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यक्ष प्रश्न… दीया तले अंधेरा..!!

जयपुर में तो यातायात बाधित होने के चलते अमरूदों का बाग में रैलियों और प्रदर्शनों पर स्थाई प्रतिबंध माननीय उच्च न्यायालय लगा चुका है। लेकिन अब अपनी चौखट पर चार-पांच दिन से पिस रही जनता की पीड़ा क्यों नहीं किसी को दिखाई दे रही ?

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Feb 21, 2026
फाइल फोटो- पत्रिका

जी हां, राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ के बाहर पिछले पांच दिन से चल रहे आंदोलन से आमजन को हो रही परेशानी पर उच्च न्यायालय की चुप्पी पर यही कहावत अक्षरशः चरितार्थ होती है। मामला किसी डॉक्टर की कथित लापरवाही का है, जिससे मरीज की मौत हो जाने का आरोप है।

निश्चित रूप से यह मामला गंभीर है, अगर वाकई किसी की मौत लापरवाही से हुई है तो दोषी को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन चार पांच दिन से जयपुर की निर्दोष जनता को किस अपराध की सजा दी जा रही है ? इस पर कोई जवाब देने वाला नहीं है, जिम्मदार मूकदर्शक बने बैठे हैं।

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कई बार रास्ता रोको आंदोलनों के दौरान जनता को होने वाली परेशानी को लेकर उच्च न्यायालय ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय तक के माननीय न्यायाधीश तल्ख मौखिक टिप्पणियां कर चुके हैं। जयपुर में तो यातायात बाधित होने के चलते अमरूदों का बाग में रैलियों और प्रदर्शनों पर स्थाई प्रतिबंध माननीय उच्च न्यायालय लगा चुका है। लेकिन अब अपनी चौखट पर चार-पांच दिन से पिस रही जनता की पीड़ा क्यों नहीं किसी को दिखाई दे रही ?

और एक प्रश्न अगर इस मामले में कोई कार्रवाई होनी है तो कार्रवाई करने वाले किस बात का इंतजार कर रहे हैं ? दूसरा अगर आरोप सही नहीं है, तो दबाव में कार्रवाई होने पर क्या चिकित्सक आंदोलन पर नहीं उतर आएंगे ? अगर ऐसा हुआ तो सैंकड़ों मरीजों को होने वाली परेशानी के लिए कौन जिम्मेदार होगा ? एक और कहावत है, खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर कटना खरबूजे (जनता) को ही है। रास्ता रोको आंदोलनों से अगर किसी को परेशानी होती है या कोई बिना दोष के सजा पाता है तो वह आम जनता है, बाकी न तो आंदोलन करने वालों को कोई फर्क पड़ता है, न उन लोगों पर, जिन पर आंदोलनों को जल्द से जल्द खत्म करवाने का जिम्मा है।

अनुभव बताता है कि कोई भी हड़ताल या आंदोलन क्यों न हो वह एक न एक दिन खत्म तो होता ही है। प्रश्न यह भी है कि जिम्मेदार लोग शुरू होने से पहले या शुरू होते ही वह समझौता क्यों नहीं कर लेते जो वे कई दिन तक जनता के परेशान होने से बाद करते हैं ? क्या वे इस बात का इंतजार करते हैं कि जनता परेशान हो, फिर कोई अनहोनी हो तब वे समझौता करेंगे। हाईकोर्ट के बाहर चल रहे आंदोलन को लेकर अब वकीलों के एसोसिएशन ने आंदोलन वापस लेने का फैसला कर लिया है, लेकिन कुछ वकील नहीं मान रहे, मतलब आम जनता अभी भी यातायात जाम में पिसती रहेगी, और सारे जिम्मेदार आंखे मूंदे बैठे रहेंगे। क्या यही आम जनता की नियति है ?

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