
-डॉ. मिलिंद कुमार शर्मा, प्रोफेसर एमबीएम विवि, जोधपुर
कुछ सप्ताह पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और उनके चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के मध्य दक्षिण कोरिया के बुसान में हुई भेंट को इन दो राष्ट्रों के जी-2 गठबंधन के रूप में देखा जा रहा है। इक्कीसवीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमरीका और चीन दो ऐसी महाशक्तियां हैं जिनका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, विज्ञान, तकनीक और कूटनीति पर स्पष्ट एवं प्रभावी रूप से देखा जा सकता है। हाल के वर्षों में जी-2 गठबंधन की अवधारणा चर्चा में रही है, जिसमें यह कल्पना की जाती है कि अमरीका और चीन मिलकर वैश्विक प्रकरणों की दिशा एवं भविष्य निर्धारित करेंगे। इसके औपचारिक गठबंधन न होने के उपरांत भी इन दोनों राष्ट्रों के मध्य सहयोग व प्रतिस्पर्धा का संतुलन विश्व व्यवस्था को अत्यंत गहराई से प्रभावित करता है।
ऐसे में निसंदेह भारत जैसे उभरती वैश्विक आर्थिक शक्ति के लिए यह अत्यंत चुनौतीपूर्ण है कि अमरीका-चीन के संभावित जी-2 गठबंधन समीकरण के मध्य वह अपनी रणनीति किस प्रकार निर्धारित करे। सर्वप्रथम, भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को अक्षुण्य बनाए रखने के लिए अत्यंत सजग रहना होगा। भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत सर्वदा यह रहा है कि वह किसी एक शक्ति-गुट या ध्रुव पर पूर्ण निर्भर न रहे। यह रेखांकित करना उचित होगा कि अमरीका और चीन दोनों से भारत के संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण हैं- अमरीका के साथ रक्षा, विज्ञान, तकनीक और व्यापारिक सहयोग है, तो वहीं दूसरी ओर चीन सीमा विवाद के उपरांत भी भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है। जी-2 गठबंधन की स्थिति में भारत को किसी एक पक्ष का 'अनुयायी' बनने की अपेक्षा अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र निर्णय लेने होंगे। दूसरे, भारत को आर्थिक सशक्तीकरण और आत्मनिर्भरता पर विशेष बल देना होगा। यदि अमरीका और चीन मिलकर वैश्विक आर्थिक नियम निर्धारित करते हैं, तो विकासशील देशों के हितों की अनदेखी होने की प्रबल संभावना रह सकती है।
आर्थिक रूप से सुदृढ़ भारत ही वैश्विक शक्ति संतुलन में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। साथ ही भारत को बहुपक्षीय कूटनीति को और भी प्रभावी एवं सशक्त करना होगा। जी-2 गठबंधन जैसे द्विध्रुवीय ढांचे के स्थान पर भारत सदैव बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक रहा है। इसलिए भारत को संयुक्त राष्ट्र, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, जी-20 और क्वाड जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इसके अतिरिक्त भारत को सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करना होगा। अमरीका-चीन प्रतिस्पर्धा का एक बड़ा क्षेत्र हिंद-प्रशांत है, जहां भारत की भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत को अपनी नौसेना, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष क्षमताओं को सुदृढ़ करते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा में जिम्मेदार भूमिका निभानी होगी। साथ ही, सीमा विवादों के उपरांत भी चीन के साथ अनवरत संवाद बनाए रख और संघर्ष टालने के लिए प्रयास करने आवश्यक हैं। हमें वैश्विक दक्षिण 'ग्लोबल साउथ' में सफल नेतृत्वकर्ता बनकर उभरने के लिए अनवरत प्रयास करने होंगे। भारत के लिए विज्ञान, तकनीक, कौशल और नवाचार में तेजी से निवेश अत्यंत आवश्यक है।
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि अमरीका-चीन के मध्य तकनीकी प्रतिस्पर्धा यथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5जी/6जी, सेमीकंडक्टर और हरित तकनीक- भविष्य की शक्ति का निर्धारण करेगी। भारत को शिक्षा, अनुसंधान और स्टार्टअप इकोसिस्टम को सुदृढ़ कर तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने होंगे, जिससे वह किसी भी जी-2 गठबंधन व्यवस्था में पिछड़ा न रहे। जब वैश्विक राजनीति में सत्ता-केंद्रित और प्रतिस्पर्धात्मक रवैया बढ़ रहा है, भारत अपने मूल्यों के माध्यम से विश्व को वैकल्पिक नेतृत्व का मार्ग दिखा सकता है।
Published on:
03 Jan 2026 01:12 pm
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