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आईना: कहां हैं पहरेदार…

जयपुर के खोह-नागोरियान में आठ लोगों की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था की सामूहिक विफलता का दस्तावेज है, जो हर बार लाशें गिनने के बाद जागती है और फिर अगली मौत तक सो जाती है।
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Updated: 13 Jun 2026, 7:25 AM IST
Illegal Firecracker Warehouse
करधनी के वसंत विहार में पकड़ा गया अवैध पटाखों के गोदाम का फोटो: पत्रिका

जयपुर के खोह-नागोरियान में आठ लोगों की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं है। यह उस व्यवस्था की सामूहिक विफलता का दस्तावेज है, जो हर बार लाशें गिनने के बाद जागती है और फिर अगली मौत तक सो जाती है। अग्निकांड के बाद सबसे आसान काम है- फैक्टरी से जुड़े लोगों को गिरफ्तार करना और कुछ पुलिसकर्मियों को निलंबित कर देना, लेकिन इससे असली सवालों के जवाब नहीं मिलते। प्रश्न यह है कि राजधानी में आबादी के बीच बारूद का इतना बड़ा जखीरा आखिर पहुंचा कैसे? अगर फैक्टरी अवैध थी तो दो साल तक चलती कैसे रही? शिकायतें थीं तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर किसी को कुछ पता नहीं था, तो पूरा तंत्र आखिर कर क्या रहा था?

यह मान लेना कठिन है कि आबादी के बीच चल रही पटाखा फैक्टरी, बारूद से भरे गोदाम, मजदूरों की आवाजाही और माल की ढुलाई की जानकारी किसी को नहीं थी। पुलिस, नगर निगम, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन - सभी की जिम्मेदारी जमीन पर निगरानी रखने की है। अगर यह सब उनकी नजरों से बच गया, तो यह अक्षमता का चरम है। और अगर नजर में था तो मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं रह जाता।

हादसे के बाद की कार्रवाई ने ही कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस ने करीम नगर और आस-पास के इलाकों में सैकड़ों मकानों की तलाशी लेकर सौ से अधिक गोदाम चिह्नित किए। इतना ही नहीं, खोह नागोरियान क्षेत्र में दो और अवैध पटाखा निर्माण इकाइयां तथा करधनी क्षेत्र में दो अवैध पटाखा गोदाम पकड़े गए हैं। यहां से करीब 600 किलो कच्चा और तैयार पटाखा सामग्री तथा 2100 से ज्यादा कार्टन पटाखे बरामद किए गए, जिन्हें बाजार में बेचने की तैयारी थी। पुलिस को जावेद नगर और खोह नागोरियान में चल रही अवैध इकाइयों से बारूद, रासायनिक पदार्थ, तैयार पटाखे और निर्माण उपकरण भी मिले हैं। यही नहीं, अलवर जिले के खैरथल क्षेत्र में भी एक मकान से 615 किलो पटाखे बरामद हुए हैं।

यह आंकड़ा बताता है कि यह कभी सिर्फ एक फैक्टरी का मामला नहीं था। अगर तीन दिन में इतने गोदाम और फैक्टरियां मिल सकती हैं, तो वर्षों तक वे दिखाई क्यों नहीं दिए? साफ है कि यह एक संगठित नेटवर्क है। और इतने बड़े नेटवर्क सिर्फ व्यवस्था की चुप्पी से चलते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि हर बड़े हादसे के बाद एक ही पटकथा दोहराई जाती है। जांच बैठती है, कुछ निलंबन और कुछ गिरफ्तारियां होती हैं और फिर मामला फाइलों में दफन हो जाता है। इस बार भी खतरा यही है कि पूरा ध्यान फैक्टरी मालिक पर टिक जाएगा, जबकि सजा उन लोगों को भी मिलनी चाहिए जिनके क्षेत्र में यह कारोबार वर्षों तक फलता-फूलता रहा। जब तक अवैध विस्फोटक कारोबार को संगठित अपराध मानकर उसकी आर्थिक जड़ों पर प्रहार नहीं होगा, जब तक अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी और जब तक दंड का भय वास्तविक नहीं बनेगा, तब तक शहर बारूद के ढेर पर ही खड़ा रहेगा। अगर जवाबदेही तय नहीं हुई, तो अगली त्रासदी सिर्फ जगह बदलेगी।

veejay.chaudhary@in.patrika.com x/veejaypress

Updated on:
13 Jun 2026, 7:25 AM IST
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