बिरेन्द्र पाण्डेय, भाषाविद एवं स्तंभकार
हिंदी दिवस सिर्फ़ एक भाषाई पर्व नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और भावनात्मक एकात्मता का उत्सव है। इस वर्ष इसका महत्त्व और बढ़ गया है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2025 को ‘अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष’ घोषित किया है। यह एक अर्थगर्भित संयोग है कि ‘सहकार से समृद्धि’ का राष्ट्रीय दृष्टिकोण और हिंदी दिवस का उत्सव, दोनों हमें यह स्मरण कराते हैं कि विकास की स्थिरता व समावेश तभी संभव है जब वह जनभाषा में व्यक्त हो और सामूहिक सहयोग से आगे बढ़े।
सहकारिता-भारतीय जीवन का आधार: भारतीय दर्शन की आत्मा सह-अस्तित्व और एकात्मता में है। ऋग्वेद का मंत्र ‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्’ सहकारिता के इसी भाव को रेखांकित करता है। हमारे गांवों की परंपरा सदियों से सहकारी ढांचे पर आधारित रही है- पंचायतें, सामूहिक कृषि, जल-संरक्षण व हस्तशिल्प उत्पादन सब इसी की मिसाल हैं।
महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का स्वप्न रखा था- एक ऐसा भारत, जहां हर गांव आत्मनिर्भर व संगठित इकाई बने। गांधीजी, विनोबा भावे और मजदूर संघटक दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे नेताओं ने इस विचार को जन-जन तक पहुंचाने के लिए हिंदी को माध्यम बनाया। स्वाधीनता संग्राम में सहकारिता और हिंदी ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।
हिंदी-सहकारिता की जनभाषा: भारत के अधिकांश सहकारी संस्थान हिंदी भाषी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। जब समितियों और बैंकों में संवाद हिंदी में होता है तो पारदर्शिता और सहभागिता दोनों बढ़ती हैं। 1965 के राजभाषा अधिनियम और उसके बाद की नीतियों ने सहकारी संस्थानों में हिंदी प्रयोग को मजबूती दी। आज नाबार्ड, इफको, नाफेड जैसे संस्थान वेबसाइट से लेकर मोबाइल ऐप तक हिंदी में सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं।
ग्राम विकास से राष्ट्र निर्माण: सहकारिता का सफर ग्राम से राष्ट्र तक फैला है- कृषि में बीज और उर्वरक वितरण, दुग्ध उत्पादन में अमूल मॉडल, और वन उत्पाद सहकारी समितियां इसकी जीवंत मिसाल हैं। इन क्षेत्रों में हिंदी ने संवाद को सरल और योजनाओं को प्रभावी बनाया है।
डिजिटल सहकारिता और हिंदी : 21वीं सदी में सहकारिता तकनीक से जुड़ रही है। ई-गवर्नेंस पोर्टल, ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार), इफको किसान ऐप और नाबार्ड ई-लर्निंग पोर्टल- सब हिंदी में उपलब्ध हैं। एआइ आधारित चैटबॉट किसानों को मौसम, ऋण व बीमा की जानकारी हिंदी में दे रहे हैं।
लोकतांत्रिक भागीदारी का माध्यम : सहकारी संस्थाएं ‘एक सदस्य, एक मत’ के सिद्धांत पर चलती हैं। यह लोकतंत्र का सबसे जमीनी रूप है। जब यह प्रक्रिया हिंदी में होती है तो किसान, महिला श्रमिक तक सक्रिय निर्णयकर्ता बन जाते हैं।
वैश्विक महत्त्व: वसुधैव कुटुंबकम का आदर्श सहकारिता की आत्मा है। जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों से निपटने में सहयोग और साझेदारी का भारतीय मॉडल मार्गदर्शक बन सकता है। हिंदी इसे विश्व पटल पर संप्रेषित करने की क्षमता रखती है। हिंदी दिवस और अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष का यह संगम हमें यह बोध कराता है कि भारत की जड़ें सहकारिता में हैं और उसकी आत्मा हिंदी में। जब सहयोग से समृद्धि का मंत्र हिंदी के माध्यम से जन-जन तक पहुंचेगा, तभी विकास वास्तव में सबका और सबके लिए सार्थक होगा।