
मौसम बदल गया है। भीषण गर्मी की जगह मानसून ने ले ली है। लेकिन राजस्थान में एक चीज अब भी नहीं बदली… प्रसूताओं की मौत के बाद सरकार के तर्क। पहले कहा गया कि भीषण गर्मी हालात बिगाड़ रही है। अब कहा जा रहा है कि मौतें एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, रक्तस्राव, लीवर, किडनी और कुपोषण जैसी जटिलताओं से हुईं। मौत के बचाव में दलीलें बदल गईं, लेकिन मौतें नहीं रुकीं। ऐसे में सवाल यह नहीं कि कारण क्या है। सवाल यह है कि इलाज कहां है और उपचार किसका होना चाहिए!
राजस्थान कभी अपने स्वास्थ्य कार्यक्रमों में देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता था। आज हमारा प्रदेश प्रसूताओं की मौतों के कारण राष्ट्रीय सुर्खियों में बना हुआ है। यह केवल कुछ अस्पतालों की विफलता नहीं, पूरे स्वास्थ्य प्रशासन की गिरती साख का नतीजा है। दुर्भाग्य यह है कि हर मौत के बाद व्यवस्था आत्ममंथन नहीं करती, स्पष्टीकरण देती है। अगर एनीमिया मौत का कारण है, तो उसका उपचार समय पर क्यों नहीं हुआ? अगर हाई ब्लड प्रेशर जानलेवा था, तो जोखिम वाली गर्भवतियों की निगरानी कहां है? अगर अत्यधिक रक्तस्राव सबसे बड़ा खतरा था, तो हर डिलीवरी सेंटर उसकी आपात तैयारी से लैस क्यों नहीं है? अगर कुपोषण वर्षों से चुनौती है, तो उस पर खर्च हुए करोड़ों रुपए का असर सबसे कमजोर महिलाओं तक क्यों नहीं पहुंचा? अस्पताल इसलिए नहीं बनाए जाते कि वे मृत्यु के बाद बीमारी का नाम लिख दें। अस्पताल इसलिए होते हैं कि बीमारी मौत तक न पहुंचे।
विडंबना देखिए। सरकार खुद स्वीकार करती है कि प्रदेश की आधे से अधिक गर्भवती एनीमिया से पीड़ित हैं। इसी खतरे से निपटने के लिए फेरिक कार्बोक्सी माल्टोज (एफसीएम) इंजेक्शन शुरू किया गया। इसे मातृ मृत्यु रोकने का प्रभावी हथियार बताया गया। लेकिन पिछले पांच महीनों से यही इंजेक्शन सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध नहीं है। जो परिवार हजारों रुपए खर्च कर सकता है, वह बाजार से खरीद लेता है। जो नहीं खरीद सकता, उसके घर की प्रसूता की मृत्यु का कारण फाइल में लिख दिया जाता है-एनीमिया।
वैसे, यह विषय केवल एक इंजेक्शन का नहीं है। कहीं विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं हैं, कहीं उपकरण नहीं, कहीं ऑपरेशन थिएटर संसाधनों के अभाव में चल रहे हैं, कहीं संक्रमण नियंत्रण पर सवाल हैं। भीलवाड़ा की घटनाओं ने दिखा दिया कि समस्या किसी एक अस्पताल या एक डॉक्टर की नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सोच की है, जो व्यवस्था को सुधारने के बजाय हर हादसे के बाद किसी एक कर्मचारी को दोषी घोषित कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है।
स्वास्थ्य मंत्री को यह मंथन करना चाहिए कि स्वास्थ्य विभाग का नेतृत्व केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करने या कारण बताने का नाम नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है जोखिम को पहले से पहचानना, संसाधन उपलब्ध कराना और संकट आने से पहले व्यवस्था को तैयार रखना। यदि बार-बार वही कारण सामने आ रहे हैं, तो यह चिकित्सा विज्ञान की नहीं, प्रशासनिक विफलता की पुनरावृत्ति है। इसका उत्तर केवल मंत्री को नहीं, स्वास्थ्य सचिव से लेकर चिकित्सा शिक्षा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और पूरे प्रशासनिक तंत्र को भी देना होगा।
राजस्थान की सबसे बड़ी बीमारी यह सोच है कि मौत का कारण बता देने से जवाबदेही खत्म हो जाती है। जनता अब कारण नहीं सुनना चाहती। जनता हिसाब चाहती है- तैयारी का, संसाधनों का, फैसलों का और उन जिम्मेदार लोगों का, जिनकी लापरवाही का बोझ हर बार किसी प्रसूता की अर्थी उठाती है।
मंत्रीजी, मौसम बदल चुका है। जनता अब कारण नहीं सुनना चाहती… हिसाब चाहती है - तैयारी का, संसाधनों का, फैसलों का और उन जिम्मेदार लोगों का, जिनकी लापरवाही से बार-बार अर्थी उठ रही है। अब बयान नहीं, व्यवस्था बदलनी होगी, क्योंकि हर मातृ मृत्यु केवल एक परिवार का शोक नहीं, राजस्थान की प्रतिष्ठा पर लगा एक और दाग है। और ध्यान रहे… इतिहास कारण नहीं, परिणाम याद रखता है।
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