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शरीर ही ब्रह्माण्ड: अकारो वासुदेवः

सृष्टि के आरंभ में सब ऋत ही था, निराकार था। ऋत अग्नि निराकार होने से सृष्टि निर्माण संभव नहीं था। जल समुद्र था- शांत। यही विष्णु का स्वरूप था - शेषशायी। नाभि में आग्नेय ब्रह्मा प्राण था। अनन्त नाभियां थीं। हर ब्रह्मा का एक ब्रह्माण्ड बनता गया।
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Updated: 7 Nov 2026, 7:20 AM IST
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फोटो: पत्रिका

सृष्टि का आरंभ होता है परमेष्ठी लोक से जो कि जल का समुद्र है। इसके अधिष्ठाता विष्णु प्राण हैं। जल से सोम और सोम ही सृष्टि का अन्न तथा अन्न से ही सृष्टि का निर्माण और पोषण होता है। अतः विष्णु को पालक कहा है। सृष्टि एक वर्णमाला के स्वरूप में गुंथी हुई है।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ (गीता 7/7)

-हे धनंजय ! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें गुंथा हुआ है। यही वर्णमाला है जिसकी शुरुआत स्वयं विष्णु से होती है।

वर्णमाला स्वरों पर आधारित होती है। स्वर बीज रूप होते हैं और व्यंजन योनि रूप। बिना स्वर के व्यंजन का उच्चारण नहीं हो सकता। स्वरों में भी प्रथम स्वर 'अ' कार होता है। इसी के लिए कहा है-अकारो वासुदेवः। अकार से आगे स्वर और व्यंजनों का निर्माण होता है। अकेले अव अकेले अकार को 288 तरीकों से उच्चारित किया जा सकता है। विष्णु प्राण आग्नेय (पुरुष) है, भीतर सोम रूप सृष्टि बीज है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी अकार बीज से 84 लाख स्वरूप ग्रहण करती है।

सृष्टि के आरंभ में सब ऋत ही था, निराकार था। ऋत अग्नि निराकार होने से सृष्टि निर्माण संभव नहीं था। जल समुद्र था- शांत। यही विष्णु का स्वरूप था शेषशायी। नाभि में आग्नेय ब्रह्मा प्राण था। अनन्त नाभियां थीं। हर ब्रह्मा का एक ब्रह्माण्ड बनता गया। ब्रह्मा ही प्रथम सत्य रूप सृष्टि (अव्यय) बने, स्वयंभू कहलाए। विष्णु की वर्णमाला का पहला मणिया बने। स्वयंभू ब्रह्मा या के के स्वेदन से जल उत्पन्न हुआ और परमेष्ठी का सोम समुद्र आपः (जल) बन गया। सोम का रूपान्तर अग्नि-सोम रूप अंगिरा और भृगु में हो गया। 'भृगु ने मारी लात' की कथा यहीं लागू हुई। विष्णु को यज्ञ पुरुष के रूप में स्वीकार किया गया। प्रसंग है कि ऋषियों में बहस हुई त्रिदेवों में कौन सबसे महान है। भृगु को परीक्षा के लिए चुना गया। ब्रह्मा और शिव इस परीक्षा में भृगु पर क्रोधित हुए। अन्त में वैकुण्ठ धाम में विश्राम कर रहे विष्णु के पास जाने पर उनका ध्यान ऋषि पर नहीं गया। अनादर मानकर और परीक्षा पूरी करने के लिए भृगु ने भगवान की छाती पर लात मार दी। क्रोध करने के बजाए विष्णु प्रेम से उठे ऋषि के पैर पकड़े और पूछा कोमल चरणों में चोट तो नहीं लगी क्योंकि मेरा वक्षस्थल बहुत कठोर है। असीम धैर्य और भगवान की यह विनम्रता देखकर भृगु का अहंकार टूटा उन्होंने विष्णु को ही तीनों देवों में श्रेष्ठ और सात्विक घोषित किया। ब्रह्मा और शिव को रजस एवं तमस प्रधान माना।

विष्णु ने भृगु और अंगिरा दो धाराओं से सृष्टि का आरंभ किया। इनको ही विष्णु की दो पत्नियां लक्ष्मी और सरस्वती कहा गया। विष्णु स्वयं सूर्य रूप में सृष्टि के आत्मा बने। सूर्य के ऊपर परमेष्ठी लोक तथा नीचे पृथ्वी लोक बना। पृथ्वी अर्थ-सृष्टि है, लक्ष्मी है, सुप्त चेतना है। लक्ष्मी की उत्पत्ति सूक्ष्म भाव से, सरस्वती से होती है, जो शब्द-सृष्टि की अधिष्ठात्री है। चैतन्य है, प्राण रूप है। परा प्रकृति है विष्णु की। लक्ष्मी अष्टधा अपरा प्रकृति (गीता 7/4) है। -
हमारे तीन शरीर होते हैं-कारण, सूक्ष्म और स्थूल। कारण शरीर अव्यय पुरुष रूप, अकर्ता किन्तु प्रारब्ध को धारण करने वाला है। इसी में ब्रह्मांश रहता है। सूक्ष्म शरीर प्राण रूप हृदय संस्था होती है। इसमें ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रूप तीन प्राण अन्तःप्राण होते हैं। बाहर अग्नि-सोम पृष्ठप्राण रहते हैं। सृष्टि की शुरुआत सूर्य और परमेष्ठी के मध्य के आकाश-महःलोक में होती है। 'मम योनिर्महद् ब्रह्म…' (गीता 14/3) वही सृष्टि (स्थूल) के अकार का रूप है। अग्नि में सोम की आहुति को यज्ञ कहते हैं। सोम ही अग्नि का अन्न है, अग्नि अन्नाद है।

सृष्टि का स्वरूप अन्न की शुद्धता पर निर्भर करता है। साथ ही अग्नि की उत्कृष्टता पर भी निर्भर करता है। महद् लोक की सृष्टि सूक्ष्म से स्थूल की ओर जाती है। अग्नि तो वायु है तथा सोम आकाश है। आकाश स्थिति रूप तथा वायु गतिमान तत्व है। आकाश का गुण (तन्मात्रा) नाद है। वायु का गुण (तन्मात्रा) स्पर्श है। सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया गति-स्थिति के सिद्धान्त पर टिकी है। सोम चलकर आता है, अग्नि में आहुत होने-
अग्निर्जागार तमयं सोम आह। तवाहमस्मि सख्ये न्योका ॥ (ऋ. 5.44.15)
हमारे जीवन में भी तो यही होता है- यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे। सौम्या स्त्री ही पुरुषाग्नि में आहुत होती है। स्त्री यहां अग्नि का अन्न है। स्वयं अपने अस्तित्व को भस्म करके अग्नि रूप हो जाती है, जो कि स्त्री के भीतर का ही स्वरूप है। अर्द्धनारीश्वर में पुरुष भीतर स्त्री है तथा स्त्री भीतर पुरुष है। सोम ही आहुत होकर पुरुष की वर्णमाला तैयार करता है। हर पुरुष की स्त्री के आधार पर अपनी अपनी वर्णमाला गूंथी जाती है। यही स्वरूप अन्य प्राणियों की वर्णमाला का भी समझ लेना चाहिए।

आकाश (नाद) पहला महाभूत है। सरस्वती का ही क्षेत्र है। इसी से पांचवा महाभूत बनता है पृथ्वी। अर्थ सृष्टि ही लक्ष्मी है। विष्णु पाद कहलाती है। आकाश ही वायु-अग्नि-जल बनता हुआ आठवें स्तर पर नए रूप में आता है। जल भी आठवें स्तर पर पृथ्वी बन जाता है। हमारा शरीर पंचमहाभूत निर्मित पृथ्वी ही है। हम भी जल से आठ स्तरों पर बदलते हुए देह प्राप्त करते हैं। ये सब क्रमशः हमारे अन्न बनते हैं।

हृदय के तीन प्राण ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र ही अग्नि-सोम की सहायता से स्थूल सृष्टि का निर्माण करते हैं। इन्द्र प्राण भुक्त तत्वों को बाहर फेंकता है जिससे ब्रह्मा का कुछ भाग रिक्त हो जाता है। इसे पूर्ण करने के लिए ब्रह्मा को भूख (अशनाया) लगती है। तब विष्णु बाहर से अन्न लाकर ब्रह्मा के स्वरूप को व्यवस्थित रखते हैं। अन्न उपलब्ध कराने के कारण ही विष्णु पालक भी हैं तथा सृष्टि का स्वरूप भी विष्णु द्वारा लाया अन्न (सोम) ही तय करता है। यही विष्णु के सूक्ष्म स्तर की वर्णमाला है। हर प्राणी के हृदय स्थित विष्णु प्राण ही प्राणी की अ से ह तक की वर्णमाला तैयार करते हैं। यही वर्णमाला शरीर के सातों चक्रों में परिलक्षित होती है, जो योगियों का विषय है।

मेरी वर्णमाला मेरी पत्नी तैयार करेगी। वह किस रूप में, किस भाव को लेकर, किस उद्देश्य को लेकर आहुत होती है, वैसा ही घड़े का स्वरूप होगा। अन्न पूर्ण रूप से उसी के हाथ में है। पृथ्वी-लक्ष्मी-अन्न है। चंद्रमा पर आश्रित है। चन्द्रमा औषधियों (अन्न) का स्वामी है। अन्न से मन का निर्माण होता है। अतः मन का स्वामी भी चन्द्रमा ही है। स्त्री स्वयं अन्न है। शरीर का अन्न, बुद्धि का अन्न, मन का अन्न तथा आत्मा का अन्न (सभी विष्णु प्राण पर आश्रित) मिलकर मेरा स्वरूप निर्माण करते हैं। ये स्वरूप ही मेरे जीवन की वर्णमाला है जिसको स्वयं विष्णु अन्न रूप में गूंथते हैं। जैसा अन्न, वैसे विचार। अन्न में भी देव असुर दोनों प्राण रहते हैं। सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण तथा व्यवहार अन्न द्वारा संचालित होता है। अन्न भी त्रिगुणी, भोक्ता भी त्रिगुणी।

ध्यान देने की बात यह है कि आज सम्पूर्ण विश्व लक्ष्मी (अर्थ शक्ति) के पीछे भाग रहा है, जो कि सरस्वती की सन्तान है। दोनों साथ रहते हैं। अन्न से जो मन बनता है उसमें भी शब्द-अर्थ साथ रहते हैं। भोक्ता को तय करना होता है कि वह अपनी वैश्वानर (जठराग्नि) में शब्द और अर्थ में से किसको प्राथमिकता दे। मन ही निर्णायक बन बैठता है। आज जितने भी बौद्धिक व्यवसाय विश्व में प्रचलित हैं, उन पर दृष्टिपात करिए। कार्यपालिका, न्यायपालिका, पत्रकारिता, डॉक्टर, वकील आदि सभी गर्व के साथ सरस्वती को बेचकर लक्ष्मी बटोर रहे हैं। गंगा उल्टी बह रही है। चेतना सुप्त लक्ष्मी (जड़) के पीछे दौड़ रही है। विश्व रसातल की ओर ही तो जाएगा ना!

-क्रमशः
gulabkothari@epatrika.com