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शरीर ही ब्रह्माण्ड : मां है भगवती

मोह-पाश से छूटना ही वैराग्य है। गर्भस्थ शिशु का दस माह तक पोषण कर उसे भूमिष्ठ कर देना ही वैराग्य है। देना ही भगवत्ता है। इस दान-भाव में अनपेक्षा आवश्यक है। शिशु को परिवार, समाज व राष्ट्र को सौंप देना ही मां का वैराग्य भाव है।
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Aug 08, 2026
Sharir hi Brahmand
फोटो: पत्रिका

स्त्री दिव्यता की मूर्ति है। माया है, शक्ति है। ब्रह्म को आवृत कर स्वगर्भ में धारण करती है। स्त्री की दिव्यता का आधार उसका भगवती स्वरूप है। धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश और श्री इन छह भावों से युक्तता ही भगवान कहे जाने हेतु आवश्यक है। ये भगवद्गुण प्रकट होने के लिए देह रूप में अवतरण आवश्यक है। सृष्टि में सृजन का द्वार स्त्री के पास है। ब्रह्म बीज को स्वगर्भ में स्थापित करने के लिए स्त्री इस द्वार को मात्र ब्रह्म के आगमन के लिए ही उद्घाटित करती है, अत: इस द्वार को ब्रह्मद्वार कहना समीचीन है। भगवद्गुणोपेत ब्रह्मांश को पुरुष की सम्पूर्ण देह से सारभूत रूप में एकत्रित करके वह गर्भ में लाती है। गर्भ में आने का मार्ग भग है। उत्पत्ति का हेतु होने से शास्त्रों में उसे योनि कहा जाता है। हे योनि! आप विश्वरूपा, प्रकृति, विश्व को धारण करने वाली, काम-क्रिया का आधार और कामरूप हो। अत: हे विश्वयोनि आपको नमस्कार है।


योनिरित्येव विख्याता जगदुत्पत्तिहेतुका:।
योनि त्वं विश्वरूपाऽसि प्रकृतिर्विश्वधारिणी।
कामस्था कामरूपा च विश्वयोन्यै: नमो नम:॥


षड्भगों से युक्त भगवत्ता को मूर्त स्वरूप में लाने का अद्भुत कर्म अर्थात् सृजनधर्मिता ही प्रत्येक स्त्री को भगवती संज्ञा से विभूषित करने का प्रमुख आधार है। योनि: शक्ति स्मृता देवी भगं ब्रह्मस्वरूपकम अर्थात्—योनि शक्ति है और भग ब्रह्म स्वरूप है। ब्रह्मद्वार पर सभी छह भगों का सम्मिलित रूप है। पुरुष बीजप्रदाता है- अहं बीजप्रद: पिता। उस बीज के अंकुरण, पोषण व वर्धन का दायित्व स्त्री का होता है। स्त्री अपने संकल्प और प्रेम के साथ इस सृजन कर्म में जुड़ती है, जहां सभी छह भगों का क्रियान्वित भाव पूर्ण रूप में घटित होता हुआ देखा जा सकता है।


निश्चित समय और निश्चित नियम के अनुसार गर्भाधारण ही धर्म है। शास्त्रों में गर्भाधान संस्कार का विधान आवश्यक माना गया है। धर्मसम्मत गर्भाधान से श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति ही सृजन का मूल धर्म है। स्त्री-भग ऋतु और गर्भाधान का केन्द्र है। पितृऋण से मुक्ति संतान परंपरा से ही होती है। धर्मसम्मत संतान-प्राप्ति ही दाम्पत्य भाव का मूल फल है। मातृ देवो भव रूप में मां को प्रथम गुरु कहा गया है। वह गर्भ में रहने और भूमिष्ठ होने दोनों ही अवस्थाओं में शिशु में धर्म रूप प्रथम भग का बीजारोपण करती है। धर्म से अभिप्राय है- आंतरिक अनुशासन और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता।


विवेक और बोध ही ज्ञान है। स्त्री में चेतना के जागरण के साथ ही पुरुष-बीज के चयन का ज्ञान होता है। इसी से आकृष्ट होकर स्त्री पति के साथ एकाकार होती है तथा पुरुष-बीज को ग्रहण करती है। पुरुष अर्थात् पिता तर्क प्रदान करता है किंतु जीवन व्यवहार और भावनात्मक बुद्धि हेतु अन्तर्मन और विवेक माता देती है। गर्भकाल में माता जो पढ़ती है, सुनती है, देखती है, उसका प्रभाव शिशु पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। यही गर्भज्ञान शिशु के मस्तिष्क के ज्ञान केंद्रों को सक्रिय करता है। यही ज्ञान गर्भ से बाहर आने पर जिज्ञासा और ग्रहणशीलता से प्रवृद्ध होता है। यही कारण है कि गर्भावस्था में स्त्री को धर्म और अध्यात्म में स्थित होने के लिए कहा जाता है। धर्मग्रंथ आदि के पाठ की सलाह भी दी जाती है।


मोह-पाश से छूटना ही वैराग्य है। गर्भस्थ शिशु का दस माह तक पोषण कर उसे भूमिष्ठ कर देना ही वैराग्य है। देना ही भगवत्ता है। इस दान-भाव में अनपेक्षा आवश्यक है। शिशु को परिवार, समाज व राष्ट्र को सौंप देना ही मां का वैराग्य भाव है। मां संतान को सम्पत्ति नहीं स्वतंत्र आत्मा के रूप में देखती है। संतान से किसी भी प्रकार की प्राप्ति की अपेक्षा नहीं होना ही वैराग्य की पराकाष्ठा है। यह वैराग्य भाव वह अपनी संतान को भी सिखाती है। "मैं शरीर नहीं, आत्मा हूं" जैसे आत्म-तत्व के ज्ञान का बीजारोपण मां गर्भ में ही कर देती है। मदालसा का उदाहरण इस तथ्य की पुष्टि करता है, जहां वह अपनी संतानों को शिक्षित करते हुए कहती है तुम शुद्ध हो, बुद्ध हो, आत्मा हो। स्त्री देह में संतति रूप में ब्रह्म का प्रवेश द्वार मूलाधार-चक्र में स्थित है। कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने पर भग ही ब्रह्मज्ञान के द्वार खोलती है। श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है कि वैरागी उस ऊर्जा को प्राणायाम आदि के द्वारा ऊर्ध्वगामी करके मोक्ष की ओर ले जाता है।


भौतिक सम्पदा नहीं अपितु स्त्री की सृजन क्षमता ही ऐश्वर्य है। शून्य से पूर्ण भाव तक लाना ही उसकी दक्षता है। स्त्री स्वयं लक्ष्मी है किन्तु उसके साथ ही वह सरस्वती भी है। वह संतति रचना की अधिष्ठात्री है। पुरुष से ब्रह्मांश को खींचकर स्वगर्भ में प्रतिष्ठित करने की अपूर्वता ही उसका ऐश्वर्य है, जिसकी परिणति संतान रूप में होती है। अपनी संतान में भी सृजनधर्मिता रूप आत्मविश्वास का संचार मां पूर्णकौशल से करती है।

संतान स्त्री को मातृ-रूप में प्रतिष्ठित कर देती है—यही मातृत्व स्त्री के यश को बढ़ाता है। ब्रह्म ने माया की दृष्टि से सृष्टि संचालन हेतु यह किया है। एकोऽहं बहुस्याम् की धारणा स्त्री की सृजन-क्षमता से जुड़ी है। संतान के यश के विस्तार का प्रथम चरण मातृ-अंक में ही सम्पन्न होता है। शैशवावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक भी मां का विश्वास अपनी संतान के किसी कर्म में संशय भाव से युक्त नहीं होता। वह उसकी हर छोटी-बड़ी सफलता में प्रसन्नभाव में उपस्थित रहती है। मां की शिक्षा यही रहती है कि यश बाहरी मान्यता नहीं, अपितु अपने कर्तव्य कर्मों के प्रति सजग रहना ही यश प्राप्ति का प्रथम द्वार है। श्री दो प्रकार की है- लक्ष्मी और सरस्वती। लक्ष्मी शरीर है, जड़ है, अपरा है जबकि सरस्वती प्राण है, चेतना है, परा है। शरीर ही मां है। शिशु के अंग-प्रत्यंगों का निर्माण मातृ-गर्भ में होता है। माता के भुक्तान्न से ही यह कलल-बुद्बुद् आदि के क्रम से पुष्ट होता हुआ शरीर रूप में गर्भ से बाहर आता है। शरीर ही सौंदर्य-श्री का प्रथम रूप है। जब ये छह गुण एक साथ कार्यरत रहते हैं, तभी श्रेष्ठ सृजन संभव होता है।


तंत्रसार और कामाख्या तंत्र में स्पष्ट लिखा है: भग एव भगवती। श्रीविद्या उपासना में भग को श्रीचक्र का केन्द्र-बिंदु माना गया है, जहां से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विस्तार होता है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व इन आठ सिद्धियों का आनन्द अणु-भाव में ही होता है। यह आनन्द भाव ब्रह्मद्वार में प्रतिष्ठित रहता है। आनन्दाद् एव सर्वाणि खिलानि जायन्ते… आनन्द भाव के बिना सृष्टि नहीं हो सकती। अव्यय पुरुष की पांच कलाओं- आनन्द-विज्ञान-मन-प्राण और वाक् में से प्रथम कला आनंद है। आनंद भाव की परिणति रूप संतान प्राप्ति ही यश का विस्तार है। विवाह के पश्चात स्त्री-पुरुष दोनों का ही सौंदर्य बढ़ता है। अतिभोग से सौंदर्य क्षीण भी हो जाता है। गृहस्थी और संसार के ज्ञान का मार्ग भी यहीं से हो रहा है। संतान प्राप्ति को भोग की सीमा माना गया है। भोग की समाप्ति ही वैराग्य है। धर्मसम्मत गृहस्थाश्रम के पच्चीस वर्षों को पूर्णता के साथ जीना ही दाम्पत्य का श्रेष्ठ काल माना है, जहां 'सहधर्मी चरताम्' का वैदिक घोष सदैव गुंजायमान रहता है। यही स्त्री व पुरुष के भगवती व भगवान स्वरूप में प्रतिष्ठित होने का स्वर्णिम आधार बनता है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com