम्पात् से ही मानव का साक्षात् संबंध माना जाता है। शारदीय और चैत्र नवरात्र कहलाते हैं।
नवरात्र मूलत: दैवीय शक्ति का पर्व है। देवी की आराधना मूल है, किंतु दैवीय शक्ति के अधिष्ठाता शक्तिमान का भी नवरात्रों में आह्वान किया जाता है। सृष्टि युगल भाव पर आधारित है। बिना शक्ति के शक्तिमान नहीं और शक्तिमान के बिना शक्ति की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। अर्धनारीश्वर का मूल रहस्य ही यही है कि शक्ति-शिव, प्रकृति-पुरुष, चेतना और ऊर्जा अभिन्न हैं। नवरात्र में भी दोनों की संयुक्त उपासना की जाती है। शिव निष्क्रिय है, साक्षी है, आधार है तथा शक्ति सक्रिय, सृजनात्मक और गतिशील है। नवरात्र में देवी की उपासना इसलिए भी प्रधान हो जाती है क्योंकि शक्ति ही सक्रिय, अनुभवगम्य और सुलभ है। शक्ति सृष्टि का मुख है, किन्तु उसका आधार शिव है। मुखमेव मुख्यम् व्युत्पत्ति के अनुसार सांसारिक विधान में स्त्री की मुख्यता है।
देवी के नौ स्वरूपों की उपासना मात्र धार्मिक विधान ही नहीं बल्कि स्त्री के दैवीय भावों को शास्त्रों के आधार पर समझने का गहन आध्यात्मिक कर्म भी है। स्त्री केवल शरीर नहीं बल्कि शक्ति का साक्षात् स्वरूप है। सृष्टि पालन और संहार की समस्त शक्तियों का पवित्र संगम स्त्रीत्व है। स्त्री का प्रत्येक गुण, भाव और क्रिया मूल रूप से दिव्य शक्ति का ही विस्तार है। मार्कण्डेय पुराण में देवी के नौ स्वरूपों का वर्णन किया गया है।
प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रिश्च महागौरीति चाष्टमम्॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
नवरात्रों में देवी के नौ स्वरूपों की उपासना में सृष्टि सृजन, पालन और संहार के सभी आयाम निहित हैं, जैसे शैलपुत्री-स्थिरता और प्रकृति की देवी है। ब्रह्मचारिणी तप और ज्ञान से जोड़ने वाली शक्ति है। चंद्रघंटा से शांति और संतुलन की शिक्षा मिलती है। कूष्माण्डा सृष्टि की सृजनात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। स्कन्दमाता मातृत्व और प्रतिरक्षा की समझ देती है।
कात्यायनी न्याय और साहस का मार्ग प्रशस्त करती है। कालरात्रि विनाश और रक्षा उभय भावों से समन्वित है। महागौरी पवित्रता का संदेश देती है। सिद्धिदात्री पूर्णता और एकीकरण की ओर ले जाती है। स्थूल स्त्री में ही नहीं बल्कि समस्त चौरासी लाख योनियों की मादाओं में यह शक्ति स्वरूप रहता है, उनकी मात्रा, सक्रियता और अभिव्यक्ति में परिस्थिति व चेतना के अनुसार भिन्नता हो सकती है। शास्त्रों में मानवेत्तर योनियों में भी मातृत्व, दया, रक्षा, बलिदान जैसे अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। वेद में गाय को रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन कहा है (8.101.15-16)। या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता-मार्कण्डेय पुराण की यह श्रुति इसी स्वरूप की समस्त प्राणियों में प्रतिष्ठा करती है।
स्त्रीत्व मूलत: सृजन से, पालन व पोषण से जुड़ा है अत: नवरात्रि व गर्भ के नौ महीनों में एक गहन प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक साम्य स्थापित हो जाता है। जिस प्रकार सृजन, पोषण व रूपान्तरण का काल नवरात्र है उसी प्रकार गर्भकाल भी सृजन-पोषण व रूपान्तरण का काल बन जाता है। बिन्दु भाव को पूर्ण स्वरूप में लाने वाला यह काल गर्भ दृष्टि से शिशु के पूर्ण भाव की प्राप्ति का सूचक है। नवरात्रि में साधक नौ दिनों में साधना पथ पर आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता प्राप्त करता है।
गर्भावस्था के प्रत्येक माह में स्त्री के भीतर नवदुर्गा का विशेष स्वरूप जागृत होता है, जो शिशु के सम्पूर्ण निर्माण में सहायक बनता है। प्रथम माह शैलपुत्री के स्वरूप की प्रतिकृति है, जहां गर्भ में नए जीवन का बीज रोपा जाता है। द्वितीय माह में शारीरिक व मानसिक रूप से स्त्री असहजता अनुभूत करती है। यह काल तपस्या के समान होने से इसको ब्रह्मचारिणी से समेकित किया जा सकता है। तृतीय महीने में शिशु की हलचल से आश्वस्त मां साहस और निर्भीकता को प्राप्त होती है। यही चंद्रघंटा स्वरूप है। कूष्माण्डा सृजनात्मक ऊर्जा है। चतुर्थ मास में बच्चे का तीव्र विकास होना ही मां के भीतर सृजन की नवीन ऊर्जा का संचार है।
बच्चे के पोषण और सुरक्षा के पूर्ण समर्पण का काल पांचवां माह है, जिसको मातृत्व व पोषण की अधिष्ठात्री कूष्माण्डा का प्रतीक माना जाता है। न्याय और कर्तव्य की देवी कात्यायनी से मां सीखती है कि कैसे अपने स्वास्थ्य और शिशु के स्वास्थ्य के मध्य संतुलन स्थापित किया जाए। गर्भोपनिषद् में कहा गया है कि सप्तमे मासे जीवेन संयुक्तो भवति अर्थात् जीव का प्रवेश सातवें मास में होता है। अत: सप्तम मास परिवर्तन का काल है। गर्भस्थ को प्रशिक्षित करने का काल। पुनर्जन्म के संस्कारों के परिष्करण का काल। नवीन संस्कारों के आरोपण का काल। अत: यह कालरात्रि के गुणों-संहार और परिवर्तन का सूचक बन जाता है। महागौरी अष्टम दिन पूजी जाती है, जो पवित्रता और शांति से जुड़ी है। अष्टम मास में मां शिशु के वृद्धि भाव से मानसिक रूप से शांत हो जाती है, उसकी चिंता समाप्तप्राय: हो जाती है।
शिशु के संस्कारों के परिष्करण से एक पवित्र भाव वहां आ जाता है। नवम दिवस पूर्णता का दिन है जब यह सिद्धि प्राप्त होती है, यही सिद्धिदात्री है जो गर्भ के नवें मास की परिपुष्टि से जुड़ी है। नवें मास में गर्भ के सर्वांगों का समुचित विकास हो जाता है। यह पूर्णता को प्राप्त गर्भ दसवें मास में भूमिष्ठ हो जाता है। यही वामन से विराट स्वरूप की प्राप्ति है। गर्भ के नौ माह जहां जैविक सृजन की प्रक्रिया हैं, वहां नवरात्रि की नौ रातें आध्यात्मिक सृजन की। जिस प्रकार नौ महीनों में एक पूर्ण शिशु का निर्माण होता है उसी प्रकार नौ दिनों में साधना साधक को आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता तक ले जाती है। 10वें (विजयदशमी) दिन विजय प्राप्त होती है, यानि नवीन जन्म प्राप्त होता है अध्यात्म भाव में।
-क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com