प्रधानमंत्री के इस संबोधन में एक सतर्कता है कि कोई भी महाशक्ति भारत के हित को पूरा नहीं करेगी, बल्कि इनके बीच की रंजिशें दुनिया को पीछे ही ले जाएंगी।
- प्रताप भानु मेहता, राजनीतिशास्त्री
शांगरी-ला डायलॉग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बहुप्रशंसित संबोधन दो कारणों से उल्लेखनीय है। पहला, यह भाषण भारत की विदेश नीति की निरंतरता को रेखांकित करता है। इसका केंद्रीय भाव 2004 और 2005 में मनमोहन सिंह के भाषणों की याद दिलाता है। वैश्विक तंत्र में भारत की अवस्थिति उसे एक बार फिर से विदेश नीति के मामले में निर्गुट पक्ष के करीब ले जा रही है जबकि कुछ लोगों द्वारा इस अवधारणा को ठिकाने लगाने की कवायद में हमें बार-बार यह यकीन दिलाने की कोशिश की गई है कि एशिया में भारत दरअसल अमरीका का प्रतिनिधि राष्ट्र है। दूसरी बात, विदेश की धरती पर भारत एक मुक्त, सशक्त, समावेशी और गहन रूप से संस्थागत लोकतंत्र वाली अपनी जो छवि सामने रखना चाहता है, घरेलू हालात उसके विपरीत हैं।
मोदी ने भारत को एक ऐसी प्राचीन सभ्यता बताया, जिसके गहरे सभ्यतागत संपर्क वृहद राजनीतिक व आर्थिक बदलावों के बीच उभरते हुए पूरब की ताकत का संधान करते हैं। इस भाषण की विडंबना यह रही कि एक ओर इसने दुनिया के साथ भारत की सघनतम बहुमुखी संलग्नता का जिक्र किया तो दूसरी ओर महाशक्तियों के बीच इसमें भारत के एकाकीपन का भी अक्स दिखलाई पड़ा, जहां उसे संलग्नता तो सबके साथ बनाए रखनी है लेकिन भरोसा किसी पर नहीं करना है। हमारी निर्गुट नीति का मूल तत्व भी यही तो था। भाषण ने बिना नाम लिए चीन और अमरीका दोनों को बराबर खतरे के रूप में चिह्नित किया।
भारत की विदेश नीति में एक समझदारी पारंपरिक रूप से कायम रही है जिसे ट्रम्प प्रशासन ने खुद पुष्ट कर डाला है। पहला, कि परिस्थितियों के हिसाब से अमरीका अपने सहयोगियों के साथ विश्वासघात कर सकता है और व्यापार व आव्रजन पर उसकी नीतियों को भारत आंख मूंद कर सही नहीं मान सकता। यह संयोग नहीं है कि बीते एकाध साल के दौरान भारत ने रूस जैसे देशों के साथ अपने पुराने रिश्ते को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है।
भाषण में चीन के प्रति भारत की विदेश नीति की जटिलता का भी स्वीकरण है। माना गया कि चीन के साथ हमारे रिश्ते बहुस्तरीय हैं। इन्हें कलात्मक तरीके से बरतना होगा, किसी टकराव से बचना होगा। शीत युद्ध के ध्रुवीकरण वाले माहौल से बचते हुए समझदारी दिखानी होगी। अतीत में दो महाशक्तियों से निपटने की जटिलता के चलते ही भारत ने हमेशा अंतरिम ताकतों और वैश्विक गठबंधनों के लिए सहयोग की मांग उठाई है। पुराना जी-77 कोई वैचारिक निर्मिति नहीं था, बल्कि दो महाशक्तियों के बरक्स एक वैकल्पिक ताकत का स्रोत रहा। उस वक्त विकास के नजरिए से यह सर्वथा उपयुक्त था। इस रणनीति की हालांकि सीमाएं भी हैं, चूंकि महाशक्तियों का सामना करने में इसकी प्रभावकारिता पर हमेशा से संदेह रहा है। भारत अब इसका एक कामकाजी विकल्प खोज रहा है।
यह संबोधन इक्कीसवीं सदी के नेहरू की शक्ल गढ़ रहा है। इसमें एक सतर्कता है कि कोई भी महाशक्ति भारत के हित को पूरा नहीं करेगी, बल्कि इनके बीच की रंजिशें दुनिया को पीछे ही ले जाएंगी। भाषण में ध्रुवीकृत टकराव से बचने के लिए निवेश, चीन की ताकत का स्वीकरण, रूस की अहमियत को दोबारा स्वीकारने तथा मध्यम और छोटे देशों के एक ऐसे गठजोड़ निर्माण का जिक्र था जो वैश्विक तंत्र में संतुलनकारी भूमिका अदा करेगा। साथ ही इन रणनीतियों की सीमाओं को भी माना गया।
संबोधन में सबसे अहम मोड़ तब आया, जब उन्होंने सिंगापुर का अभिवादन किया - सिंगापुर इस बात का उदाहरण है कि जब देश सिद्धांतों पर चलते हैं न कि किसी दूसरी ताकत के पीछे, तब वे दुनिया के सम्मान का पात्र बन जाते हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी सुनी जाती है। और जब वे घरेलू स्तर पर बहुलता को गले लगाते हैं तब बाहर एक समावेशी विश्व की कामना भी कर रहे होते हैं। ‘सिद्धांतों के पक्ष में खड़े रहना, किसी महाशक्ति के पीछे नहीं’ - एक कठिन आदर्श है। इसमें आदर्शवाद और वास्तविकता का सम्मिश्रण है। इसमें एक अवसरवादी पाखंड भी छुपा हुआ है। बावजूद इसके यह वाक्य अगर निर्गुट के अंतर्निहित तर्क के प्रति श्रद्धा अर्पण नहीं है, तो आखिर क्या है?
विदेश नीति की एक कवायद के तौर पर इस भाषण की सूक्ष्मता और निरंतरता आश्वस्तकारी है। उन्होंने मर्मस्पर्शी ढंग से देश के आंतरिक बोध को विदेश नीति के साथ जोड़ा। सिंगापुर पर उनके बयान का निहितार्थ यह था कि देश के भीतर असहिष्णुता और बहुलता का भय एक अलगाववादी वैश्विक तंत्र के निर्माण के साथ करीब से जुड़ा है। ऐसा कह कर मोदी ने विदेश नीति के मामले में अपने भीतर का नेहरू खोज निकाला है। अब उन्हें अपना कहा याद भी रखना होगा- कि दुनिया में मुक्त और समावेशी माहौल बनाने के लिए शुरुआत अपने घर से करनी चाहिए।