
gandhi
मनुष्य ने विज्ञान की ऊंचाइयों को छुआ है। उसने आकाश को मापा, समुद्र की गहराइयों को जाना और अंतरिक्ष की अनंत सीमाओं तक अपनी पहुंच बनाई। उसके हाथों में ऐसी तकनीक आ गई है, जिससे वह क्षण भर में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक संवाद कर सकता है। लेकिन इस सारी प्रगति के बीच एक प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है- क्या मनुष्य ने अपने भीतर के हिंसक आवेगों पर विजय प्राप्त की है? यदि इस प्रश्न का उत्तर खोजें तो दिखाई देता है कि सभ्यता की बाहरी चमक के बावजूद मनुष्य के भीतर क्रोध, द्वेष, प्रतिशोध, घृणा, असहिष्णुता और अहंकार अभी भी जीवित हैं। हिंसा केवल युद्ध के मैदान में नहीं होती। किसी को अपमानित करना, किसी के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाना, कटु शब्दों से किसी का मन तोडऩा, कमजोर का शोषण करना और प्रकृति के प्रति निर्ममता बरतना भी हिंसा के ही विभिन्न रूप हैं। इसीलिए अहिंसा को केवल 'हिंसा न करनेÓ की संकीर्ण परिभाषा में बांधना उचित नहीं है। अहिंसा जीवन के प्रति सम्मान की व्यापक संस्कृति है।
दो अक्टूबर को विश्व भर में अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाता है। यह दिन महात्मा गांधी की जयंती से जुड़ा हुआ है और विश्व समुदाय को यह स्मरण कराता है कि संघर्षों का समाधान केवल शक्ति और प्रतिशोध से नहीं, बल्कि संवाद, आत्मसंयम, करुणा और नैतिक साहस से भी संभव है। यह दिवस किसी एक व्यक्ति या देश की स्मृति भर नहीं है, यह मानवता के सामने रखे गए उस शाश्वत प्रश्न का प्रतीक है कि हम कैसा संसार बनाना चाहते हैं। अक्सर यह भ्रम दिखाई देता है कि अहिंसा कमजोर व्यक्ति का हथियार है। वस्तुत: अहिंसा के लिए जितना आत्मबल चाहिए, उतना शायद किसी अन्य मार्ग के लिए नहीं। क्रोध के क्षण में क्रोध करना आसान है, लेकिन क्रोध के सामने शांत रहना कठिन है। अपमान का उत्तर अपमान से देना सहज है, लेकिन अपमान के बाद भी अपने विवेक को जीवित रखना कठिन है। किसी से बदला लेना सरल हो सकता है, किंतु क्षमा करके आगे बढ़ जाना आत्मसंयम की मांग करता है। इस अर्थ में अहिंसा पलायन नहीं, आत्मविजय की साधना है। जिस व्यक्ति ने अपने भीतर के क्रोध पर विजय पा ली, जिसने प्रतिशोध की आग को करुणा के जल से शांत कर दिया और जिसने विरोधी को भी मनुष्य के रूप में देखना सीख लिया, वही वास्तविक अर्थों में अहिंसा का साधक है। महात्मा गांधी ने अहिंसा को केवल विचार के रूप में स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे सार्वजनिक जीवन में प्रयोग करके दिखाया। उनके लिए सत्य और अहिंसा एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। सत्य की खोज और अहिंसा का आचरण उनके जीवन-दर्शन के महत्वपूर्ण आधार बने। गांधीजी का संघर्ष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का संघर्ष नहीं था। उसमें साधन की पवित्रता का प्रश्न भी जुड़ा था। उनका विश्वास था कि अन्याय का विरोध आवश्यक है, लेकिन विरोध का तरीका भी मानवीय होना चाहिए।
आज हिंसा का चेहरा बदल रहा है। युद्ध और हथियारों के अतिरिक्त हिंसा के कई सूक्ष्म रूप हमारे सामने हैं। सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को अपमानित करना, बिना सत्यापन के उसके बारे में गलत सूचना फैलाना, किसी समुदाय के प्रति घृणा उत्पन्न करने वाली भाषा का प्रयोग करना, परिवार में किसी कमजोर सदस्य की भावनाओं की उपेक्षा करना, कार्यस्थल पर किसी व्यक्ति का मानसिक उत्पीडऩ करना- ये सभी व्यवहार सामाजिक जीवन में तनाव और पीड़ा बढ़ाते हैं। एक कठोर वाक्य किसी व्यक्ति को भीतर तक घायल कर सकता है, जबकि एक संवेदनशील वाक्य उसके जीवन में आशा जगा सकता है। अहिंसा की शुरुआत हमारे शब्दों से होनी चाहिए। हम बोलने से पहले एक क्षण रुकें और स्वयं से पूछें- क्या मेरे शब्द किसी को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाएंगे? यदि उत्तर हां है, तो मौन कभी-कभी सबसे सुंदर अहिंसा बन सकता है। विश्व में शांति की चर्चा बहुत होती है, लेकिन शांति की पहली पाठशाला परिवार है। यदि घर में बच्चों के सामने क्रोध, अपमान और हिंसक भाषा का वातावरण होगा तो उनसे संवेदनशील समाज की अपेक्षा करना कठिन होगा। इसके विपरीत यदि परिवार में संवाद, सम्मान, सहयोग और क्षमा की संस्कृति होगी तो बच्चे स्वाभाविक रूप से अहिंसक मूल्यों को आत्मसात करेंगे। अहिंसा की वास्तविक शुरुआत स्वयं से होती है। अपने क्रोध को पहचानना, अपने अहंकार को देखना, अपनी भाषा को संयमित करना, अपनी पूर्वाग्रही धारणाओं पर प्रश्न करना और अपनी गलतियों को स्वीकार करना- ये अहिंसा की आंतरिक सीढिय़ां हैं। यदि मन में हिंसा है तो बाहर की शांति बहुत देर तक टिक नहीं सकती।
आज दुनिया को हथियारों से अधिक विश्वास की आवश्यकता है। दीवारों से अधिक संवाद की आवश्यकता है। प्रतिशोध से अधिक क्षमा की आवश्यकता है। भय से अधिक करुणा की आवश्यकता है। अहिंसा हमें यह विश्वास देती है कि मनुष्य के भीतर विनाश की शक्ति के साथ निर्माण की शक्ति भी मौजूद है। अहिंसा कोई कमजोर आवाज नहीं, यह आत्मा की वह शक्ति है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती है। आइए अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर हम केवल अहिंसा की चर्चा न करें, बल्कि उसे अपने व्यवहार में उतारें। किसी एक व्यक्ति को क्षमा करें, किसी दुखी व्यक्ति का हाथ थामें, किसी विरोधी की बात धैर्य से सुनें, किसी पीडि़त के प्रति संवेदना व्यक्त करें और अपने शब्दों से किसी टूटे हुए मन में आशा जगाएं।
प्रो.आनंदप्रकाश त्रिपाठी 'रत्नेश', (स्वतंत्र लेखक एवं स्तंभकार)
Updated on:
02 Oct 2026 03:30 pm
Published on:
02 Oct 2026 03:30 pm
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