देश भर की पुलिस यौन हिंसा से निपटने का संघर्ष कर रही है। कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। कई बदलाव हुए हैं। लेकिन अब क्या हम कह सकते हैं कि इनसे देश वाकई सुरक्षित हो गया है?
- अरुण बोथरा, लेखक और अधिकारी
मान लें कि आप पुलिस महकमे के मुखिया हैं और आपके इलाके में अकसर चोरी की वारदातें सामने आ रही हों, तो उन्हें रोकने के लिए आप क्या करेंगे? जाहिर है पुलिस की संख्या बढ़ाएंगे, गश्त में सुधार लाएंगे और तकनीक का इस्तेमाल करेंगे। सवाल उठता है कि अगर आपके इलाके में बच्चों से होने वाले बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हों तब आप क्या करेंगे? अगर आपको लगता है कि इसमें भी वही तरीके कारगर होंगे, तो आप गलत हैं।
देश में बच्चों से होने वाले बलात्कार के 80-85 फीसदी मामलों में अपराधी बच्चे का जानने वाला होता है। वह पड़ोसी, पड़ोस के समुदाय का कोई व्यक्ति, कोई रिश्तेदार या फिर एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार का कोई सदस्य भी हो सकता है। ऐसा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का कहना है। आशय यह है कि पुलिस तंत्र चाहे कितना ही मजबूत हो और कानून चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो, बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा रोकने की गारंटी वह नहीं दे सकता। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि अपराध के बाद अपराधी को दंड दे दिया जाए। पीडि़त को जो जिंदगी भर का सदमा लगा है, उसमें इस सजा से कोई राहत नहीं मिलती।
पिछली बार यौन हिंसा पर कानून को 2013 में बदला गया था। वह एक समग्र और सुविचारित संशोधन था, जिसमें बलात्कार की परिभाषा को भी विस्तार दिया गया था। महिलाओं से जुड़े अपराध, खासकर पीछा करने और मानव तस्करी को दंडनीय बनाया गया। ये संशोधन 2012 के निर्भया कांड के बाद लोगों के रोष का नतीजा थे।
पांच साल बाद फिर से बलात्कार कानून और कठोर बनाने की जरूरत आन पड़ी है। पृष्ठभूमि में कठुआ, उन्नाव और अन्य घटनाएं हैं। लंबे समय से मांग की जा रही है कि बच्चों से बलात्कार के मामले में मौत की सजा दी जाए। अब एक अध्यादेश के रास्ते यह मांग कानून की शक्ल ले चुका है - अगर पीडि़त 12 साल की अवस्था से कम है तो बलात्कार के मामले में मौत की सजा सुनाई जाएगी। मतलब यह कि बलात्कार कानून कठोर बनाने के मामले में हम आखिरी बिंदु तक पहुंच चुके हैं। मौत की सजा के आगे कुछ नहीं बचता।
देश भर की पुलिस यौन हिंसा से निपटने का संघर्ष कर रही है। कई सकारात्मक कदम उठाए गए हैं। आज पुलिस बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। महिला थाने स्थापित किए गए हैं। सभी पुलिस अकादमियों में लैंगिक संवेदनशीलता का प्रशिक्षण अनिवार्य कर दिया गया है। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध से निपटने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से लेकर हर जिले के पुलिस अधीक्षक कार्यालय तक विशेष प्रकोष्ठ गठित किए गए हैं। अब क्या हम कह सकते हैं कि इन बदलावों से देश वाकई सुरक्षित हो गया है? क्या कानून कठोर बनाने के बाद यौन हिंसा के मामलों में गिरावट आएगी? दुर्भाग्यवश, अनुभव के आधार पर इन सवालों का जवाब संतोषजनक नहीं मिलता।
ओडिशा पुलिस ने बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा पर एक जागरूकता अभियान चलाया था। तब पीडि़तों की कई दर्दनाक कहानियां सामने आईं। अधिकतर मामलों में अपराधी या तो बच्चे का रिश्तेदार निकला या फिर पड़ोस का कोई शख्स। ऐसे कई मामलों में अदालत में पीडि़त को बयान केवल इसलिए बदलना पड़ जाता है क्योंकि बड़े-बूढ़ों ने मिलकर मामले का ‘शांतिपूर्ण निपटारा’ कर दिया होता है। ये बड़े-बूढ़े अकसर पुरुष ही होते हैं।
हमेशा सरकारी मशीनरी यानी पुलिस और अदालतों पर यौन हिंसा का दोष मढ़ा जाता है जबकि सामाजिक अपराधों के मामले में परिवार और समुदाय की बराबर भूमिका होती है। सरकार के ऊपर जिम्मेदारी डालकर हम अपराध के खिलाफ लड़ाई को कमजोर करते हैं। बच्चों को ‘अच्छे स्पर्श’ और ‘बुरे स्पर्श’ का फर्क बताकर सहज तरीकों से हम उसे यौन हिंसा से बचने का प्रशिक्षण दे सकते हैं। सामाजिक वर्जनाओं के चलते हमारे यहां सेक्स - और यौन हिंसा से सुरक्षा - पर बात कम होती है। बच्चों को अकेला छोड़ दिया जाता है। परिवारों को भी शिक्षित किए जाने की जरूरत है कि बच्चों को उनके आसपास के लोगों से कैसे बचाया जाए। चोर कभी-कभार आता है लेकिन एक संभावित बलात्कारी हमेशा आसपास मौजूद हो सकता है। जब अधिकतर लोग अपने इर्द-गिर्द होने वाले संभावित अपराधों से ही गाफिल हों तो मौत की सजा से आखिर हमें क्या हासिल होगा?
बलात्कार के पीडि़त से जुड़ी सामाजिक कलंक की अवधारणा ने अपराधियों को बचने का एक रास्ता मुहैया कराया है। सोशल मीडिया पर हालिया प्तरूद्गञ्जशश अभियान ने दुनिया भर की औरतों को अपने खिलाफ बरसों हुए अन्याय पर जुबान खोलने का साहस बख्शा। सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों का भी ऐसा ही प्रभाव होता है। ओडिशा में इधर बीच के कुछ यौन हिंसा के मामलों में पीडि़तों का कहना था कि हालिया अभियान ने उन्हें मुंह खोलने की ताकत दी।
कठोर कानून और पुलिसतंत्र के साथ परिवार और समाज का सहयोग भी बाल यौन हिंसा को नियंत्रित करने के लिए जरूरी है। जब बच्चों को बोलने की ताकत मिलेगी, जब परिवार का रुख सहयोगात्मक होगा और जब समुदाय जागरूक होकर पुलिस और अन्य एजेंसियों से हाथ बंटाएगा, तभी हम अपने बच्चों को महफूज रख पाएंगे।