ओपिनियन

प्रेमचंद साहित्य के साथ कितना न्याय कर पाया हिंदी सिनेमा?

मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं भारतीय समाज के सबसे प्रामाणिक दस्तावेज हैं। शायद यही कारण है कि हिंदी सिनेमा में मुंशी प्रेमचंद की कृतियों को ही सर्वाधिक फिल्माया गया है, अन्यथा साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने का प्रचलन न पहले था और न ही आज है।
6 min read
Jul 30, 2026
Prem chandra
Prem chandra

Munshi premchand: मुंशी प्रेमचंद अपने युग के सर्वाधिक जागरूक साहित्यकार थे, इसीलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज जीवंतता से मूर्त हुआ है। उनका देहावसान (8 अक्तूबर 1936) हुए लगभग 9 दशक बीत चुके हैं लेकिन अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद सदैव जीवित रहे हैं। उन्होंने भारतीय समाज का ऐसा यथार्थ चित्र दिया है कि हम अपने हिंदुस्तान को उनकी रचनाओं में ढूंढ सकते हैं। समाज के अंतर्संबंधों के जो चित्र उन्होंने दिए हैं वे आज भी अप्रासंगिक नही हुए हैं।


मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं भारतीय समाज के सबसे प्रामाणिक दस्तावेज हैं। शायद यही कारण है कि हिंदी सिनेमा में मुंशी प्रेमचंद की कृतियों को ही सर्वाधिक फिल्माया गया है, अन्यथा साहित्यिक कृतियों पर फिल्म बनाने का प्रचलन न पहले था और न ही आज है। अपवाद स्वरूप ही कभी किसी साहित्यिक कृति को फिल्म का आधार बनाया जाता है। प्रेमचंद साहित्य पर उनके जीवनकाल में भी फिल्में बनी थीं और उनके देहांत बाद भी बनती रही हैं। बाल फिल्म सोसाइटी और सूचना प्रसारण विभाग के फिल्म्स डिविजन ने प्रेमचंद की रचनाओं पर लघु फिल्मों के साथ कुछ फीचर फिल्में भी बनाई हैं। स्वयं प्रेमचंद भी फिल्मी दुनिया से जुड़े थे मगर रम नही पाए।


मुंशी प्रेमचंद के साहित्य पर फिल्म निर्माण की शुरुआत उनके जीवनकाल में ही हो गई थी। सन 1934 में अजंता मूवीटोन कंपनी के मोहन भवनानी के आग्रह पर प्रेमचंद में मुंबई आकर "मिल" नाम से फिल्म की कहानी लिखी थी। फिल्म में तत्कालीन कपड़ा मिल मालिकों की शोषण वृत्ति के विरुद्ध मजदूरों की हड़ताल को सरकार ने आपत्तिजनक मानकर फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ दृश्य परिवर्तन के बाद यह फिल्म "मजदूर" नाम से परदे पर आ सकी थी। मजदूरों की हड़ताल दर्शाने वाली यह पहली फिल्म थी। जयराज, नयमपल्ली और बिब्बो द्वारा अभिनीत इस फिल्म को आलोचकों की काफी सराहना मिली लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म कोई विशेष चमत्कार नही दिखा पाई। इस फिल्म के विषय में स्व. बलराज साहनी ने अपनी फिल्मी आत्मकथा में लिखा है कि मिल मालिक और मजदूरों के संबंधों का चित्रण जितनी तल्खी और सच्चाई से इस फिल्म में हुआ वैसा पहले कहीं न देखा न पढ़ा। संभवतः इस फिल्म का आज कोई प्रिंट उपलब्ध नही है।


मुंबई आने से पूर्व मुंशी प्रेमचंद महालक्ष्मी सिनेटोन को अपने उपन्यास "सेवा सदन" पर फिल्म बनाने की अनुमति दे चुके थे। इस कंपनी के लिए निर्माता निर्देशक नानुभाई वकील द्वारा इस उपन्यास पर इसी नाम से फिल्म बनाई गई जिसमें अभिनेता साहू मोड़क ने समाज सुधारक की और अभिनेत्री जुबैदा ने अभागी वैश्या की भूमिका पूरी ईमानदारी के साथ निभाई थी लेकिन मुंशी प्रेमचंद अपनी कहानी के इस फिल्मी रूपांतरण से संतुष्ट न हो सके और फिल्मी दुनिया को छोड़ने का निर्णय कर लिया। बाद में फिल्म भी अधिक नहीं चल पाई। सन 1934 में ही प्रदर्शित इस फिल्म के संबंध में आलोचकों के साथ आम धारणा यही रही कि उपन्यास के साथ समुचित न्याय नहीं हो पाया।


सेवासदन के बाद कुछ वर्षों के अंतराल में मोहन भवनानी ने पुनः प्रेमचंद का उपन्यास अपनी फिल्म के लिए चुना। सन 1946 में "रंगभूमि" पर इसी नाम से बनी यह फिल्म भी मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं पर बनी पूर्व फिल्मों की तरह दर्शकों पर कोई विशेष प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं हो पाई। अभिनेत्री निगार सुलताना की यह पहली फिल्म थी।


स्वतंत्रता के बाद सन 1959 में निर्माता कृष्ण चौपड़ा ने प्रेमचंद की कहानी दो बैलों की कथा पर "हीरा मोती" शीर्षक से फिल्म बनाई। मुंबईया व्यावसायिक ढर्रे से हटकर इस फिल्म का निर्माण यथार्थवादी शैली में किया गया था। बलराज साहनी और निरूपाराय इस फिल्म की मुख्य भूमिका में थे। फिल्म को समीक्षकों की सराहना मिली लेकिन दर्शक अधिक नहीं मिले।


अपनी अगली फिल्म के लिए कृष्ण चौपड़ा ने एक बार पुनः प्रेमचंद का उपन्यास "गबन" चुना। इसी नाम से बनना आरंभ हुई इस फिल्म के निर्माण के दौरान ही कृष्ण चौपड़ा का निधन हो गया। बाद में यह फिल्म ऋषिकेश मुखर्जी ने पूरी की। गबन उस मध्यमवर्गीय समाज के जीवन को चित्रित करता है जो अर्थ संकट में जीते हुए मिथ्या मान मर्यादा रखने के लिए ऋण लेकर भावी जीवन को कष्टमय बनाने को विवश हो जाता है। सुनील दत्त और साधना द्वारा अभिनीत सन 1966 में प्रदर्शित यह फिल्म काफी सराही गई और व्यावसायिक दृष्टि से भी सफल साबित हुई। इस फिल्म में मोहम्मद रफी का गया गीत "अहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों..." आज भी हमारी जुबान पर आ जाता है।

1963 में निर्माता निर्देशक त्रिलोक जेटली ने प्रेमचंद के "गोदान" उपन्यास को फिल्माया। फिल्म में राजकुमार और कामिनी कौशल ने क्रमशः होरी व धनिया की भूमिका को जीवंतता के साथ निभाकर अभिनय के नए आयाम स्थापित किए। फिल्म विकास निगम से ऋण प्राप्त करने वाली यह पहली फिल्म थी।


सन 1977 में "शतरंज के खिलाड़ी" नाम से प्रेमचंद की इसी कहानी पर आधारित फिल्म का निर्माण सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक सत्यजीत राय ने किया। चूंकि मुंशी प्रेमचंद की कहानी में पूरी लंबाई की फिल्म बनाने लायक पात्र व घटनाएं नहीं थी, इसलिए सत्यजीत राय ने अपनी फिल्म को तथ्य व कथ्य का मिश्रण कह कर कुछ नए पात्र रचे किंतु केंद्रीय पात्र प्रेमचंद की कहानी के मीर व मिर्जा ही रहे, जिनकी भुमिकाएं क्रमशः संजीव कुमार व सईद जाफरी ने निभाई। प्रेमचंद की कहानी में की गए इस परिवर्तन को आलोचकों द्वारा बाद में कथा हत्या तक कहा गया। हालांकि फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार व फिल्म फेयर पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कार व सम्मान मिले। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कथा सूत्रधार ( नैरेटर ) की भूमिका निभाई थी। यह फिल्म हिंदी, उर्दू दोनों भाषाओं में बनी थी।


निर्देशक सत्यजीत राय ने ही सन 1981 में "सद्गति" नाम से एक टेली फिल्म बनाई। सामाजिक अत्याचार और छुआछूत पर करारा प्रहार करती इस फिल्म की निर्माण लागत लगभग 5 लाख रुपए थी जो की उस समय टेलीविजन इतिहास का एक रिकार्ड थी। फिल्म में ओमपुरी और स्मिता पाटिल ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी।


भारत में टेलीविजन क्रांति और दूरदर्शन युग की शुरुआत के साथ छोटे परदे पर नाटक व धारावाहिक शो की शुरुआत हुई। हम लोग, बुनियाद, व नुक्कड़ जैसे धारावाहिकों के प्रसारण के साथ एक बड़ा दर्शक वर्ग छोटे परदे से जुड़ गया। घर-घर में संपूर्ण परिवार के साथ छोटे परदे के कार्यक्रम देखे जाने लगे। रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक धारावाहिकों के छोटे परदे पर प्रदर्शन के बाद तो सिनेमा से जुड़ा एक बड़ा वर्ग छोटे परदे की ओर आकर्षित हुआ और फिर आम जीवन का ऐसा कोई विषय अछूता नहीं रहा जिस पर कोई कार्यक्रम छोटे परदे के लिए न बना हो। ऐसे में साहित्य का क्षेत्र कैसे अछूता रह सकता था। फिर मुंशी प्रेमचंद की पहचान तो थी ही पीड़ित, दलित, शोषित, गरीब, अछूत वर्ग के हितैषी साहित्यकार के रूप में, तो उनकी रचनाओं को लेकर भी फिल्मकारों ने छोटे परदे की ओर रुख किया।


टेलीविजन के आरंभिक दौर में छोटे पर्दे के दर्शकों को मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित धारावाहिक "निर्मला" व "कर्मभूमि" देखने को मिले। निर्मला का निर्माण निर्माता ब्रज टिक्कू ने किया था और कर्मभूमि निर्माता अजय मेहरा द्वारा बनाया गया था। इसका निर्देशन रिजवान शिराज ने किया था और पटकथा व संवाद अरुण कौल ने लिखे थे। दोनों ही धारावाहिकों में उपन्यास की मूल कथा के साथ कितना न्याय हो पाया, इसे लेकर इनके निर्माताओं के अपने अपने दावे थे। लेकिन वे अपने दावे पर कितने खरे उतर पाए, यह बहस का ही विषय रहा। बाद में निर्माता अजय मेहरा प्रेमचंद के ही उपन्यास "सेवासदन" पर इसी नाम से 39 कड़ियों वाला धारावाहिक दूरदर्शन पर लेकर आए। अजय मेहरा ने ही सन 2014 में "सेवासदन" के उर्दू संस्करण पर इसी नाम से "बाजार-ए-हुस्न" फिल्म बनाई। फिल्म में ओमपुरी, रश्मि घोष आदि कलाकार थे। फिल्म अधिक अधिक चर्चा में नहीं आ पाई।


प्रसिद्ध साहित्यकार व फिल्मकार गुलजार ने सन 2004 में मुंशी प्रेमचंद की विभिन्न कहानियों को लेकर एक 27 कड़ियों वाला धारावाहिक बनाया। "तहरीर" नाम से यह धारावाहिक डीडी नेशनल पर प्रसारित हुआ। इसमें पंकज कपूर और सुरेखा सीकरी जैसे मंजे हुए कलाकारों ने अभिनय के रंग बिखेरे। गीतकार गुलजार ने दूरदर्शन के लिए मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास "गोदान" पर भी 26 कड़ियों वाला एक धारावाहिक बनाया। प्रेमचंद साहित्य पर आधारित व इससे प्रभावित कथानकों पर हिंदी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं में भी फिल्में बनी हैं और काफी चर्चित व सफल रही हैं।


मुंशी प्रेमचंद ने समाज के शोषित व पीड़ित वर्ग को ही अपने साहित्य का मुख्य आधार बनाया है। नारी स्वातंत्र्य व सशक्तिकरण का स्वर भी प्रेमचंद साहित्य का प्रमुख स्वर रहा है। संभवतः यही कारण है कि आज डिजिटल प्लेटफार्मों के नए दौर में भी प्रेमचंद साहित्य फिल्मकारों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। नए दौर के फिल्मकार अपने चिंतन व दृष्टिकोण से प्रेमचंद साहित्य का फिल्मी रूपांतरण करने में जुटे हैं।

यह अलग बात है कि स्वयं मुंशी प्रेमचंद फिल्मी दुनिया की कार्यप्रणाली व इससे जुड़े लोगों की मनोवृत्ति से खासे असंतुष्ट थे। फिल्मी दुनिया से जुड़ने के अल्पकाल में ही इससे हुए मोहभंग को लेकर उन्होंने जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र कुमार व इन्द्रनाथ मदान सहित अपने अन्य साहित्यिक मित्र व समकालीन साहित्यकारों को लिखे पत्रों में अपनी पीड़ा व्यक्त की है। यहां प्रश्न यह है कि भारतीय सिनेमा मुंशी प्रेमचंद के साहित्य के साथ कितना न्याय कर पाया है? समुचित जवाब दर्शक ही दे सकेंगे।

Updated on:
30 Jul 2026 05:41 pm
Published on:
30 Jul 2026 05:41 pm