
गीता सिद्धांत के अनुसार ईश्वर अव्यय पुरुष का वाचक है- यो लोकत्रयमाविश्य बिभत्र्यव्यय ईश्वर: (15.17)। वह असंग, अविकृत और सर्वत्र एक रूप से व्याप्त रहता हुआ भी अव्यय कहा जाता है। ईश्वर को जीव भाव में लाने वाली ईश्वर की विशेष शक्ति योगमाया है, जिसके आवरण से ही अव्यय पुरुष प्रत्येक प्राणी में रहता हुआ भी प्रकट भाव में नहीं आ पाता - नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमाया समावृत: (7/25)। संसार के सभी जीव इसी योगमाया से मोहित रहते हैं। सायास ही इस आवरण से मुक्त हो जाते हैं किंतु जिस जीव का बिना प्रयास ही यह आवरण हटा रहता है, अपनी शक्तियों के प्रभाव (प्रकट होने) से वह भगवान कहलाने लगता है। यह अनावरण उस अव्यय की शक्तियों का ही होता है, जो प्रत्येक जीव के हृद् प्रदेश में प्रतिष्ठित है। अनन्त शक्ति सम्पन्न अव्यय की छह शक्तियों के आधार पर ही भगवान शब्द की प्रतिष्ठा है -
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशस: श्रिय:।
ज्ञान-वैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ।।
सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य- ये छह शक्तियां ही भग कही जाती हैं। जिसमें ये छ: भग रहते हैं, वही भगवान कहलाता है। जिस तत्व के आगमन से जीव भायुक्त अर्थात् प्रकाश युक्त बन जाता है, वही तत्त्व भम् कहलाता है। प्रकाशित करने का सामर्थ्य आत्मज्योति में ही रहता है। जहां भूतज्योति प्रकाशित वस्तुओं का ही ज्ञान कराने में समर्थ होती है, वहीं आत्मज्योति प्रकाश एवं अंधकार दोनों का ज्ञान करवाती है। इस दृष्टि से आत्मज्योति का ही नाम भम् है। जो शक्तिविशेष भम् प्राप्ति में सहायक है, उसी को भग कहा जाता है- येन भं प्राप्यते। धर्म, ज्ञान आदि छह धर्म ही भम् प्राप्ति के द्वार हैं। इन्हीं छहों के कारण भम् भाव को मनुष्य पाता है और वही भगवान कहलाता है।
मूलत: अव्यय के दो धातु हैं - विद्या (ज्ञान) एवं कर्म। जो धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य इन चार विद्या भावों से समन्वित रहता हैं, वही ईश्वरत्व पाता है। कर्म भाव सृष्टि भाव में लाने में सहायक है, जो राग-द्वेष, सम्मोह, अस्मिता और अभिनिवेश- इन चार अविद्या भावों से युक्त रहता है। अव्यय की पांच कलाओं में से आनन्द, विज्ञान और मन- मुक्तिसाक्षी कलाएं हैं तथा मन, प्राण और वाक् सृष्टिसाक्षी कलाएं हैं। आनन्द के साथ अव्यय हृदयस्थ ईश्वर के सन्निकट- विज्ञान कला ही बुद्धि है, कृष्ण इसे व्यावसायात्मिका बुद्धि कहते हैं। अव्यय के विद्या और अविद्या भावों की प्रतिष्ठा इसी बुद्धि में रहती है। यदि बुद्धि विद्या भावों से सम्पन्न हो जाती है तो अविद्या रूप पाप्मा का आवरण स्वत: निवृत्त हो जाता है। वैराग्य बुद्धि से राग-द्वेषात्मक आवरण, ज्ञान बुद्धि से संमोहात्मक आवरण, ऐश्वर्य बुद्धि से अस्मिता आवरण और धर्मबुद्धि से अभिनिवेश आवरण हट जाते हैं तथा आत्म-साक्षात्कार हो जाता है। जीव पर हृदयस्थ भगवान का यही अनुग्रह है।
यह भी सही है कि हृदयस्थ ईश्वर का हमारी अध्यात्म संस्था के साथ साक्षात् संबंध नहीं होता अपितु परम्परा अर्थात् सूर्य के माध्यम से होता है। श्रुति कहती है- निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च अर्थात् सूर्य अमृत व मर्त्य दोनों भावों से युक्त है। सूर्य पृथ्वीलोकस्थित मनुष्य में बुद्धिरूप से प्रवेश करता है। यह बुद्धि ही विज्ञानात्मा है। सूर्य के अमृत भाग से जहां बुद्धि में वैराग्य आदि चार विद्या भाग प्रकट होते हैं, वहीं मर्त्य भाग से राग-द्वेष आदि अविद्या भाग विकसित हो जाते हैं।
वैराग्य भाव का अर्थ है लौकिक समुन्नति के प्रति अपनी बुद्धि को सर्वथा उपेक्षा भाव से युक्त कर देना। पुत्र, कलत्र, बंधु-बांधव, अनुचर, पशु-सम्पदा, राज्यवैभवादि विशिष्ट संसाधन हैं, जिनकी चाहना प्रत्येक व्यक्ति को रहती है। जो व्यक्ति इन लौकिक वैभवों को तृणवत् गिनता है तथा आत्म-भाव में स्थित हो जाता है, वही प्रज्ञा भाव में प्रतिष्ठित हो जाता है- आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
ज्ञान बुद्धि दो प्रकार की होती है- 1. प्रत्यक्ष ज्ञान और 2. स्मृतिजन्य ज्ञान। प्रत्यक्ष ज्ञान जब किसी व्यक्ति को होता है तभी वह उसका द्रष्टा बनता है। प्रत्यक्ष द्रष्टा का वचन आप्त प्रमाण माना जाता है क्योंकि उसने किसी विषय का ज्ञान स्वयं प्राप्त किया है। पुन: प्रत्यक्ष ज्ञान अतीन्द्रिय और इन्द्रिय-सापेक्ष दो प्रकार का होता है। ये दोनों ही ज्ञान आप्त हैं, किंतु भगवत्ता अतीन्द्रिय ज्ञान से जुड़ी है। चक्षु आदि इन्द्रियों से जो ज्ञान प्रत्यक्ष होता है वह भौतिक विश्व से सम्बद्ध है। जबकि अतीन्द्रिय ज्ञान ही 'भग' का वास्तविक स्वरूप है जिससे परोक्ष एवं अलौकिक सिद्धियां होती हैं। अर्थात् जो ज्ञान आत्मा- परमात्मा, भूत-भविष्य-वर्तमान से संबद्ध है तथा जिसका ज्ञान चक्षु आदि इन्द्रियों से नहीं अपितु विशिष्ट तप दृष्टि से संभव है। यही ज्ञान भग श्रेणी में आता है।
अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्व इन आठ सिद्धियों की समष्टि ही ऐश्वर्य भग है। यदि किसी मनुष्य में ये शक्तियां जन्मकाल से ही विद्यमान रहती हैं तो उसे ईश्वर कहा जाता है। अथवा यदि किसी ने योगक्रियाविशेष से ये सिद्धियां प्राप्त की हैं तो उसे योगी कहा जाता है। यक्ष-राक्षस-पिशाच-गन्धर्व-पितर-ऐन्द्र-प्राजापत्य-ब्राह्म इन आठों योनियों में जन्मकाल से ही ये सिद्धियां विद्यमान रहती हैं। वस्तुतः इन आठों का संबंध ईश्वर संस्था से है। रसब्रह्म है तथा बल माया है। बल तत्त्व आत्मा व वित्त भेद से दो प्रकार का है। आत्मबल स्वतंत्र और वित्तबल आश्रित धर्म है। आत्मबल ऐश्वर्य है तो वित्त बल श्री है। ईश्वर सभी आए हुए जड़-चेतन भूतों में विद्यमान है - यही ज्ञान अणिमा है। इसी अणिमाभाव में आया हुआ ईश्वर का महाविश्व रूप में परिणत होना ही भूमाभाव है। उसी ईश्वर ने संसारस्थ समस्त जीवों को अपनी सीमा में धारण किया है, अत: यही उसका प्राप्तिभाव है। सभी के बाहर-भीतर स्वतंत्र रूप से यथेच्छ विहार भाव के कारण उसका प्राकाम्य भाव स्पष्ट है। वही अन्तर्यामी सबका शास्ता है, यही उसका ईशित्व है। सभी उसी सूत्रात्मा से बंधे हैं अत: क्रिया से सबको अपना वशवर्ती बनाए रखना ही उसका वशित्व है।
प्राकृतिक नित्य नियमों की समष्टि ही धर्म है। जिस व्यक्ति की जन्मकाल से ही धर्म की ओर स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है, वह अपने समस्त जीवन की क्रियाओं को धर्मानुसार ही करता है। ऐसी स्वाभाविक प्रवृत्ति ही भग कहलाती है। जब तक धर्म रक्षा है, तभी तक धर्मी की स्वरूप रक्षा है। परित्यक्त धर्म, धर्मी का विनाश कर देता है।
चन्द्रमा के तीन मनोता हैं - रेत, श्रद्धा व यश। चान्द्र प्राण होने से यश सौम्य प्राण है। जिस प्राणी के अध्यात्म में चान्द्रयश प्रतिष्ठित रहता है, वही लोक में यशस्वी होता है, जिसमें यश प्राण नहीं होता, वह यश प्राप्ति साधक कर्मों को करता हुआ भी अपयश का ही भागी बनता है। श्री नामक भग पृथ्वी के साथ जुड़ा है। शरीर कान्ति ही श्री है। शरीर का उपादान पृथ्वी है।
इन छहों भगों में से धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य की विकास भूमि सूर्य है। यश एवं श्री का संबंध परमेष्ठी मण्डल से है। अध्यात्म के अनुसार श्री का संबंध स्थूल शरीर से तथा यश का संबंध मन से है। शेष चारों बुद्धि से सम्बद्ध हैं। पृथ्वी-स्थूल शरीर का, चन्द्रमा मन का तथा सूर्य बुद्धि का प्रभव (उद्भव स्थान) है। सौरी बुद्धि में अमृत व मृत्यु दोनों तत्त्वों की प्रतिष्ठा होने से धर्म, ज्ञान-वैराग्य व ऐश्वर्य चारों भग भाव सृष्टि व मुक्ति दोनों की प्राप्ति में सहायक बनते हैं, जबकि यश एवं श्री मर्त्य सृष्टि में ही जुड़े हैं। गीता में धर्म, ज्ञान-वैराग्य एवं बुद्धि का ही योग दृष्टि से निरूपण किया गया है क्योंकि ये चारों जहां सृष्टि में आवश्यक हैं, वही मुक्ति-प्राप्ति में भी इनकी महनीय भूमिका है।
क्रमश: gulabkothari@epatrika.com