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संपादकीय : बेटियों की किलकारी की चाहत का सुखद संकेत

नेशनल फैमिली हेल्थ के अनुसार भारत में बेटों की चाहत का ग्राफ 1999 के 33 प्रतिशत से गिरकर अब 15 प्रतिशत रह गया है। यह बहुत सुखद संकेत है।

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दुनिया के अधिकांश हिस्से ने जब बेटे-बेटी में भेद की दकियानूसी सोच सदियों तक देखी हो, उस समय यह संकेत सुखद और सुकून अनुभूति का अहसास देने वाला ही कहा जाएगा कि लोगों में सोच बदल रही है। बेटों को प्राथमिकता के केंद्र बिंदु से छिटककर अब यह उस मुकाम पर अग्रसर नजर आने लगी है जहां वे बेटी को भी उसी चाव से देखने लगे हैं। गैलप इंटरनेशनल ने हाल में एक सर्वे के जरिए यह तस्वीर प्रस्तुत की है। गैलप का 44 देशों में किया गया यह सर्वे वर्तमान के प्रति संतोष और भविष्य के लिए उम्मीदें जगाने वाला है कि इन देशों में अब बच्चे के लिंग के बारे में सोचा नहीं जाता और उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनकी संतान लड़का है या लड़की।

भारत, चीन, अमरीका और यूरोप के कई देशों के अभिभावक इसमें शामिल हैं। इस सोच और सुधार के उपायों का ही असर है कि दुनिया में 25 साल में 70 लाख बच्चियों को मरने से बचाया गया है लेकिन, इसी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि अब भी हर साल दस लाख से ज्यादा बच्चियों को कोख में ही खत्म किया जा रहा है। पिछले 45 साल में मां के गर्भ में ही मारी गईं बच्चियों की संख्या पांच करोड़ से ज्यादा है। यह दर्शाता है कि बच्चे-बच्ची के भेद के किस्से को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह बात भारत पर भी शब्दश: लागू होती है। यहां विश्व के विकसित देशों की तुलना में चुनौतियां और मुश्किलें कुछ ज्यादा ही रही हैं। कम शिक्षा, रूढि़वादी पितृत्व सोच, अंधविश्वास और भ्रांतियां यहां हमेशा व्याप्त रही हैं।

कालांतर में स्थिति कुछ बेहतर होती नजर आती है। नेशनल फैमिली हेल्थ के ताजा सर्वे में इस ओर इशारा किया गया है। इसके अनुसार भारत में बेटों की चाहत का ग्राफ 1999 के 33 प्रतिशत से गिरकर अब 15 प्रतिशत रह गया है। यह बहुत सुखद संकेत है, लेकिन समझना होगा कि 15 फीसदी भी बहुत ज्यादा है। इसका परिणाम इस रूप में परिलक्षित हो रहा है कि देश में लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 943 लड़कियों का है। चिकित्सकीय और वैज्ञानिक अध्ययन कहते हैं कि दुनिया में जन्म लेने वाले लड़के-लड़कियों का अनुपात 105:100 है, पर पांच साल की आयु पूरी करते-करते यह संख्या बराबर हो जाती है।

अगर देश में पांच साल की आयु के बाद लड़कियों की संख्या 1000 लड़कों पर 57 कम पड़ रही है, तो इसका सीधा अर्थ है कि कोई बाहरी शक्ति प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रही है। जब तक इस बाहरी शक्ति को नियंत्रित नहीं किया जाएगा, तब तक लड़के-लड़की का यह असंतुलन दूर नहीं होगा। 57 बड़ा अंतर है। सुधार की जो गति चल रही है, उस हिसाब से इस अंतर को पाटने में पच्चीस साल से ज्यादा लग जाएंगे। ये बच्चियां दुनिया में कदम रखें और अच्छी तरह से खुशगवार जिंदगी जिएं, इसके लिए उन्हें बचाने के उपाय, उनकी व्यापकता और गति सब बढ़ाने होंगे। सृष्टि के संतुलन के लिए भी यह जरूरी है।