नियमों के साथ ही अब सरकारों से यह भी अपेक्षा दिव्यांग वर्ग कर रहा है कि धरातल पर उसकी पीड़ा समझी जाये
- प्रतिभा भटनागर, सामाजिक कार्यकर्ता
सरकार पहल कर सकती है कि अपने कर्मचारियों की शिक्षित बेरोजगार दिव्यांग संतानों को वह रोजगार ? देगी? जो शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाते उन्हें कौशल प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास आवश्यक है।
नि:शक्तजन, विशेष योग्यजन, विकलांगजन और अब दिव्यांगजन यह उस वर्ग के कई नाम है जो शारीरिक अथवा मानसिक विकलांगता से जूझते हुए अपने अथक संघर्ष और जिजीविषा के बलबूते समाज में अपना स्थान बना पाने की कोशिश में रहते हैं। इस वर्ग की समस्याओं के निराकरण एवं इनके जीवन को सुगम बनाने के लिए नवीन दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम १९ अप्रेल 2017 से पूरे देश में लागू हो चुका है। इस अधिनियम में कई कमेटियां प्रस्तावित है। इन सभी में प्राथमिकता से स्वयं दिव्यांग को एवं मानसिक दिव्यांग श्रेणी में उनके अभिभावकों को प्रतिनिधित्व दिया जाना आवश्यक है।
नियमों को बनाने में सीधे तौर पर वे सभी जो इस कानून से प्रभावित होंगे उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी हो क्योंकि शिक्षा से लेकर चिकित्सा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा एवं जीवन से जुड़े हर मुद्दे एवं उसके समाधान इनसे और उनके परिजनों से बेहतर और कौन बता सकता है? इस कानून की पालना तभी संभव होगी जब कानून के अंतर्गत इससे जुड़े विभागों एवं उसके नोडल अधिकारी की जिम्मेदारी तय कर दी जाये। जवाबदेही तय करना कितना आवश्यक है यह हर वह भुक्तभोगी जानता है जो विभाग एवं अधिकारियों के सामने धक्के खाता है एवं गिड़गिड़ाता है।
नियमों के साथ ही अब सरकारों से यह भी अपेक्षा दिव्यांग वर्ग कर रहा है कि धरातल पर उसकी पीड़ा समझी जाये। सुगम्य भारत के बाद अब जरूरी है सुगम्य रोजगार अभियान। जीवन में हर कदम पर संघर्ष के बाद भी रोजगार के क्षेत्र में इन्हें खाली हाथ देखा जा सकता है। बिना आर्थिक सशक्तिकरण के इस वर्ग की पीड़ा दूर हो सकेगी यह सोचना ही बेमानी है। क्या सरकार पहल कर सकती है कि अपने कर्मचारियों की शिक्षित बेरोजगार दिव्यांग संतानों को वह रोजगार देगी? जो दिव्यांग शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाते उन्हें कौशल प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास आवश्यक है।
हर दिव्यांग को आर्थिक रुप से इतना सशक्त बना दिया जाए कि किसी सहायता उपकरण को निशुल्क किसी शिविर में जाकर बांटने की जरूरत ही ना पड़े। वह स्वयं ही अपने बलबूते इन्हें खरीद सके। वर्तमान में दिव्यांगों के लिए विशिष्ट पहचान पत्र बनाए जा रहे हैं। सशक्त एवं समग्र रुप से बने नियम ही देश के विकलांगों का भविष्य निर्धारित करेंगे। जब इन समस्याओं का समाधान नियमों में ही निहित है तो क्यों ना दिल से एक सच्ची कोशिश की जाए कि नियमों को बनाने में विशेष योग्यजन और उनके अभिभावक स्वयं निर्णायक भूमिका निभाएं।