
गंगा सहाय मीणा
(आदिवासी मामलों के विशेषज्ञ और एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू, नई दिल्ली)
एक तरफ मुख्यधारा के समाजों और सरकारों द्वारा मूल निवासियों को लगातार हाशिए पर धकेला जा रहा है, दूसरी ओर मूल निवासियों से जुड़ी तीन घटनाओं ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। केरल के वायनाड में पूकोडे पहाड़ियों पर पहला आदिवासी हेरिटेज गांव एन उरु बनाया गया है। करोड़ों की लागत से केरल सरकार ने इस गांव का निर्माण करीब 25 एकड़ में किया है। हेरिटेज गांव का उद्देश्य आदिवासी ज्ञान, संस्कृति, शिल्प और जीवन-शैली को सहेजना है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन की उम्मीद भी है। बाकी दो घटनाएं भारत से बाहर की हैं। दुनिया के एक छोर पर ऑस्ट्रेलिया के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों से न्याय का वादा किया है और दुनिया के दूसरे छोर पर कनाडा में 1 जून से आदिवासी इतिहास माह की शुरुआत हुई है। समाज-विज्ञानियों में इस बात को लेकर बहस रही है कि आदिवासियों की अस्तित्व रक्षा और सतत विकास के लिए कौन-सी राह उचित होगी। एक तरफ मुख्यधारा के साथ उसकी शर्तों के आधार पर मेल-मिलाप का रास्ता है, दूसरी तरफ मुख्यधारा से अलग-थलग रहने का विकल्प है।
दुनियाभर की सरकारें आदिवासियों को व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहती हैं। केरल सरकार का दावा है कि उसकी पहल से आदिवासी युवाओं को रोजगार मिलेगा और उनकी संस्कृति के बारे में बाहरी दुनिया जानेगी। आदिवासी चिंतक इस पहल की यह कहकर आलोचना कर रहे हैं कि विभिन्न सरकारें आदिवासियों को सजावटी वस्तु बनाकर बेचना चाहती हैं। आदिवासी इलाकों में सरकारी तंत्र के प्रवेश और हस्तक्षेप को भी आशंकित नजरों से देखा जाता रहा है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पारित 'मूल निवासियों के अधिकारों का घोषणा पत्र' के अनुच्छेद-3 के अनुसार दुनियाभर के आदिवासियों को दूसरे तमाम मानवाधिकारों के साथ स्वायत्तता का भी अधिकार है। इसी के तहत 2008 में ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री केविन रुड ने वहां के मूल निवासियों से उनके साथ किए गए अन्यायपूर्ण बर्ताव के लिए अपनी ओर से, सरकार की ओर से और संसद की ओर से सार्वजनिक माफी मांगी।
मूल सवाल अब भी अनुत्तरित है। आदिवासी अगर मुख्यधारा और सरकारी तंत्र की शर्तों पर उसका हिस्सा बनते हैं तो उन्हें अपनी भाषा-संस्कृति और परिवेश छोड़ना होगा और बाहरी समाज के पदानुक्रम व उसमें तय स्थान को स्वीकार करना होगा। उसमें विकास का रास्ता, साधन और मूल्य बाहरी समाज के होंगे। दूसरी तरफ अगर वे आदिवासी ढंग की दुनिया चाहते हैं तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्वीकृत आत्मनिर्णय और स्वायत्तता के अधिकार को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना होगा। दोनों ही रास्तों में सबसे बड़ी चुनौती अपनी पहचान और अस्तित्व को बचाए रखना होगी।