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अवारा श्वानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का गत वर्ष नवंबर में जो आदेश था उसका उद्देश्य मानवीय भी था और जनहितकारी भी। लेकिन राजस्थान में इस आदेश के पालना की जमीनी हकीकत काफी दूर नजर आ रही है। नतीजा यह है कि सड़कों पर आवारा श्वानों के काटने का डर बना हुआ है तो अस्पतालों में श्वानों के काटने से घायल हुए लोगों की उपचार के लिए भीड़ बढ़ने लगी है। आंकड़े खुद अपनी कहानी कह रहे हैं।
राजस्थान में गत वर्ष 4.25 लाख डॉग बाइट के मामले सामने आए, यानी औसतन हर दिन 1100 लोग इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे। यह सचमुच चिंता की बात है कि जब प्रति एक लाख आबादी पर 5 से 6 हजार आवारा श्वान खुले में घूम रहे हों और शेल्टर होम केवल एक-दो शहरों तक सीमित हों, तो हादसों की श्रृंखला बनते देर नहीं लगती। हालिया घटनाएं चेतावनी भी हैं। जोधपुर में नौ साल का बच्चा कुत्तों के हमले में गंभीर रूप से घायल हो गया। बीकानेर में एक श्वान ने 15 भेड़-बकरियों को मार डाला और एक मासूम पर हमला कर दिया।
विडंबना यह है कि खर्च और योजना दोनों उपलब्ध है। एक श्वान पर शेल्टर होम में प्रतिदिन 40-50 रुपए का अनुमानित खर्च है, जबकि पकड़ने, बधियाकरण और सुरक्षित छोड़ने पर 1650 रुपए। सवाल पैसे का नहीं, इच्छाशक्ति और प्रशासनिक तत्परता का है। जब सुप्रीम कोर्ट 13 जनवरी को राज्यों से स्थिति रिपोर्ट मांग रहा है और हाईकोर्ट भी निर्देश दे चुका है, तब भी अधिकांश नगरीय निकायों का 'प्रक्रिया में है' कहना संवेदनहीनता का परिचायक ही कहा जाएगा।
यही कारण है कि राज्य मानवाधिकार आयोग ने सख्ती दिखाते हुए इस मामले में प्रसंज्ञान लेकर जोधपुर-बीकानेर कलक्टर, नगर निगम आयुक्त व स्वायत्त शासन विभाग के शासन सचिव को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अब वक्त चेतावनी से आगे बढ़ने का है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को जमीन पर उतारना ही होगा। अन्यथा यह सवाल बार-बार उठेगा क्या हमारी व्यवस्था किसी अगली खबर का इंतजार कर रही है?
-आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com
Updated on:
07 Jan 2026 12:11 pm
Published on:
07 Jan 2026 12:09 pm
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