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PATRIKA PODCAST : भावविहीनता विघटनकारी

वर्तमान भौतिकवादी जीवनशैली में जीवन मूल्यों के विघटन से संस्कृति व संस्कारों की भारतीय परम्परा विच्छिन्न हो गई। पुरुष व स्त्री दो की जगह एक ही पहिया बन गए, तब जीवन रथ का संतुलन कैसे संभव हो?
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Gulab Kothari Article : शिक्षित महिला परिवार को यंत्रवत् चलाती है। जहां भाव नहीं है मात्र ड्यूटी रहती है। कृत्रिम भाव जीवन में मिठास नहीं घोल सकते। वहां परिवार जैसी संस्था नहीं होती, मात्र एक छत के नीचे रहने वाले विभिन्न आयुवर्ग के लोगों का समूह रहता है। घड़ी की सुईयां ही उनके चौबीस घण्टों के दिन को विभाजित करती हैं। कामकाजी महिला के पास परिवार के लिए समय का अभाव होना निश्चित है क्योंकि कार्यस्थल पर नियत समय पर ही जाना है। ऐसे में तनावपूर्ण वातावरण में क्या स्वस्थ मन पनप सकता है?